खेती और पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी है दीमक?
खेती और पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी है दीमक?

खेती और पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी है दीमक?

“ऊई हुंका” अर्थात  दीमक की बाँबियाँ  लुप्त होने का अर्थ है कि धरती संकट में हैं ।

पंकज चतुर्वेदी

उड़ीसा का कश्मीर कहलाने वाले कंधमाल जिले के दरीनगबाड़ी के  किसानों की चिंता  है कि उनके खेत-जंगलों से “ऊई हुंका” गायब होते जा रहे हैं। भले ही पूरे देश के  शहरी इलाकों में “ऊई हुंका” से मुक्ति के लिए बाकायदा एजेंसियां काम करती हैं लेकिन जंगल-खेत के लोग जानते हैं कि उनके गायब होने से न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति प्रभावित होती है बल्कि यह प्राकृतिक भूमिगत जल पुनर्भरण प्रणाली को भी कमजोर कर सकता है, जो इस क्षेत्र में वनों के संरक्षण और सतत पर्यावरणीय प्रथाओं की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।

विदित हो ओडिशा के कंधमाल जिले में मुख्य रूप काँध  जनजाति निवास करती है, जिसमें कुटिया कंधा और डोंगरिया कंधा  तो विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) उप-समूह शामिल हैं। इनका मुख्य व्यवसाय जैविक हल्दी की खेती और वनोपज संग्रहण है। वे जंगली उत्पादों, जैसे महुआ, शहद और इमली को इकट्ठा करके बेचते हैं और हल्दी की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं। 

आदिवासी मानते हैं कि “ऊई हुंका” अर्थात  दीमक की बाँबियाँ  लुप्त होने का अर्थ है कि धरती संकट में हैं । उड़ीसा के बालासोर में तो 30 फुट ऊंची बाँबी  पर  बाकायदा मेला  लगता हैं । इसका मूल कारण जलवायु परिवर्तन तो है ही , खेतों में अंधाधुंध  रासायनिक कीटनाशकों ने भी प्रकृति मित्र  दीमक को बड़ा कहता दिया है ।

दीमक की बस्ती अर्थात ऊंचे- ऊंचे टीलों को  जंगल के निवासी बहुत पवित्र मानते हैं । इन ‘उईहुंका’ को बेहतर पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण प्राकृतिक संकेतक माना  जाता है । ये दरीनगबाड़ी के जंगलों से धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं, जिससे स्थानीय लोग और पर्यावरणीय पर्यवेक्षक चिंतित हैं। प्रकृति और पारिस्थिक संतुलन से घनिष्ठ रूप से जुड़े ये टीले वन्य पारिस्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, जलवायु परिवर्तन और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई ने उनकी संख्या में निरंतर कमी ला दी है। सनद रहे भारत सरकार की एक रिपोर्ट में ओडिसा को जलवायु परिवर्तन के लिए सर्वाधिक प्रभावित राज्य में गिन जाता है और यहाँ के लोग साल दर  साल असमान वर्षा आवृति  और ग्रीष्म, मानसून तथा शीतकाल के बीच असामान्य उतार-चढ़ाव झेल रहे हैं ।  दरीनगबाड़ी को अपनी शुद्ध पर्यावरण और अनोखी भौगोलिक स्थिति के लिए जाना जाता है।

पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र नदियों, धाराओं, विविध वनस्पतियों और सैकड़ों औषधीय पौधों की प्रजातियों से समृद्ध है। परंपरागत रूप से इन जंगलों में अनेक दीमक के टीले  बने रहते थे, लेकिन हाल के वर्षों में वनों की कटाई और पर्यावरणीय दबाव के कारण उनकी उपस्थिति काफी घट गई है। दीमक कि उपस्थित जंगल में जलवायु और मिट्टी के  बेहतर स्वास्थ्य  का प्रमाण तो है ही । इन्हें भूजल स्रोतों की पहचान करने में मदद के लिए भी पहचान जाता है । यह भूजल उपलब्धता का  प्राकृतिक संकेतक है ।

दीमक के टीले  की संरचना प्रकृति के सबसे विस्मयकारी चमत्कारों में से एक है। इसे अगर ‘कीटों द्वारा निर्मित वास्तुकला का शिखर’ कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बाहर से मिट्टी का एक बेजान ढेर दिखने वाला यह टीला भीतर से एक आधुनिक महानगर की तरह व्यवस्थित और तकनीकी रूप से उन्नत होता है। एक टीले की बनावट ऐसी होती है कि बाहर चाहे कितनी भी चिलचिलाती धूप या ठंड हो, उसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर रहता है।

दीमक अपनी बांबी को इस तरह डिजाइन करते हैं कि उसमें ‘नैचुरल वेंटिलेशन’ या प्राकृतिक वायु-संचार होता रहे। टीले के भीतर कई महीन छेद और ऊर्ध्वाधर नलिकाएं होती हैं। गर्म हवा ऊपर की ओर उठकर टीले के ऊपरी छिद्रों से बाहर निकल जाती है, जबकि ठंडी और ताजी हवा नीचे के रास्तों से अंदर आती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी आधुनिक इमारत में ‘सेंट्रल एयर कंडीशनिंग’ काम करती है।

दीमक एक अत्यंत अनुशासित सामाजिक जीव हैं। इनके समाज में कार्य-विभाजन स्पष्ट होता है। रानी दीमक पूरे कुनबे की जननी होती है। रानी दीमक का आकार अन्य दीमकों की तुलना में बहुत बड़ा (कई सेंटीमीटर लंबा) हो सकता है। उसका मुख्य काम केवल अंडे देना है। एक स्वस्थ रानी एक दिन में 20,000 से 30,000 अंडे तक दे सकती है। रानी दीमक का जीवनकाल भी काफी लंबा होता है, जो 15 से 25 वर्षों तक हो सकता है। अक्सर आदिवासी इनका शिकार कर भून कर खाते हैं ।  वहीं राजा पूरी उम्र रानी के साथ रहता है और प्रजनन प्रक्रिया में सहयोग करता है।

श्रमिक दीमक टीले की सबसे बड़ी आबादी होते हैं। इनका काम भोजन जुटाना, टीले की मरम्मत करना, रानी और बच्चों (लार्वा) की देखभाल करना और ‘फंगस गार्डन’ की खेती करना है। फिर आते हैं सैनिक दीमक जिनके  सिर बड़े और जबड़े मजबूत होते हैं। इनका एकमात्र काम टीले की रक्षा करना है, विशेषकर चींटियों जैसे दुश्मनों से।

टीले के सबसे सुरक्षित हिस्से में रानी का कक्ष  होता है। इसके अलावा, टीले के भीतर ‘फंगस गार्डन’ (कवक के बगीचे) होते हैं। दीमक चबाए हुए लकड़ी के बुरादे पर एक विशेष प्रकार की फंगस उगाते हैं। यह फंगस लकड़ी के जटिल रेशों को तोड़कर उसे सुपाच्य बनाती है, जिसे दीमक खाते हैं। यह एक तरह की ‘इनडोर फार्मिंग’ है जिसे दीमक लाखों सालों से कर रहे हैं।

दीमक अपने टीले बनाने के लिए मिट्टी, अपने मल और लार  के मिश्रण का उपयोग करते हैं। सूखने के बाद यह मिश्रण कंक्रीट जैसा मजबूत हो जाता है, जिसे हाथ से तोड़ना भी मुश्किल होता है। यह मजबूती ही उन्हें बारिश और शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करती है।  कुछ टीले पांच से छह फुट तक ऊँचे हो जाते हैं ।  

दीमक का टीला केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि एक जीवित मशीन है जो नमी, ऑक्सीजन और भोजन का संतुलन बनाए रखती है। पतझड़ के बाद  दीमक तेजी से पत्ते खा  कर कुछ ही दिनों में उसे  उन्नत मिट्टी की ऊपरी परत में बदल देती हैं , जिस पर खेती कर आदिवासी अपना जीवन-यापन करते हैं ।

हमारी दृष्टि में अक्सर दीमक का अस्तित्व केवल एक विनाशकारी कीट का है, जो चुपचाप लकड़ी के फर्नीचर या कृषि की खड़ी फसलों को चट कर जाता है। ‘दीमक की तरह चाटना’ मुहावरा भी विनाश और क्षरण का ही प्रतीक बन चुका है। लेकिन विज्ञान और पारिस्थितिकी की गहरी परतों में झांकें तो तस्वीर इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। प्रकृति के विशाल कैनवास पर दीमक एक ऐसा ‘मूक इंजीनियर’ है, जिसके बिना जंगलों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और हमारी खेती की मिट्टी बेजान हो सकती है। जिसे हम विनाश समझते हैं, वह दरअसल पुनर्चक्रण  की एक जटिल और अनिवार्य प्रक्रिया है।

दीमक का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ‘सेल्युलोज’ के पाचन में निहित है। पेड़-पौधों की मृत सूखी टहनियां और पत्तियां सेल्युलोज से बनी होती हैं, जो प्रकृति का सबसे कठिन जटिल पदार्थ है। यदि दुनिया में दीमक न होते, तो जंगल और खेत मृत लकड़ी और सूखे पत्तों के अंबार से पट जाते। दीमक के शरीर के भीतर मौजूद विशेष सूक्ष्मजीव इस जटिल पदार्थ को तोड़कर वापस मिट्टी में मिला देते हैं।

यह एक जादुई रूपांतरण है—मृत लकड़ी का उपजाऊ खाद में बदल जाना। इस प्रक्रिया के माध्यम से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व वापस मिट्टी का हिस्सा बनते हैं, जिससे नए पौधों को जीवन मिलता है। इसी कारण दीमक को प्रकृति का सबसे बड़ा ‘सफाईकर्मी’ और ‘खाद उत्पादक’ माना जाता है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में दीमक का महत्व और भी बढ़ गया है। हाल के अंतरराष्ट्रीय शोधों, विशेषकर ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययनों ने यह चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है कि सूखे के समय दीमक पौधों के लिए ‘जीवनरक्षक’ की भूमिका निभाते हैं। दीमक अपनी सुरंगों के माध्यम से जमीन की गहराई से नमी को ऊपर की परतों तक लाते हैं।

यह नमी छोटे पौधों और वनस्पतियों को भीषण गर्मी में भी जीवित रखने में सहायक होती है। अक्सर देखा गया है कि जंगलों में दीमक की बांबियों  के आसपास की वनस्पतियां अन्य स्थानों की तुलना में अधिक हरी-भरी और समृद्ध होती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि दीमक केवल जीव नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र  का निर्माण करते हैं।

खेती के संदर्भ में दीमक को लेकर जो चिंताएं व्यक्त की जाती हैं, वे अक्सर हमारी प्रबंधन की गलतियों का परिणाम होती हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि दीमक की पहली पसंद ‘मृत कार्बनिक पदार्थ’ होती है, जीवित फसल नहीं। जब किसान खेत से सारा कचरा, ठूंठ और पत्तियां साफ कर देता है और मिट्टी में कार्बनिक खाद (गोबर या खाद) की कमी हो जाती है, तब भूख से मजबूर होकर दीमक जीवित पौधों की जड़ों की ओर रुख करते हैं।

यदि हम मिट्टी को पर्याप्त प्राकृतिक कचरा और मल्चिंग उपलब्ध कराएं, तो दीमक कभी दुश्मन नहीं बनेंगे, बल्कि मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले सबसे सस्ते और प्रभावी मजदूर साबित होंगे। वे मिट्टी के रासायनिक गुणों को सुधारते हैं और उसकी अम्लता व क्षारीयता को संतुलित करने में मदद करते हैं। शोध बताते हैं कि दीमक की बांबी के आसपास की मिट्टी में साधारण मिट्टी की तुलना में नाइट्रोजन की मात्रा 50% अधिक हो सकती है।

दीमक का होना मिट्टी के जीवित होने का प्रमाण है। वे उस ‘पुनर्जन्म’ की प्रक्रिया के वाहक हैं, जहां अंत ही नए जीवन का आरंभ बनता है। आधुनिक कृषि और पर्यावरण संरक्षण में दीमक को खत्म करने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने और उनके साथ सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता है।

यदि हम चाहते हैं कि हमारी धरती का उपजाऊपन बना रहे और जंगल अपनी प्राकृतिक लय में सांस लें, तो हमें इस नन्हे जीव की अनिवार्य उपयोगिता को स्वीकार करना ही होगा।

भारत में दीमक की बाँबियाँ खत्म होने के प्रमुख कारण

1. रासायनिक कीटनाशकों और दीमकनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग

सबसे बड़ा कारण है कृषि रसायनों का अत्यधिक उपयोग

  • क्लोरोपाइरीफॉस
  • इमिडाक्लोप्रिड
  • फिप्रोनिल
  • क्लोरोपाइरीफॉस + साइपरमेथ्रिन जैसे मिश्रण

ये रसायन:

  • केवल फसल-नुकसान करने वाली दीमक ही नहीं
  • बल्कि पूरी कॉलोनी (रानी, श्रमिक, सैनिक) को खत्म कर देते हैं

 परिणाम:
एक बार कॉलोनी नष्ट हुई तो बाँबी दोबारा नहीं बनती, क्योंकि दीमक का पुनर्वास बेहद धीमा होता है।

2. खेती का मशीनीकरण और गहरी जुताई

पिछले 30–40 वर्षों में:

  • ट्रैक्टर
  • रोटावेटर
  • हैरो
  • सब-सॉइलर

के उपयोग से:

  • मिट्टी की गहराई तक बनी दीमक सुरंगें टूट जाती हैं
  • बाँबी की आंतरिक संरचना नष्ट हो जाती है

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार:

दीमक की कॉलोनी 10–15 साल में बनती है, लेकिन मशीन एक दिन में उसे नष्ट कर देती है।

3. बाँबियों को “बेकार” समझकर तोड़ना

ग्रामीण और वन क्षेत्रों में:

  • बाँबियों को खेत के लिए बाधा
  • या अंधविश्वास से जुड़ी चीज़ मानकर तोड़ा जाता है।

कई राज्यों में सड़क, बिजली लाइन, खेत समतलीकरण
के दौरान बाँबियाँ बिना किसी पर्यावरण आकलन के हटा दी जाती हैं।

4. जंगलों का क्षरण और पत्तों की सफाई (Leaf litter removal)

दीमक के जीवन के लिए आवश्यक है:

  • सूखी पत्तियाँ
  • गिरी लकड़ी
  • मृत जैव पदार्थ

लेकिन जंगलों में ईंधन लकड़ी के लिए सफाई, पत्तों को जलाना, “साफ जंगल” की वन-नीति से दीमक का भोजन खत्म हो रहा है।  बिना भोजन के कॉलोनी जीवित नहीं रह सकती।

5. जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की नमी में गिरावट

दीमक को चाहिए स्थिर तापमान और नियंत्रित नमी लेकिन अनियमित बारिश, लंबा सूखा अत्यधिक गर्मी से बाँबियाँ सूख जाती हैं, अंडे और रानी मर जाती है विशेषकर मध्य भारत, बुंदेलखंड, विदर्भ, तेलंगाना में यह प्रभाव साफ दिखता है।

6. जैविक कार्बन की कमी (Soil Organic Carbon)

रासायनिक खेती के कारण:

  • गोबर
  • कम्पोस्ट
  • फसल अवशेष

मिट्टी में कम जा रहे हैं।

जब मिट्टी में जैविक कार्बन 0.5% से नीचे जाता है, तो:

  • दीमक जीवित नहीं रह पाती
  • बाँबी निर्माण रुक जाता है

भारत के कई खेतों में SOC अब 0.3–0.4% तक गिर चुका है।

7. वन्यजीवों और खाद्य-श्रृंखला का टूटना

दीमक बाँबियाँ खत्म होने से:

  • चींटीखोर (anteater)
  • सरीसृप
  • कई पक्षी प्रजातियाँ

भी घट रही हैं।

यह पूरा पारिस्थितिक पतन (ecological collapse) का संकेत है।