अरावली को सिर्फ एक पहाड़ मानना सार्थक नहीं है। पहाड़ियों की यौगिक श्रृंखला मानना ही सत्य होगा।
राजेन्द्र सिंह
अरावली भूरे रंग की फिजिओेग्राफी पहाड़ी नहीं है। भूगर्भीय विज्ञान की दृष्टि से, यह प्राचीनतम काल में निर्मित विविध पहाड़ियों के रूप में एक संपूर्ण श्रृंखला है। यह एक ही समय में निर्मित नहीं है, मनुष्य की उत्पत्ति से पूर्व की निर्मित भूभाग है। ऊँचा-नीचा भूभाग, जो धीरे-धीरे, समुद्र के गर्भ से जन्मी, भूमि पर ही भूमि से भी ऊपर उठता हुआ एक क्षेत्र है। इसे ही हम अलग-अलग पहाड़ी, पठारी, मैदानी रूप में पूरी अरावली की एक श्रृंखला को देखते हैं।
अरावली को सिर्फ एक पहाड़ मानना सार्थक नहीं है। पहाड़ियों की यौगिक श्रृंखला मानना ही सत्य होगा। ऐसी श्रृंखला जिसमें वन, ताल, झाल, झील, वन्यजीव, आवास, पहाड़ियाँ, पठार, मैदान सभी कुछ हैं। अरावली नाम का एक क्षेत्र ही है। इसी भूभाग को लोकभाषा में ‘आडा पर्वत’ का नाम दिया गया है।
692 किमी, जो आडा पहाड़ पहचान वाला क्षेत्र अरावली है। इसे फिजिओग्राफी और भौतिकीय भूभाग, जियोलॉजी (भूगर्भ) शास्त्रीय भाषाओं द्वारा अपनी नई अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी के फेरे में डालकर एक या चंद लोगों की स्वार्थपूर्ति का शिकार नहीं बना सकते हैं।
अरावली भगवान का निर्मित अंग है। इसे विज्ञान, अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी का रंग चढ़ाकर अरावली के लोगों को मूर्ख बनाना अन्याय है। यह अन्याय केवल हमारी पीढ़ियों के साथ ही नहीं बल्कि अगली पीढ़ियों के साथ तो शैक्षणिक अपराध भी है। आज अरावली की मूल परिभाषा को बदलने का न्यायपालिका, विधिपालिका तथा कार्यपालिका को अधिकार नहीं है।
भगवत अंगों को बदलना इंसानी काम नहीं है। जिन भगवत अंगों (पंचमहाभूतों) से इंसान बना है, उन्हीं पंचमहाभूतों से अरावली बनी है। पंचमहाभूत तत्व (भ भूमि, ग-गगन, व-वायु, अ-अग्नि, न-नीर)भगवान है। इन भगवत तत्वों पर भी अब सरकार अपना अधिकार जमाएगी तो फिर क्या बचेगा? हमारी संस्कृति, प्रकृति कैसे बचेगी? सभी कुछ धीरे-धीरे नष्ट ही होगा।
अरावली भगवान है।
इसकी परिभाषा बदलने का हक, न्यायपालिका, विधिपालिका और कार्यपालिका किसी का नहीं है। इनका कर्तव्य और अधिकार तो भगवान के कार्यों में सहयोग करना है, भगवान को नष्ट करना नहीं है। जो भगवान को नष्ट करने की कोशिश करता है, वह स्वयं नष्ट होता है। अरावली को लाभ-हानि की बहस में फंसाए बिना भगवान का अंग मानकर बचाएं।
उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई परिभाषा में अरावली को भगवान का अंग नहीं बल्कि एक मरे निर्जीव पत्थरों का ढेर मान लिया है। जबकि तरुण भारत संघ के केस में उच्चतम न्यायालय ने इसे प्रकृति, प्राकृतिक धरोहर विरासत मानकर संरक्षित क्षेत्र घोषित कराया था।
अभी न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय अरावली को न्याय नहीं है। बाद में यह हमारी शैक्षणिक संस्थाओं में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया निर्णय ही पढ़ाया जाएगा तो यह एक शैक्षणिक अपराध जैसा ही बन जाएगा। पूरी अरावली को एक ही भूगर्भीय परिभाषा के प्रकाश में देखना चाहिए। फिजियोग्राफी, भौतिकी इकाई नहीं माना जाए।
यह जीवित भूगर्भीय श्रृंखला भगवान है। यह भगवान ने इंसान का संपूर्ण जीव जगत की जरूरत पूरा करने हेतु व्यवस्था बनाई है। लेकिन भगवान ने इंसान के लालचपूर्ति की व्यवस्था नहीं बनाई है। अरावली को मिला अभी का निर्णय लालच का निर्णय है, इसलिए भगवान के विपरीत है। उच्चतम न्यायालय इस निर्णय पर पुनर्विचार करेगा तो भगवान का काम होगा। अरावली बचेगी तो भारत की रीढ़, संस्कृति और प्रकृति दोनों का पोषण होगा।