भारत की राजधानी दिल्ली से गुजरात तक 692 किलोमीटर लंबी आड़ी पर्वतमाला अरावली
जलपुरुष राजेंद्र सिंह
भारत के एक उद्योगपति हेतु सब कुछ संभव हो सकता है—भारत के पहाड़, समुद्र, ज़मीन, जंगल, जंगली जानवर—सभी कुछ उपलब्ध हो जाते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली से गुजरात तक 692 किलोमीटर लंबी आड़ी पर्वतमाला अरावली भी उसे उपलब्ध कराने हेतु 20 नवंबर को उच्चतम न्यायालय ने निर्णय सुना दिया है ।
आड़ी पहाड़ को 100 मीटर ऊँचाई वाला बचाना है, जो केवल 7 से 8% है। शेष पहाड़ को खनन हेतु प्लेट में रखकर परोस दिया गया है। पहाड़ को इस प्लेट में सजाने की जिम्मेदारी भारत सरकार के जलवायु परिवर्तन और वन मंत्रालय को मिली है। इनके उच्चतम अधिकारी इस आदेश पर बहुत खुशियाँ मना रहे हैं ।
उच्चतम न्यायालय का आदेश प्राप्त कर जो खुशी उन्होंने जताई है, उससे पता चलता है कि आज एक उद्योगपति हेतु बढ़ी ही खेती को खाने लगी है। जिन्हें वन, पहाड़, पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी दी गई है, वही इन्हें बर्बाद करने हेतु खुश और तैयार दिखाई देते हैं—यह बात इनके हलफ़नामों में स्पष्ट दिखाई देती है।
भारत के बड़े भाग में वर्षा कराने वाला आडा पर्वत अरावली, जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाले बादलों को मिलाकर बरसाता है, रेगिस्तान से पश्चिम भारत से आने वाली रेतीली हवाओं को रोककर रेगिस्तान के विस्तार को थामता है। यह भारत की राजधानी दिल्ली परिक्षेत्र (एनसीआर) को रेत के नीचे दबने से बचाता रहा है।
खनन भावनाओं के विनाश ने अरावली में धाबड़िया रिपोर्ट के अनुसार 22 गैप सक्रिय बताए हैं, जिनमें से 6 बहुत ही सक्रिय हो गए थे। इन्हें रोकने व धीमा करने हेतु हरित अरावली परियोजना भारत सरकार ने जापान सरकार व बैंक से लोन लेकर चलाई थी। याचिका के अनुसार और हरित अरावली परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए संपूर्ण अरावली का खनन बंद किया गया था। इसी कारण 22 सक्रिय गैप बंद हुए थे। इससे वर्षा संतुलित हो रही है और रेगिस्तान विस्तार की गति कम हुई है। रेगिस्तान और वर्षा का संबंध अग्नि और जल जैसा है।
रेगिस्तान का तापमान बादलों को ऊपर उठा देता है, फिर यह हवा के दबाव में आगे निकल जाते हैं। इसलिए रेगिस्तान में बिना बरसे ही कम वर्षा और बादलों का फटना अकाल-बाढ़ का कारण बनता है।
अरावली का खनन भारत में अकाल, सुखाड़ और बाढ़ बढ़ाएगा।
भूजल भंडार—अरावली का जल बैंक—अपने वर्षा जल को अपने अंदर रोककर वर्षभर झरनों को सदानीरा बनाकर बहाता रहा है। खनन ने इन झरनों को सुखा दिया है, इसलिए इसकी नदियाँ भी सूख गई हैं। पेयजल का संकट बढ़ गया है और भूजल भंडार खाली हो रहा है।
अरावली में खनन खेती को प्रभावित करेगा; खाद्य सुरक्षा का संकट आएगा। यहाँ की कृषि पानी की कमी से प्रभावित होगी। खेती में बेरोजगारी से हमारे गाँवों की जवानी में लाचारी, बीमारी और बेकारी की समस्या बढ़ जाएगी।
खनन प्रदूषण, सिलिकोसिस जैसी भयानक बीमारियाँ बढ़ा देगा। यहाँ की आर्थिकी बुरी तरह प्रभावित होगी। खनन खंडों का लाभ चंद लोगों को ही होगा, जबकि इसका दुष्प्रभाव भारत भर की जवानी और पानी पर पड़ेगा। जीडीपी तो बड़ी दिख सकती है, लेकिन बीमारी बढ़कर दवा उद्योग की आय बढ़ेगी और अरावली के लोगों की बीमारी का संकट भी बढ़ेगा। लोग निरोगी नहीं रह सकेंगे; दवाइयाँ खाकर ही ज़िंदा रह सकेंगे।
अरावली में खनन यहाँ के बान, वन्यजीव, वन-औषधियों को नष्ट करेगा—यही यहाँ की शान और गौरव हैं। सरिस्का के खनन ने सरिस्का को ‘बेवाघ’—बिना बाघ वाला—कर दिया था। यहाँ खनन बंद होने से अब यहाँ के बाघों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। खनन तो बाघों, जानवरों, इंसानों—सभी को खाता और नष्ट करता है। खनन शुरू करने से पूर्व वन साफ होंगे, फिर वन्यजीव मारेंगे; इन्हें खनन का शिकार बनना ही होगा।
वन, वन्यजीव, वन-औषधि, वनवासी—सभी पर अब खनन का संकट है। यह हमारी संपूर्ण संस्कृति और सभ्यता के लिए बिगाड़ का बीज है, क्योंकि जैव विविधता प्रकृति को समृद्ध और स्वास्थ्यवान बनाकर रखती है। प्रकृति और संस्कृति दोनों ही जुड़ी हुई हैं; इन्हें साथ-साथ बचाना ही जीवन को बचाना है। सांस्कृतिक–प्राकृतिक योग ही अरावली की विरासत है।
अरावली की विरासत 200 वर्ष पूर्व तक संपूर्ण समृद्धि का आधार थी, जब हमारी अर्थव्यवस्था की जीडीपी 32% थी। यह बात अरावली पर्वत को एक उद्योगपति को परोसने वाले कई बार बोल चुके हैं। धर्मपाल जी की शोध में विश्वास रखने वाला हर भारतीय मानता है कि हम सोने की चिड़िया थे। अब हमें लाचार, बेकार, बीमार कौन बना रहा है? हमारी जीडीपी 6% पर कभी पास, तो कभी 3% तक पहुँच जाती है। यह हमारी सोने की चिड़िया को काटकर एक साथ सब कुछ निकालने से होता है।
सोने की चिड़िया को काटने वाली तकनीक आज एक ही आदमी के कब्जे में है। वह अरावली को कटवाकर इसमें से सब कुछ निकालने वाला है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अब उसी को जिम्मेदारी दी जा रही है। अरावली में बहुत खास सुरक्षा सामग्री भी है, इसलिए अचानक उसकी नजर इस आधे पहाड़ पर पड़ गई है।
अरावली के मूल आदिवासी भी अब खास खनन सामग्री निकालने हेतु हटाए जा सकते हैं। वन्यजीवों की तो बात ही क्या? वन-औषधियों की क्या अहमियत? जलवायु परिवर्तन, रेगिस्तान विस्तार, प्रदूषण, वर्षा चक्र के बदलाव, बाढ़–सुखाड़—इन सबको यह पहाड़ों से जुड़ा हुआ मानते ही नहीं।
जैसे अकेले रावण ने सभी कुछ अपने नियंत्रण में कर लिया था, वैसे ही आज का लोकतंत्र—पहाड़, नदी—सभी कुछ एक ही के बस में है। वह जो चाहे, न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका—सभी से करवाता है। अरावली में भी उसने वही करवा लिया है।
भारत के प्रधानमंत्री COP-15, COP-30 में क्या बोलकर आए हैं? उनके किए वादों की कोई कीमत है? नहीं—उसके लिए नहीं। प्रधानमंत्री भी उसे बचाने हेतु सभी कुछ दाँव पर लगा देता है। ट्रंप अमेरिका के साथ यही हुआ। भारत–अमेरिका रिश्ते तुड़वाने वाला भी वही है।
विश्व पर्वत दिवस 11 दिसंबर 2025 को अरावली विरासत जन अभियान उक्त हवाओं को अरावली में आने से रोकने हेतु खड़ा है। आधी अरावली पर्वतमाला और इसकी संस्कृति–प्रकृति को बचाने हेतु यह आंदोलन खड़ा हुआ है। अरावली का प्रत्येक वनवासी, जीव–जन्तु, पेड़–पौधे, वन्य जीव—सभी आज जयपुर में संकल्पित हो रहे हैं। आधा पहाड़ खुद भी अपने विरोधियों को रोकेगा।