जलवायु परिवर्तन और मानव व्यक्तित्व ऊँचाई, मस्तिष्क विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर वैज्ञानिक प्रभाव
जलवायु परिवर्तन और मानव व्यक्तित्व ऊँचाई, मस्तिष्क विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर वैज्ञानिक प्रभाव

जलवायु परिवर्तन और मानव व्यक्तित्व

ऊँचाई, मस्तिष्क विकास और मानसिक स्वास्थ्य पर वैज्ञानिक प्रभाव

अजय सहाय

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) केवल पृथ्वी के भौतिक परिवेश को ही नहीं, बल्कि मानव शरीर, मस्तिष्क, मानसिक विकास, शारीरिक वृद्धि, व्यक्तित्व संरचना और सामाजिक व्यवहार तक को प्रभावित कर रहा है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC), The Lancet Countdown 2023, और United Nations Environment Programme (UNEP) जैसी वैश्विक संस्थाओं की रिपोर्टों में भी स्पष्ट रूप से उजागर हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण न केवल पारिस्थितिक असंतुलन हो रहा है, बल्कि मानव शरीर की ऊँचाई (Height), मस्तिष्क की संरचना (Cerebral Development), हार्मोनल विकास, पोषण चक्र, जनन क्षमता, मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक क्षमताओं में भी गिरावट देखी जा रही है ।

उदाहरण के लिए 2022 में प्रकाशित Lancet Planetary Health जर्नल के अनुसार दक्षिण एशिया में गर्मियों के तीव्र तापमान ने बच्चों की linear growth यानी लंबाई को औसतन 2.1 से 4.3 सेंटीमीटर तक घटाया, वहीं 1985 से 2020 तक के आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि अत्यधिक गर्मी (Heatwaves), जल संकट और खाद्य असुरक्षा के कारण शहरी क्षेत्रों के बच्चों की औसत लम्बाई में स्थिरता आ गई है या कमी देखने को मिली है, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि अत्यधिक तापमान के कारण शरीर में प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) धीमा हो जाता है ।

गर्म मौसम में भोजन की इच्छा कम हो जाती है जिससे पोषण की कमी होती है और इससे Height Hormones जैसे GH (Growth Hormone) और IGF-1 का स्राव प्रभावित होता है, वहीं जलवायु परिवर्तन के कारण मस्तिष्क विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है क्योंकि अत्यधिक ताप, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण और खानपान में बदलाव ने मस्तिष्क के Hippocampus और Prefrontal Cortex को अविकसित किया है, जिससे Decision Making, Memory Retention, और Emotional Balance पर असर पड़ा है, NASA की EARTH OBSERVATORY 2023 के अनुसार सतत गर्म जलवायु में जीने वाले बच्चों का IQ स्तर औसतन 5-7 अंक कम पाया गया है ।

इसके अतिरिक्त यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु संकट के चलते वर्ष 2023 में भारत सहित दक्षिण एशिया के 45 करोड़ से अधिक बच्चों को ‘high climate risk’ वाली श्रेणी में रखा गया जिनमें मानसिक अवसाद, चिड़चिड़ापन, तनाव और आक्रोश जैसे लक्षण अधिक देखे जा रहे हैं, वहीं जो बच्चे या किशोर शहरी क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ शीतलन और हरित क्षेत्र (green cover) का अभाव है ।

वहाँ मानसिक रोगों की संभावना 20% अधिक है, संयुक्त राष्ट्र के Children & Climate Crisis Report (2021) में यह भी पाया गया कि गर्मी के लंबे दौर में स्कूली बच्चों की एकाग्रता 27% तक घट जाती है, जिससे मानसिक विकास प्रभावित होता है, इसके अलावा WHO के अनुसार लगातार अधिक तापमान में रहने से शरीर का Serotonin, Dopamine और Melatonin संतुलन बिगड़ता है जो Mood और Sleep Regulation के लिए उत्तरदायी हैं, जिससे अवसाद, अनिद्रा, और Decision Fatigue बढ़ता है।

जलवायु परिवर्तन का मानव हॉर्मोनल विकास पर भी असर पड़ा है, जैसे कि अधिक तापमान और प्रदूषण ने पुरुषों में Testosteron और महिलाओं में Estrogen-Hormonal Balance को बाधित किया है, जिससे प्रजनन क्षमता, मानसिक संतुलन और Personality Development पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है ।

European Human Biology Association (EHBA) के अनुसार तापमान, पर्यावरणीय विषाक्तता और पोषण की कमी से जुड़ी जलवायु समस्याओं ने पिछले 30 वर्षों में लड़कों की औसत लम्बाई में 1.5–2.3 सेंटीमीटर की गिरावट दर्ज की है, साथ ही early puberty यानी किशोरावस्था की समय-पूर्व शुरुआत और हार्मोनल असंतुलन के कारण व्यक्तित्व में आत्मविश्वास की कमी, सामाजिक भय, और आत्मघाती प्रवृत्ति भी बढ़ी है, वहीं गर्मी से संबंधित क्रोध, हाइपरएक्टिविटी और व्यवहारिक आक्रोश को ‘Heat-Aggression Syndrome’ कहा जाता है जो भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों में अधिक देखा गया है ।

WHO द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 35°C से अधिक तापमान में 13–18 वर्ष की उम्र के किशोरों में व्यवहारिक आक्रोश के मामले 21% तक बढ़ जाते हैं, इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन से जुड़े जल संकट के कारण माँ के गर्भकाल में होने वाला कुपोषण (Gestational Undernutrition) भ्रूण के मस्तिष्क और लंबाई विकास को अवरुद्ध करता है।  

2022 में प्रकाशित Nature Climate Change जर्नल के अनुसार यदि गर्भवती महिला 42°C के तापमान में निरंतर रहती है तो बच्चे की height में 3.7 सेमी तक की गिरावट और cognitive ability में 4-5 IQ अंक की कमी पाई गई, वहीं भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2020-21) के अनुसार कुपोषण और जल संकट प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों में Stunting (कम लंबाई) की दर 35.5% थी ।

जो कि पिछले सर्वेक्षण (NFHS-4) से अधिक थी, यह सीधा जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है, क्योंकि इन क्षेत्रों में या तो वर्षा की कमी है, या अत्यधिक वर्षा और बाढ़ से खेती, खाद्य सुरक्षा और स्वच्छ जल की उपलब्धता बाधित हो रही है, परिणामस्वरूप बच्चों की मानसिक और शारीरिक विकास दोनों प्रभावित हो रहे हैं, भारत में झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य जहाँ गर्मी और जल संकट दोनों मौजूद हैं, वहाँ किशोरों और बच्चों में Height Growth औसतन 1.8 से 2.4 सेंटीमीटर कम पाया गया है ।

 वहीं Personality Development पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव में सामाजिक व्यवहार, नेतृत्व क्षमता, संवाद कौशल और आत्म-प्रस्तुति (self-presentation) क्षमताओं की गिरावट सामने आई है क्योंकि अत्यधिक गर्मी और पर्यावरणीय असहजता के कारण किशोर समूहों में बाहरी गतिविधियाँ कम हो रही हैं जिससे मानसिक ऊर्जा और सामाजिक तालमेल में कमी आती है ।

यह सब एक दीर्घकालिक Anthropological परिवर्तन को इंगित करता है जिसे वैज्ञानिक ‘Climatogenic Human Morphological Regression’ कहते हैं, इसके अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली पीढ़ियों में न केवल औसत लंबाई और मस्तिष्क विकास में गिरावट होगी बल्कि मानसिक बीमारियाँ जैसे अवसाद, चिंता, तनाव, मनोविकार और आक्रोश की प्रवृत्ति अधिक पाई जाएगी ।

अमेरिका की Harvard T.H. Chan School of Public Health की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक गर्मी से मृत्यु दर के साथ-साथ मानसिक रोगियों की संख्या में 18% वृद्धि देखी गई, जो स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल एक पर्यावरणीय या मौसमीय मुद्दा नहीं रहा बल्कि यह मानव जैविक और मानसिक संरचना को पुनर्परिभाषित कर रहा है । अतः यह आवश्यक हो गया है कि हम जलवायु न्याय (climate justice), जलवायु शिक्षा, ग्रीन स्कूल नीति, हरित आवास, शीतलन केंद्र (cooling zones), पोषण सुरक्षा, और मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्रों को जलवायु नीति में शामिल करें ताकि भावी पीढ़ी का मानसिक और शारीरिक विकास सुनिश्चित किया जा सके और ‘क्लाइमेट-रेजिस्टेंट ह्यूमन डेवेलपमेंट मॉडल’ को साकार किया जा सके, जो कि भारत के जलवायु अनुकूलन नीति (National Adaptation Plan on Climate Change) का मूल उद्देश्य भी बनना चाहिए ।