जलवायु परिवर्तन के कारण भयावह हो रहा है अल नीनो
पंकज चतुर्वेदी
जलवायु परिवर्तन ने अल नीनो को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली बना दिया है, और यह केवल आशंका नहीं बल्कि अब वैज्ञानिक तथ्यों से सिद्ध हो चुका है। यह निष्कर्ष हाल ही में प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित एक नए शोध पत्र से सामने आया है, जिसका नेतृत्व मिशिगन विश्वविद्यालय की शोधकर्ता जूलिया कोल ने किया और जिसमें जॉर्जिया टेक की वैज्ञानिक किम कॉब सहित अन्य सहयोगी शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्ष गैलापागोस द्वीपसमूह के जीवित और जीवाश्म प्रवाल भित्तियों, यानी कोरल रीफ के रासायनिक अभिलेखों के विश्लेषण से निकाले, क्योंकि यह क्षेत्र प्रशांत महासागर के उस अहम हिस्से में स्थित है जहां अल नीनो की उत्पत्ति और तीव्रता तय होती है। इस अध्ययन के अनुसार, अल नीनो घटनाएं औद्योगिक युग से पहले, यानी उन्नीसवीं सदी के मध्य से पहले की तुलना में आज छत्तीस प्रतिशत से अधिक प्रबल हो चुकी हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पिछले चालीस वर्षों में ही इसमें सोलह प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह दर्शाता है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे नहीं बल्कि तेज़ी से आगे बढ़ रही है। वैज्ञानिकों के लिए यह अनुसंधान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्यक्ष समुद्री तापमान के अवलोकन आधारित रिकॉर्ड मात्र पचहत्तर वर्ष पुराने हैं, जिस कारण अब तक इस बढ़ोतरी की पुष्टि करना कठिन था। कोरल की परतों में सुरक्षित रासायनिक संरचना ने शोधकर्ताओं को सैकड़ों वर्ष पीछे जाकर समुद्री तापमान के इतिहास को पढ़ने का अवसर दिया, जिससे अठारह सौ सतत्तर की भीषण अल नीनो घटना जैसी पुरानी घटनाओं को भी पहचाना जा सका।
यह अध्ययन ऐसे समय पर सामने आया है जब प्रशांत महासागर में एक और अत्यंत प्रबल, तथाकथित “सुपर अल नीनो” आकार ले रहा है, जिसके इस वर्ष के अंत तक रिकॉर्ड तोड़ने की आशंका जताई जा रही है। प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में तापमान औसत से लगभग तीन डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आधुनिक अभिलेखों में उन्नीस सौ बयासी के बाद से केवल तीन ही सुपर अल नीनो घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिसमें सबसे हालिया दो हज़ार पंद्रह-सोलह की घटना ने पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में तीन करोड़ साठ लाख से अधिक लोगों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया था। ऐसे में जब अल नीनो पहले से अधिक बारंबार, अधिक तीव्र और अधिक अप्रत्याशित होते जा रहे हैं, इसका असर सबसे अधिक उन देशों पर पड़ता है जो कृषि और मानसून पर गहराई से निर्भर हैं, और भारत इसमें सबसे आगे है।
भारत के परिपेक्ष्य में देखें तो यह शोध कोई दूर की बात नहीं बल्कि सीधे हमारे खेतों, हमारी थाली और हमारी अर्थव्यवस्था से जुड़ा विषय है। भारत की लगभग सत्तर प्रतिशत वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होती है, और देश की लगभग आधी खेती योग्य भूमि सीधे इसी वर्षा पर निर्भर है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस वर्ष यानी दो हज़ार छब्बीस का मानसून दीर्घकालिक औसत के लगभग नब्बे से बानवे प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है, जो सामान्य से कम की श्रेणी में आता है, और एक दशक से अधिक समय में सबसे कमजोर मानसूनों में गिना जा रहा है। इतिहास इस पैटर्न की पुष्टि करता है—दो हज़ार दो और दो हज़ार नौ जैसे प्रबल अल नीनो वर्षों में वर्षा औसत के अस्सी प्रतिशत से भी नीचे चली गई थी, जबकि दो हज़ार पंद्रह के सुपर अल नीनो में यह छियासी प्रतिशत रही थी।
इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ता है, जिनमें धान, दलहन, तिलहन, कपास और गन्ना जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं। जिन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं, वहां किसान लगभग पूरी तरह मानसून पर निर्भर रहते हैं, और वर्षा में देरी या असमान वितरण सीधे बुवाई और फसल की पैदावार को प्रभावित करता है। कृषि भारत की कुल सकल मूल्य वर्धन में लगभग अठारह प्रतिशत का योगदान भले ही करती हो, लेकिन यह देश की लगभग आधी कार्यबल को रोजगार देती है, जिस कारण मानसून में किसी भी कमी का असर करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आय पर सीधे पड़ता है। इसके अलावा कमजोर मानसून का प्रभाव खाद्य महंगाई, जलाशयों में जल स्तर, जलविद्युत उत्पादन और यहां तक कि शहरी बिजली मांग पर भी पड़ता है, क्योंकि गर्मी बढ़ने के साथ बिजली की मांग दो सौ चालीस गीगावाट से भी अधिक हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक बिंदु यह भी है कि अल नीनो अकेला कारक नहीं है। हिंद महासागर द्विध्रुव जैसी अन्य क्षेत्रीय जलवायु परिघटनाएं अल नीनो के प्रभाव को या तो बढ़ा सकती हैं या आंशिक रूप से संतुलित कर सकती हैं। यही कारण है कि अल नीनो का प्रबल होना स्वतः ही गंभीर सूखे की गारंटी नहीं देता, परंतु यह जोखिम की संभावना को निश्चित रूप से बढ़ा देता है। साइंस पत्रिका के इस नए शोध के निष्कर्ष के अनुसार यह बढ़ती तीव्रता मानव जनित जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ी हुई है, जिसका अर्थ है कि आने वाले दशकों में भारत को अपेक्षाकृत अधिक बारंबार और अधिक तीव्र मानसूनी उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा।
इस बदलती वास्तविकता के मद्देनजर भारत के लिए अनुमान से अधिक महत्वपूर्ण अब तैयारी बन गई है। जलवायु के प्रति सहनशील कृषि, यानी बाजरा, ज्वार, रागी जैसे मोटे अनाज और दलहन-तिलहन जैसी सूखा-सहिष्णु फसलों को बढ़ावा देना, ड्रिप सिंचाई का विस्तार करना, तथा एआई आधारित मौसम परामर्श सेवाओं का उपयोग करना अब वैकल्पिक नहीं बल्कि आवश्यक रणनीतियां बनती जा रही हैं। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, आर्द्रभूमियों की बहाली और जलाशय प्रबंधन जैसे उपाय जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग, राष्ट्रीय जलवायु अनुसंधान संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच समन्वय भी पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
संक्षेप में कहें तो यह नया शोध केवल एक वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं बल्कि एक चेतावनी है। अल नीनो अब उतना “प्राकृतिक” नहीं रहा जितना पहले समझा जाता था; मानव गतिविधियों से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन इसे लगातार अधिक विनाशकारी बना रहा है। भारत जैसे देश के लिए, जिसकी अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा आज भी मानसून की एक धुरी पर टिकी हुई है, यह निष्कर्ष स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु अनुकूलन को अब दीर्घकालिक योजना का केंद्रीय हिस्सा बनाना ही होगा, अन्यथा हर आने वाला सुपर अल नीनो पहले से अधिक भारी कीमत वसूल करेगा।