विशेषीकृत आपदा विज्ञान विभाग ग्लोबल वार्मिंग और बदलते जलवायु परिदृश्य में राज्यों की नई आवश्यकता
विशेषीकृत आपदा विज्ञान विभाग ग्लोबल वार्मिंग और बदलते जलवायु परिदृश्य में राज्यों की नई आवश्यकता

विशेषीकृत आपदा विज्ञान विभाग

ग्लोबल वार्मिंग और बदलते जलवायु परिदृश्य में राज्यों की नई आवश्यकता

अजय सहाय

पिछले कुछ दशकों में बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग और बदलते जलवायु पैटर्न ने स्पष्ट कर दिया है कि पारंपरिक आपदा प्रबंधन विभाग आज की जटिल चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं हैं। हर राज्य में अभी भी पारंपरिक “रिलीफ एंड रेस्क्यू” आधारित डिजास्टर मैनेजमेंट डिपार्टमेंट चलता है, जबकि 21वीं सदी में आवश्यकता है ।

एक विशेषीकृत (Specialized) बहु-विषयक आपदा विभाग की, जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, जल विशेषज्ञ, IIT और अन्य तकनीकी संस्थानों से प्रशिक्षित अधिकारी, भूगोलवेत्ता, मौसम वैज्ञानिक, जलविज्ञानी, सामाजिक कार्यकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हों। ऐसा विभाग केवल राहत और बचाव पर ही केंद्रित न होकर प्रिवेंशन (Prevention), प्रेडिक्शन (Prediction), प्रिपेयर्डनेस (Preparedness) और रेज़िलिएंस (Resilience) पर काम करेगा ।

भारत में NDMA (National Disaster Management Authority) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तो हैं, परंतु इनकी कार्यप्रणाली अधिकतर प्रशासनिक स्तर तक सीमित रहती है और विज्ञान व तकनीकी आधारित पूर्वानुमान तथा स्थानीय स्तर की तैयारी में बड़ी खाई बनी हुई है। उदाहरण के लिए, IPCC की AR6 रिपोर्ट (2023) के अनुसार, हिमालय में 2100 तक लगभग 80% छोटे ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

2013 की केदारनाथ आपदा (चोराबरी ताल टूटना – 2.62×10^8 लीटर पानी का अचानक बहाव) और 2023 की सिक्किम साउथ ल्होनाक झील फटने की घटना इसका ताज़ा उदाहरण हैं। इसी तरह, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, 2001–2023 के बीच देश में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं (Heavy Rainfall Events) में 67% की वृद्धि हुई है।

हिमालयी राज्यों में भू-स्खलन (Landslide), बादल फटना (Cloudburst), GLOF और भूकंप की आवृत्ति बढ़ी है। 2021 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने से 300 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। वहीं, दक्षिण भारत में चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। 2018 का केरल बाढ़ (IMD व ISRO रिपोर्ट अनुसार 164% अतिरिक्त वर्षा) और 2019 का फानी चक्रवात (280 km/h की गति) दर्शाता है कि अब हर राज्य को अपने भौगोलिक व पर्यावरणीय परिदृश्य के अनुसार विशेष आपदा विभाग चाहिए।

ऐसे विभाग का संरचना मॉडल इस प्रकार हो सकता है:

वैज्ञानिक इकाई – IIT, IISc, NIT और CSIR जैसी संस्थाओं के विशेषज्ञों की स्थायी भागीदारी।

पर्यावरण इकाई – वेटलैंड, वन, जैव विविधता और जल संरक्षण से जुड़े पर्यावरणविद्।

जल विज्ञान इकाई – केंद्रीय जल आयोग, CGWB और IIT Roorkee के जल विशेषज्ञ, जो BCM (Billion Cubic Meter) जल प्रवाह और भंडारण डेटा का विश्लेषण करें।

प्रौद्योगिकी इकाई – ISRO और NRSC के साथ मिलकर सैटेलाइट डेटा (जैसे Sentinel-1 SAR, Landsat-8/9, ICESat-2) से वास्तविक समय निगरानी।

सामाजिक इकाई – ग्राम पंचायत, SHG, युवाओं और स्कूलों के माध्यम से सामुदायिक प्रशिक्षण।

पूर्वानुमान एवं अलर्ट इकाई – IMD और IITM पुणे के मौसम मॉडल को स्थानीय स्तर तक पहुँचाना।

उदाहरण के लिए, यदि बिहार में गंगा, कोसी और गंडक बेसिन में प्रति वर्ष लगभग 1472 मिमी औसत वर्षा होती है, तो इससे पैदा होने वाली बाढ़ के पूर्वानुमान हेतु प्रत्येक जिला स्तर पर फ्लड अर्ली वार्निंग सेंटर होना चाहिए, जो सैटेलाइट इमेज, रडार और ड्रोन से रियल-टाइम डेटा लेकर ग्रामीणों तक SMS, ऐप और स्थानीय रेडियो से सूचना दे।

वैश्विक उदाहरण भी यह बताते हैं कि विशेषीकृत विभागों से ही आपदा प्रबंधन सफल होता है:

जापान में भूकंप और सुनामी पूर्व चेतावनी के लिए Earthquake Early Warning System (EEWS) काम करता है।

अमेरिका (FEMA) में अलग-अलग आपदाओं पर काम करने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियर जुड़े हैं।

नीदरलैंड्स ने बाढ़ प्रबंधन के लिए Delta Works जैसी तकनीकी परियोजनाएं लागू कीं।

सिंगापुर में शहरी जलभराव प्रबंधन हेतु अलग “Urban Flood Management Division” है।

भारत यदि राज्यवार विशिष्ट आपदा विभाग बनाए, तो हिमालयी राज्यों में “हिमालयन डिजास्टर डिपार्टमेंट”, तटीय राज्यों में “साइक्लोनिक डिजास्टर डिपार्टमेंट”, शुष्क राज्यों में “ड्रॉट रेज़िलिएंस डिपार्टमेंट”, और नदी बेसिन वाले राज्यों में “फ्लड मैनेजमेंट डिपार्टमेंट” स्थापित किए जा सकते हैं। इससे एक ओर डेटा-सेंट्रिक (Data-centric) प्लानिंग होगी और दूसरी ओर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नीतियाँ बन सकेंगी।

निष्कर्षतः, आज के दौर में पारंपरिक आपदा विभाग केवल राहत कार्यों तक सीमित नहीं रह सकते। हर राज्य को चाहिए कि वह एक विशेषीकृत आपदा विज्ञान विभाग स्थापित करे जिसमें वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, जल विशेषज्ञ, IIT व ISRO से जुड़े अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता मिलकर कार्य करें। ऐसा मॉडल न केवल लोगों की जान और संपत्ति की रक्षा करेगा, बल्कि “जल आत्मनिर्भर भारत 2047” और “विकसित भारत 2047” जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को भी सुरक्षित बनाएगा।