78 वर्षों की वर्षा-विफलता भारत के शहरी जलभराव का वैज्ञानिक, भौगोलिक और नीतिगत विश्लेषण
78 वर्षों की वर्षा-विफलता भारत के शहरी जलभराव का वैज्ञानिक, भौगोलिक और नीतिगत विश्लेषण

78 वर्षों की वर्षा-विफलता

भारत के शहरी जलभराव का वैज्ञानिक, भौगोलिक और नीतिगत विश्लेषण

अजय सहाय

सितंबर 2025 से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों—दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, पटना, लखनऊ, इंदौर, अहमदाबाद, बेंगलुरु, चंडीगढ़, देहरादून, जयपुर, हैदराबाद, त्रिवेंद्रम—में अत्यधिक वर्षा (heavy rainfall) ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया कि आखिर 78 वर्षों के स्वतंत्र भारत में अब तक शहरी जल निकासी (urban drainage) के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक योजना क्यों नहीं बनी, जबकि हर साल बाढ़, जलभराव और नालों के उफान की घटनाएं दोहराई जाती हैं।

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के 2025 के आंकड़ों के अनुसार सितंबर माह में देशभर में औसत वर्षा 132.2 मिमी रही, जो सामान्य से 23% अधिक थी, और कई राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तराखंड, पंजाब—में 24 घंटे में 150 मिमी से 300 मिमी तक की बारिश दर्ज की गई, जिससे सैकड़ों कस्बों में भारी जल-जमाव हुआ। इन जलभराव की घटनाओं ने इस तथ्य को उजागर किया कि भारत में शहरी योजना ने अभी तक वर्षाजल प्रवाह (stormwater runoff), भूजल पुनर्भरण (groundwater recharge), और प्राकृतिक जलधाराओं के संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो शहरी क्षेत्र में लगभग 70–80% भूमि अब impervious surfaces (सीमेंट, डामर, पक्के निर्माण) में बदल चुकी है, जिससे वर्षाजल का 90% हिस्सा बहकर बाहर चला जाता है जबकि केवल 10% भूमि में ही जल अवशोषण (infiltration) हो पाता है। जब ऐसी भूमि पर तीव्र वर्षा होती है तो स्वाभाविक रूप से नालियों की क्षमता से अधिक पानी भर जाता है।

स्वतंत्रता के बाद शहरों के विस्तार के दौरान भारत ने “ड्रेनेज मास्टर प्लान” या “स्टॉर्मवॉटर मैनेजमेंट मॉडल” को वैज्ञानिक रूप से अद्यतन नहीं किया — दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे शहरों के ड्रेनेज नेटवर्क अब भी 1960–70 के दशक के डिजाइन मानकों पर आधारित हैं, जो अधिकतम 50 मिमी/दिन की वर्षा के लिए बने थे, जबकि अब कई शहरों में 200–250 मिमी/दिन तक की बारिश हो रही है।

उदाहरण के लिए, दिल्ली की मौजूदा ड्रेनेज मास्टर प्लान 1976 की है और उसमें 50 मिमी/24 घंटे की बारिश का ही मानक है, जबकि 2025 में दिल्ली ने 225 मिमी/24 घंटे की रिकॉर्ड वर्षा झेली। चेन्नई में 2021 के बाद से हुई हर भारी वर्षा में नालों और झीलों के अतिक्रमण के कारण पानी का निकास नहीं हो पाता और शहर के 60% हिस्से में जलभराव होता है।

भौगोलिक दृष्टि से भारत के अधिकांश नगर निचले जलग्रहण क्षेत्रों (low-lying basins), नदी किनारों या पुराने तालाबों, झीलों, नालों के ऊपर बसाए गए हैं — जो पहले वर्षाजल संचयन और प्राकृतिक बहाव (natural drainage) का मार्ग थे। जब इन पर भवन, सड़कें और कॉलोनियाँ बनीं, तो जलनिकासी का प्राकृतिक मार्ग (natural outlet) बाधित हो गया। भारत के हर बड़े शहर में पिछले 50 वर्षों में 30–70% तक जलाशयों और wetlands का क्षेत्रफल घटा है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में 1961 में 262 झीलें थीं, 2024 में मात्र 81 सक्रिय झीलें बची हैं ।

हैदराबाद में 300 से घटकर 87; पटना में 28 प्रमुख तालाबों में से अब 9 ही खुले हैं। इन जलाशयों का लोप सीधे-सीधे जलनिकासी क्षमता को घटाता है क्योंकि वही क्षेत्र “retention basins” का काम करते थे। जब पानी के रुकने और रिसने की जगह खत्म हो गई, तो वह सड़कों और आवासीय इलाकों में भर गया। भूगोल यह भी बताता है कि कई भारतीय नगरों का ढाल (slope gradient) 1:500 से भी कम है, अर्थात जल निकास का प्राकृतिक झुकाव बहुत धीमा है, और यदि नालों की ढलान और चौड़ाई वैज्ञानिक रूप से नहीं रखी जाए, तो स्थायी जलभराव होता है।

भूवैज्ञानिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के कई भागों में मिट्टी की अवशोषण क्षमता (infiltration capacity) भी घट चुकी है — लगातार शहरीकरण, भारी मशीनरी, सड़क डामरीकरण और निर्माण मलबे ने मिट्टी की पोरसिटी (porosity) घटाकर उसे सील कर दिया है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश के 70% शहरी जिलों में infiltration rate 3 से 5 मिमी/घंटा से घटकर 0.5 मिमी/घंटा से भी कम रह गया है।

इसका मतलब है कि वर्षा का पानी मिट्टी में रिस नहीं पाता, और जलभराव तेजी से बढ़ जाता है। इस जलभराव का दूसरा दुष्परिणाम है — भूजल पुनर्भरण की भारी हानि। हर वर्ष लगभग 3200 BCM (बिलियन क्यूबिक मीटर) वर्षाजल व्यर्थ बह जाता है, जबकि देश की कुल वार्षिक वर्षा 4000 BCM है। इस अनुपात से देखें तो लगभग 80% वर्षाजल जलभराव, बाढ़ या वाष्पन (evaporation) से नष्ट हो रहा है।

प्रशासनिक और नीतिगत विफलताएँ भी उतनी ही गंभीर हैं। 78 वर्षों में लगभग हर राज्य ने शहरी विकास प्राधिकरण (UDA), नगर निगम, जल आपूर्ति एवं सीवर बोर्ड (WSSB) बनाए, परंतु जल निकासी और स्टॉर्मवॉटर मैनेजमेंट के लिए अलग समर्पित विभाग नहीं बना। अधिकतर स्थानों पर जल निकासी (drainage) को सीवर सिस्टम (sewerage) के साथ जोड़ दिया गया, जबकि दोनों का प्रवाह और उद्देश्य पूरी तरह अलग हैं।

जब बरसात होती है तो वर्षाजल सीवर में घुस जाता है और सीवेज ओवरफ्लो हो जाता है। इसका नतीजा है कि हर वर्ष मॉनसून में नालों से गंदा पानी उफन कर सड़कों पर आता है। नगर निकायों के बजट में जल निकासी रखरखाव का हिस्सा औसतन 3–5% से अधिक नहीं होता, जबकि सड़क निर्माण या भवन निर्माण पर 40% तक खर्च होता है।

2023 में CAG रिपोर्ट ने पाया कि देश के 78% नगरों में ड्रेनेज मास्टर प्लान या तो कभी बना ही नहीं या 20 वर्षों से अपडेट नहीं हुआ। जलनिकासी योजनाओं में IITs या तकनीकी संस्थानों की सलाह लेना अपवाद रहा — उदाहरण के लिए मुंबई के “ब्रिहनमुंबई स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज प्रोजेक्ट (BRIMSTOWAD)” की सिफारिशें IIT मुंबई ने 1993 में दी थीं, पर वे 2019 तक अधूरी रहीं।

सामाजिक कारणों में सबसे प्रमुख है जन-जागरूकता और नागरिक अनुशासन का अभाव। नालों में घरेलू कचरा, प्लास्टिक, निर्माण मलबा, सीमेंट, और नाली ढक्कनों की चोरी जैसी समस्याएँ आम हैं। हर वर्ष सफाई अभियान शुरू होता है लेकिन मानसून पूर्व तैयारी (pre-monsoon desilting) केवल दिखावा बनकर रह जाती है। नगर निकायों में जलनिकासी इंजीनियरिंग का विशेषज्ञ स्टाफ बहुत कम है — अधिकांश कार्य ठेकेदारों पर छोड़ दिए जाते हैं, जो अनुभवहीन होते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से जलभराव का समाधान केवल नालियाँ चौड़ी करने से नहीं होगा, बल्कि एकीकृत “Urban Hydrological Cycle” को समझना आवश्यक है। जलनिकासी प्रणाली की डिजाइन में तीन चरण होते हैं — (1) Surface Runoff Management, (2) Groundwater Recharge Enhancement, और (3) Water Reuse Integration। लेकिन भारत में अधिकतर नगर पहले चरण पर ही सीमित रह गए हैं।

विदेशी उदाहरणों जैसे सिंगापुर का “ABC Water Programme” (Active, Beautiful, Clean Waters) या जापान का “Urban Sponge Model” दिखाते हैं कि कैसे छतों से लेकर पार्कों तक हर इंच भूमि को स्पंज-सिटी की तरह डिज़ाइन किया गया है ताकि पानी जमीन में रिसे और झीलों में संचित हो। भारत में यह मॉडल अभी प्रारंभिक स्तर पर है; केवल कुछ IIT-द्वारा संचालित पायलट परियोजनाएँ — जैसे IIT मद्रास का नानमंगला लेक रिचार्ज सिस्टम, या IIT दिल्ली का स्मार्ट-ड्रेनेज मॉडल — ही विकसित हो पाए हैं।

पर्यावरणीय परिवर्तन ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। IPCC (AR6, 2023) की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में मानसून की अनिश्चितता और “intense rainfall events” की आवृत्ति पिछले 50 वर्षों में 30% बढ़ी है। अब बारिश की कुल मात्रा उतनी ही होती है, परंतु समयावधि बहुत छोटी — यानी “short duration–high intensity rainfall”— जिससे नालों को समय नहीं मिलता पानी निकालने का। उदाहरण के लिए, सितंबर 2025 में जयपुर में 3 घंटे में 190 मिमी बारिश हुई, पटना में 6 घंटे में 142 मिमी, चेन्नई में 5 घंटे में 210 मिमी। ऐसी घटनाओं में नालों की क्षमता 10 गुना अधिक होनी चाहिए थी, लेकिन नहीं है।

भारत में जलभराव की आर्थिक लागत भी बहुत बड़ी है — विश्व बैंक की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार शहरी जलभराव से हर वर्ष औसतन ₹1.5 लाख करोड़ का नुकसान होता है, जिसमें सड़क क्षति, संपत्ति हानि, व्यापार रुकावट, और स्वास्थ्य संकट शामिल हैं। शहरी गरीब इस सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि वे निचले और अतिक्रमित इलाकों में रहते हैं।

जलभराव से फैलने वाली बीमारियाँ (डेंगू, मलेरिया, हैजा) हर वर्ष लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। 2024 में 13 राज्यों में 68,000 से अधिक लोग डेंगू से संक्रमित हुए — यह सीधे जलभराव से जुड़ा परिणाम है।

यदि तकनीकी दृष्टि से देखें तो नालियों की डिजाइन में return period (RP) की अवधारणा लागू नहीं की जाती। किसी भी शहरी क्षेत्र की जलनिकासी प्रणाली को 25 या 50 वर्ष के अधिकतम वर्षा रिटर्न पीरियड के हिसाब से बनाया जाना चाहिए, परंतु हमारे नगरों में यह केवल 2–5 वर्ष तक की घटनाओं पर आधारित होती है।

इसलिए हर 10वें वर्ष आने वाली भारी वर्षा नालियों को तोड़ देती है। GIS और LiDAR आधारित हाइड्रोलॉजिक मैपिंग, जो सिंगापुर, नीदरलैंड, या दक्षिण कोरिया जैसे देशों में अनिवार्य है, भारत के केवल 5% नगरों में ही उपलब्ध है।

भारत में विफलता का एक और गूढ़ कारण है “policy fragmentation”— यानी जल, भूजल, सीवर, सड़क, भवन और जलवायु विभागों का समन्वय न होना। केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल निकायों को देखता है, नगर निकाय नालियाँ देखते हैं, जल संसाधन विभाग नदी देखते हैं — परंतु कोई समग्र “Urban Stormwater Authority” नहीं है। इसी कारण योजनाएँ कागज पर बनती हैं लेकिन ज़मीन पर एकीकृत रूप में लागू नहीं हो पातीं। “Smart Cities Mission” के 100 शहरों में भी केवल 28 शहरों ने ड्रेनेज या जलभराव घटाने की परियोजनाओं पर कार्य शुरू किया है।

भौगोलिक और जलविज्ञान दृष्टि से भारत की नदियाँ और जलग्रहण क्षेत्र भी अब बाधित हैं। नदियों के किनारे पक्के बांध, रिटेनिंग वॉल, और अवैज्ञानिक नालियाँ नदी के बाढ़-मैदान (floodplain) को खत्म कर रही हैं। जब नदी को फैलने का स्थान नहीं मिलता, तो वह उलटे शहरों में पानी भर देती है। यही स्थिति 2025 में गुवाहाटी, पटना, लखनऊ और कानपुर में देखी गई, जहाँ बाढ़ का पानी शहर में उल्टा घुसा क्योंकि नदी और नालियों का स्तर समान हो गया था।

वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) के मोर्चे पर भी असफलता रही है। 2002 में केंद्र सरकार ने हर भवन में RWH अनिवार्य करने की नीति बनाई, परंतु 2025 तक केवल 12% शहरी भवनों में ही इसका पालन हुआ। कई राज्यों में नियम हैं पर उनका निरीक्षण नहीं होता। यदि भारत में 10% वर्षाजल भी स्थानीय स्तर पर संग्रहीत किया जाए तो 400 BCM पानी भूजल में लौट सकता है, जिससे जलभराव और सूखा दोनों में राहत मिलेगी।

इसके अलावा, शहरी योजना के स्तर पर eco-sensitive zoning और “permeable pavements”, “green roofs”, “recharge trenches”, “rain gardens” जैसी संरचनाओं का उपयोग लगभग नगण्य है। IIT खड़गपुर की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 98% नगरों में सड़कों का निर्माण पूरी तरह impermeable concrete से किया गया है जबकि यदि 30% सड़कों को permeable बनाया जाए तो जलभराव में 45% कमी आ सकती है।

इस विफलता के पीछे ऐतिहासिक कारण भी हैं — स्वतंत्रता के बाद भारत का शहरी नियोजन मुख्यतः जनसंख्या नियंत्रण, आवास और उद्योग पर केंद्रित रहा, न कि पर्यावरणीय जल प्रबंधन पर। पहले पाँच पंचवर्षीय योजनाओं में ड्रेनेज का उल्लेख केवल ग्रामीण सिंचाई तक सीमित था, शहरी जलनिकासी के लिए अलग नीति 1988 के बाद आई। लेकिन तब तक अधिकांश नगर बेतरतीब फैल चुके थे। जल निकासी का नेटवर्क भवनों के बाद बना, न कि भवन ड्रेनेज के अनुरूप। यही कारण है कि जब भी बारिश होती है, पानी का मार्ग खुद बनता है और जहाँ रुक जाता है वहीं तालाब बन जाता है।

भविष्य की दृष्टि से समाधान वैज्ञानिक और भूगोल आधारित होने चाहिए — हर शहर को अपने catchment का डिजिटल जल नक्शा बनाना चाहिए, जिसमें ऊँचाई (elevation), प्रवाह दिशा (flow direction), मिट्टी की पारगम्यता (soil permeability), और जलाशय बिंदुओं की पहचान हो। इसके आधार पर micro-drainage और macro-drainage दोनों का नेटवर्क तैयार हो। इसके साथ हर नए भवन में 20% क्षेत्र जल रिसाव हेतु खुला छोड़ा जाए।

शहरी नालियों की डिजाइन “Rational Method Q = CiA” के हिसाब से तय की जानी चाहिए, जहाँ “C” (runoff coefficient) अब 0.8–0.9 तक पहुँच गया है, यानी लगभग सारा पानी बह जाता है। यदि यही घटक 0.5 तक लाया जाए तो जलभराव आधा हो सकता है।

इसके अतिरिक्त, “urban sponge city” मॉडल को अपनाना चाहिए — जैसे चीन ने 2015 में किया, जहाँ प्रत्येक शहर को अपने क्षेत्रफल का कम से कम 20% हिस्सा ऐसा बनाना होता है जो वर्षाजल को अवशोषित कर सके। भारत में 2025 में यह हिस्सा औसतन केवल 4% है। इसके बिना जलभराव रोकना असंभव है।

अंततः यह स्पष्ट है कि 78 वर्षों में भारत में शहरी जलभराव की समस्या तकनीकी कमी से अधिक संवेदनशील नियोजन और समग्र सोच की कमी का परिणाम है। नालियाँ बनाईं तो भी उन्हें बनाए रखने की जिम्मेदारी तय नहीं की, योजनाएँ बनाईं तो भी स्थानीय भूगोल नहीं देखा, बारिश आई तो भी इसे “विपत्ति” समझा, “संसाधन” नहीं। वैज्ञानिक दृष्टि से भारत के प्रत्येक नगर में औसतन 100 मिमी की वर्षा से 1 किमी² क्षेत्र में लगभग 1 लाख घनमीटर (10⁸ लीटर) जल एकत्र होता है, परंतु यदि यही पानी सोख्तों (soak pits), recharge wells, या wetlands में पहुँचे तो भूजल स्तर 2–3 मीटर तक बढ़ सकता है। परंतु हम हर वर्ष इसे व्यर्थ बहा रहे हैं।

इस प्रकार सितंबर–अक्टूबर 2025 की भारी वर्षा और जलभराव ने 78 वर्षों की उस नीतिगत, वैज्ञानिक और प्रशासनिक उपेक्षा को उजागर कर दिया, जिसने हमें आज भी बरसात को “संकट” के रूप में देखने पर विवश किया है, जबकि विकसित राष्ट्र इसे “संसाधन” मानकर उपयोग करते हैं।

भारत के लिए अब समय है कि ड्रेनेज को केवल नालों की मरम्मत नहीं बल्कि “Urban Water Resilience Mission” के रूप में देखा जाए — जहाँ हर बूंद को संरक्षित किया जाए, हर नाला डेटा-सक्षम सेंसर से जुड़ा हो, हर नगर में IIT-सहयोगी जल डिजाइन सेल बने, और प्रत्येक नागरिक को समझाया जाए कि जलभराव की असली समस्या बारिश नहीं, बल्कि हमारी योजना-विहीनता है। तभी आने वाले दशकों में भारत जलभराव मुक्त और जल-संवेदनशील शहरी सभ्यता की दिशा में बढ़ सकेगा।