सुरक्षित पर्यटन और हिमालय संरक्षण उत्तराखंड-हिमाचल के लिए चरणबद्ध, वैज्ञानिक और पर्यावरण-प्रथम नीति
सुरक्षित पर्यटन और हिमालय संरक्षण उत्तराखंड-हिमाचल के लिए चरणबद्ध, वैज्ञानिक और पर्यावरण-प्रथम नीति

सुरक्षित पर्यटन और हिमालय संरक्षण

उत्तराखंड-हिमाचल के लिए चरणबद्ध, वैज्ञानिक और पर्यावरण-प्रथम नीति

अजय सहाय

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्यों में पर्यटन (Tourism) एक प्रमुख आर्थिक आधार होने के बावजूद आज जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलाव, पश्चिमी विक्षोभ, क्लाउडबर्स्ट, नालों और नदियों में अचानक जलस्तर वृद्धि, झीलों में अतिवृष्टि के कारण टूटने (Glacial Lake Outburst Flood) जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब पर्यटन विकास की नीति केवल आर्थिक लाभ के बजाय पर्यावरण और मानव जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता देकर पुनर्निर्मित होनी चाहिए ।  

हाल की धाराली आपदा ने यह चेतावनी दी है कि बिना वैज्ञानिक मूल्यांकन और मौसम की सटीक निगरानी के किसी भी मौसम में अंधाधुंध पर्यटक बुलाना एक बड़ा जोखिम है, विशेष रूप से वर्षा ऋतु (जून से सितंबर) में जब बादल फटना, भूस्खलन और नदी-नाले में अचानक जलप्रवाह जैसी घटनाएं सामान्य हो चुकी हैं ।  

वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में वर्ष 2020 से 2024 के बीच औसतन प्रत्येक वर्ष 12–15 क्लाउडबर्स्ट घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें से 70% मानसून के महीनों में हुईं, जबकि हिमाचल प्रदेश में इसी अवधि में 8–10 बड़ी घटनाएं प्रति वर्ष हुईं; इसके साथ, हिमालयी ढलानों की भू-स्थिरता (Slope Stability) लगातार घट रही है—ग्लेशियर पिघलाव दर गंगोत्री में 22 मीटर/वर्ष, पिंडारी में 34 मीटर/वर्ष और सतलुज बेसिन में औसतन 18 मीटर/वर्ष है, जिससे ढीले अवसाद और बोल्डर बहाव के साथ नीचे आने लगे हैं, जो पर्यटन स्थलों पर अचानक खतरा पैदा करते हैं ।  

इस परिस्थिति में पर्यटन को चरणबद्ध (Phase-wise) और मौसम-आधारित रूप से खोलना अत्यंत आवश्यक है—पहला चरण अक्टूबर–नवंबर (पोस्ट-मॉन्सून) जब भूस्खलन का खतरा कम होता है, दूसरा चरण फरवरी–अप्रैल (प्रि-मॉन्सून) जब बर्फीले क्षेत्रों का पिघलाव सीमित होता है और जल प्रवाह सामान्य रहता है, जबकि जून–सितंबर के बीच केवल स्थानीय और विशेषज्ञ निगरानी वाले क्षेत्रों में सीमित संख्या में ही पर्यटकों को अनुमति दी जाए ।  

इसके लिए सरकार को Tourism Carrying Capacity Assessment अनिवार्य रूप से लागू करना होगा, जिसमें प्रत्येक हिल स्टेशन, घाटी, तीर्थ स्थल, नदी किनारे और झील क्षेत्रों की अधिकतम सुरक्षित पर्यटक संख्या वैज्ञानिक मापदंडों (भू-स्थिरता, जलवायु जोखिम, आपदा प्रबंधन क्षमता) के आधार पर तय हो ।  

प्रत्येक संवेदनशील स्थल पर स्थायी विशेषज्ञ फील्ड स्टाफ (ग्लेशियर विज्ञान, हाइड्रोलॉजी, भूगर्भशास्त्र, मौसम विज्ञान, आपदा प्रबंधन) की नियुक्ति हो, जो 24×7 मौसम और भू-स्थिति की निगरानी कर सके और तुरंत अलर्ट जारी कर सके; इसके साथ डिजिटल चेतावनी प्रणाली लागू हो, जिसमें हर पर्यटक पॉइंट, होटल, टैक्सी स्टैंड, और ट्रेकिंग रूट पर सायरन/वार्निंग बेल लगे हों जो मौसम विभाग (IMD), जल आयोग और आपदा प्रबंधन केंद्र से जुड़े हों—जैसे ही वर्षा की तीव्रता, नदी के जलस्तर या ग्लेशियर झीलों के बांध पर दबाव बढ़े, तत्काल चेतावनी दी जा सके ।  

पर्यटकों को Guidelines Booklet और मोबाइल ऐप के माध्यम से पहले से जानकारी दी जाए कि किस मौसम में कौन सा मार्ग सुरक्षित है, कहां पर भूस्खलन, फ्लैश फ्लड या बर्फबारी का खतरा है ।  

डेटा के अनुसार, केवल चारधाम यात्रा सीजन में औसतन 8,000–10,000 वाहन प्रतिदिन चलते हैं, जिससे प्रतिदिन लगभग 1.6–2.0 लाख किलोग्राम CO₂ और 75–85 डेसिबल तक ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न होता है, जो न केवल पारिस्थितिकी तंत्र बल्कि ग्लेशियरों की सतह पर कार्बन डिपॉजिट (Black Carbon) बढ़ाकर पिघलाव दर को तेज करता है ।

अतः वाहन संख्या को सीमित करना, साझा परिवहन (Shared Transport) और इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देना जरूरी है; पर्यटन स्थलों पर Waste Management Infrastructure को मजबूत करना अनिवार्य है, क्योंकि प्लास्टिक और अन्य कचरा नदी-नालों में जाकर उनके बहाव और शुद्धता को प्रभावित करता है ।  

सरकार को इसके लिए एक बड़ा बजट (₹5,000–7,000 करोड़) विशेष रूप से “Himalayan Eco-Safe Tourism Mission” के नाम से आवंटित करना चाहिए, जिसमें 40% राशि इंफ्रास्ट्रक्चर मॉनिटरिंग (CCTV, Drone, Sensor Network), 30% आपदा प्रतिक्रिया क्षमता (राहत केंद्र, हेलीकॉप्टर, मेडिकल यूनिट), 20% सतत पर्यटन अवसंरचना (Eco-lodges, Rainwater Harvesting, Waste Recycling) और 10% स्थानीय समुदाय प्रशिक्षण पर खर्च हो ।  

ग्लेशियर, झील, नदी, नाला और ट्रेकिंग मार्गों के पास Geo-fencing और Entry Monitoring System होना चाहिए ताकि अनधिकृत और असुरक्षित क्षेत्रों में पर्यटक प्रवेश न करें; इसके साथ, Rainy Season Tourism Restrictions Act जैसी नीति बने, जिसमें मानसून में केवल उन मार्गों को खोला जाए जहां पिछले 10 वर्षों में क्लाउडबर्स्ट या फ्लैश फ्लड का रिकॉर्ड न्यूनतम हो ।  

वर्तमान में उत्तराखंड और हिमाचल के कई क्षेत्रों में यह देखा गया है कि पर्यटन सीजन को बिना मौसम पैटर्न देखे पूरे साल खोल देने से दुर्घटनाएं बढ़ी हैं—केवल 2023–2024 में उत्तराखंड में पर्यटन से जुड़ी 125 मौतें और हिमाचल में 98 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें से आधी से अधिक मॉन्सून सीजन की हैं ।  

अतः प्राथमिकता “Tourist Safety First, Environment Always” पर होनी चाहिए, न कि केवल राजस्व वृद्धि पर, यदि यह चरणबद्ध, वैज्ञानिक और डेटा-आधारित नीति अपनाई जाती है तो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाते हुए सुरक्षित पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है और धाराली जैसी आपदाओं की पुनरावृत्ति को काफी हद तक रोका जा सकता है।