वृक्षम्मा ने दुनिया को विदा कहा
वृक्षम्मा ने दुनिया को विदा कहा

वृक्षम्मा ने दुनिया को विदा कहा

थिमक्का ने बिना औपचारिक शिक्षा प्राप्त किए अपने वृक्षारोपण के मिशन की शुरुआत की।

अंकित

पद्मश्री सम्मानित पर्यावरण कार्यकर्ता ‘सालूमरदा’ थिमक्का का शुक्रवार 14 नवंबर 2025  को बैंगलुरु के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। परिजनों के अनुसार 114 वर्षीय थिमक्का लंबे समय से अस्वस्थ थीं और इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती थीं, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। 30 जून 1911 को जन्मी थिमक्का को बेंगलुरु दक्षिण जिले के रामनगर में हुलिकल और कुदुर के बीच लगभग 4.5 किलोमीटर क्षेत्र में 385 बरगद के पेड़ लगाए जाने के लिए ‘सालूमरदा’ यानी वृक्ष माता की उपाधि मिली थी।

थिमक्का ने बिना औपचारिक शिक्षा प्राप्त किए अपने वृक्षारोपण के मिशन की शुरुआत की। निःसंतान होने के कारण जीवन में आए खालीपन को भरने के लिए वे पौधों की देखभाल अपने बच्चों की तरह करती थीं। उनके पर्यावरण संरक्षण के इस समर्पित कार्य को कई सम्मान मिले। 

बात हैं सन 2019 की  राष्ट्रपति भवन, दिल्ली । चकाचौंध वाले बड़े से परिसर में पद्मपुरस्कार दिए जाने थे। दमकते कपड़ों से सजे लोगों के बीच- साधारण सी साड़ी पहने, नंगे पैर एक बुजुर्ग महिला वहां बैठी थी। सभी की निगाह उन पर थी लेकिन वे सभी को आश्चर्य से देख रही थी। उनकी आँखें बता रही थी,  कि वे खुद से पूछ रही थीं कि आखिर उन्हें यहाँ क्यों बुलाया ? प्रधानमंत्री जी से लेकर सभी लोग उन्हें झुककर नमस्ते करते और कहते-वृक्षम्मा । कर्नाटक के छोटे से गाँव से आई थिमक्का बीते सालों की यादों में खो गई ।

याद आया उस दिन वे बहुत निराश थीं- 40 साल की उम्र हो गई । कोई बच्चे नहीं हुए । निराश थीं, समाज ताने देता, मन किया कि ऐसे क्या जीना ?

एक सुबह मैनें अपने पति को साथ लिया । कुछ बरगद के पेड़ लगाए । मैंने अपने पति के साथ मिलकर पहले सालचार कि0 मी0 तक सड़क के दोनों ओर 10 बरगद के पौधे लगाए। अपने बच्चों की तरह ही पौधों की देखभाल की । हर साल इन पेड़ों की गिनती बढ़ती गई । जब किसी ने कहा कि हम आठ हज़ार पेड़ लगा चुके हैं तो भरोसा नहीं हुआ । असल में हमारे यहाँ बरगद के पेड़ उगाना चुनौतीपूर्ण था,क्योंकि हमारे यहाँ जमीन में नमी कम है ।

राष्ट्रपति भवन की कुर्सी पर बैठते हुए थिमक्का को वह दिन याद आये . घर में चावल लाने को पैसा नहीं था . वे एक खदान में मजदूरी करने लगी .  यादों में उन्हें पता ही नहीं चला कि उनकी आँख से आंसू बह रहे हैं . वहां से गुजर रही एक महिला ने पूछा- “वृक्षम्मा. कोई दिक्कत है ?”

उन्होंने ‘न’ में गर्दन हिला दी – वह कितना बुरा दिन था जब मेरे पति चिक्कन्ना मुझे छोड़ कर भगवान के यहाँ  चले गये . मेरी पेड़ लगाने  की यात्रा ने मुझे यह दुःख सहने की भी क्षमता दे दी . मुझे लगा ये पेड़ मेरे पति की यादों को जिन्दा रख सकते हैं ।  

अचानक उनका नाम पुकारा गया । वे झुकीं कमर के साथ मंच पर पहुँचीं । राष्ट्रपति ने उन्हें सम्मानित किया । यह बात 2019 की है। उसके बाद 2020 में इन्‍हें केंद्रीय विश्वविद्यालय कर्नाटक की ओर से मानक डॉक्‍टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। सन 2022  में कर्नाटक सरकार ने उन्हें 111 वर्ष की उम्र में कैबिनेट मंत्री के बराबर पद दिया।

जब वह 40 साल की हो गई और बच्चे नहीं हुए तो निराश थीं,  समाज  ताने देता , मन किया कि ऐसे क्या जीना ? फिर एक सुबह उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर बरगद के पेड़ लगाना शुरू किया और उन्हें इसमें एक मकसद मिल गया। थिमक्का और उनके पति दोनों ने पहले वर्ष में चारकिमी तक सड़क के दोनों ओर 10 बरगद के पौधे लगाए। उन्होंने अपने बच्चों की तरह ही पौधों की देखभाल की। हर साल इन पेड़ों की गिनती बढ़ती गई. अब तक, उनके और उनके पति द्वारा 8000 से अधिक अन्य पेड़ उगाये गये हैं। ऐसी जगह पर बरगद के पेड़ उगाना चुनौतीपूर्ण था जो अपेक्षाकृत शुष्क था।

 आर्थिक तंगी के कारण अम्‍मा ने शुरुआती दौर में खदान में एक मजूदर की तरह काम किया था . थिमक्का को पहचान उनके पति चिक्कन्ना की मृत्यु के ठीक 5 साल बाद, वर्ष 1995 से मिलनी शुरू हुई। चिक्कना ने भी अपना जीवन प्रकृति के प्रति समर्पित कर दिया था और अपने छोटे पेड़ों की देखभाल के लिए काम करना छोड़ दिया था।

2019 में उन्‍हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया । 2020 में इन्‍हें केंद्रीय विश्‍वविद्यालय कर्नाटक की ओर से मानक डॉक्‍टरेट की उपाधि से सम्‍मानित किया गया । सन 2022  में कर्नाटक सरकार ने उन्हें 111 वर्ष की उम्र में कैबिनेट मंत्री के बराबर पद दिया ।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने थिमक्का के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए घोषणा की कि उनका अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा । उन्होंने कहा कि परिवार ने उनके अंतिम संस्कार के लिए दो या तीन स्थान चुने हैं और जल्द ही स्थल के बारे में निर्णय लिया जाएगा । 

मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने शोक संदेश में कहा, “सालूमरदाथिमक्का के निधन की खबर सुनकर मुझे गहरा दुख हुआ है। थिमक्का ने हजारों पेड़ लगाए और उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया ।” 

उन्होंने कहा कि भले ही थिमक्का का निधन हो गया हो, लेकिन पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा, उनके पुत्र व केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा, कर्नाटक के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और कई राजनीतिक नेताओं ने थिमक्का के निधन पर शोक व्यक्त किया।