तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में इस साल गर्मी ने समय से पहले दस्तक
पंकज चतुर्वेदी
भले ही उत्तर और मध्य भारत बेमौसम बरसात से हैरान-परेशान है लेकिन भारत का दक्षिणी हिस्सा इन दिनों तीखी गर्मी के साथ एक ऐसी भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौती का सामना कर रहा है, जिसकी कल्पना दशकों पहले नहीं की गई थी।
जहाँ उत्तर भारत की लू अपनी शुष्कता के लिए जानी जाती है, वहीं दक्षिण भारत में बढ़ती गर्मी, आर्द्रता और खतरनाक पराबैंगनी यानि अल्ट्रा वायलेट किरणों का मिश्रण एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल की ओर इशारा कर रहा है।
भारत का दक्षिणी हिस्सा जो समुद्र के किनारों के करीब है, जो कभी अपनी सुखद जलवायु, मानसूनी हरियाली और समृद्ध जलस्रोतों के लिए जाना जाता था, आज जलवायु परिवर्तन के एक भयावह दौर से गुजर रहा है।
तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में इस साल गर्मी ने न केवल समय से पहले दस्तक दी है, बल्कि अपने साथ पराबैंगनी विकिरण और सतही ओज़ोन का एक ऐसा घातक मेल लेकर आई है, जिसने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। यह संकट केवल बढ़ते तापमान का नहीं है, बल्कि उस वायुमंडलीय असंतुलन का है जो इंसान और प्रकृति दोनों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन गया है।
दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति इसे सूर्य की किरणों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। भूमध्य रेखा से निकटता और कई क्षेत्रों की ऊंचाई के कारण यहाँ विकिरण का प्रभाव उत्तर भारत की तुलना में अधिक तीव्र होता है। इस वर्ष के आंकड़े डराने वाले हैं।
कर्नाटक की राजधानी और कभी ‘गार्डन सिटी’ कहे जाने वाले बेंगलुरु में इस बार यूवी इंडेक्स 12 से 13 के बीच दर्ज किया गया है। वैज्ञानिक मानकों के अनुसार, 11 से ऊपर का सूचकांक चरम श्रेणी में माना जाता है, जिसका अर्थ है कि बिना सुरक्षा के धूप में मात्र दस मिनट रहने पर भी त्वचा की कोशिकाओं को स्थायी नुकसान पहुँच सकता है।
इसी तरह तमिलनाडु के तटीय शहरों और विशेषकर चेन्नई में यूवी स्तर 11 के पार पहुँच गया है। चेन्नई के पल्लीकरनै जैसे क्षेत्रों में जल निकायों के सूखने से परावर्तन का प्रभाव बढ़ा है, जिससे स्थानीय स्तर पर विकिरण की तीव्रता और घातक हो गई है।
केरल के तिरुवनंतपुरम और कोच्चि जैसे शहरों में भी यूवी इंडेक्स 10 से 11 के बीच बना हुआ है। केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की हालिया रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि राज्य के लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सों में विकिरण का स्तर सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है।
जलवायु परिवर्तन का एक और काला पक्ष सतही ओज़ोन का बढ़ता स्तर है। ओज़ोन की जो परत समताप मंडल में हमारी रक्षा करती है, वही जब बढ़ती गर्मी और प्रदूषण के कारण ज़मीन के पास बनती है, तो ज़हर बन जाती है।
दक्षिण भारत के महानगरों में बढ़ती गाड़ियों की संख्या और उच्च तापमान ने मिलकर एक ऐसी रासायनिक प्रयोगशाला बना दी है, जहाँ सूर्य की तीव्र किरणें नाइट्रोजन ऑक्साइड के साथ क्रिया कर ओज़ोन पैदा कर रही हैं। यह गैस श्वसन तंत्र पर सीधा प्रहार कर रही है, जिससे अस्थमा और फेफड़ों की सूजन के मामले दक्षिण भारत के शहरों में बीस प्रतिशत से अधिक बढ़ गए हैं।
पराबैंगनी किरणों और ओज़ोन के इस दोहरे हमले ने दक्षिण भारतीय आबादी को गंभीर रोगों की चपेट में ले लिया है। तीव्र यूवी विकिरण सीधे डीएनए को नुकसान पहुँचाता है, जिससे त्वचा कैंसर के शुरुआती लक्षणों में वृद्धि देखी गई है।
इसके अलावा, आँखों की पुतलियाँ इन किरणों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं, जिससे कम उम्र में ही मोतियाबिंद और दृष्टिहीनता का खतरा बढ़ रहा है। शोध यह भी बताते हैं कि अत्यधिक विकिरण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है। इस त्रासदी की सबसे बड़ी मार उन लोगों पर पड़ रही है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं।
निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों के पास गर्मी से बचने का कोई विकल्प नहीं है। कर्नाटक और तमिलनाडु के भीतरी इलाकों में हीट स्ट्रोक के साथ-साथ गंभीर निर्जलीकरण के कारण गुर्दे की बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।
यह जलवायु असंतुलन केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत की समृद्ध जैव विविधता को भी निगल रहा है। तमिलनाडु और कर्नाटक के प्रमुख फसल क्षेत्रों में यूवी किरणों के कारण पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया बाधित हो रही है, जिससे पैदावार में गिरावट आ रही है।
विशेषकर धान और दलहन की फसलें इस विकिरण के प्रति अधिक संवेदनशील पाई गई हैं। तटीय इलाकों में बढ़ता तापमान और विकिरण समुद्री पारिस्थितिकी को भी बिगाड़ रहा है। उथले पानी में रहने वाले प्लवक, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं, नष्ट हो रहे हैं, जिसका सीधा असर मछलियों की संख्या और मछुआरों की जीविका पर पड़ रहा है।
पल्लीकरनै जैसी आर्द्रभूमि का विनाश इस संकट को और गहरा करता है। 165 जलस्रोतों का गायब होना केवल पानी की कमी नहीं है, बल्कि उस स्थानीय शीतलन प्रणाली का अंत है जो तापमान को नियंत्रित रखती थी।
दक्षिणी राज्यों में जो हम देख रहे हैं, वह जलवायु परिवर्तन की ओर बढ़ते कदम हैं। जब एक बार पारिस्थितिक तंत्र की सहने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तो उसे पुनर्जीवित करना लगभग असंभव होता है। ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम जैसी सरकारी पहलें कार्यान्वयन के स्तर पर लड़खड़ा रही हैं।
बिना वैज्ञानिक समझ के किया गया वृक्षारोपण केवल आंकड़े भर सकता है, लेकिन वह विकिरण और ओज़ोन के इस घातक चक्र को नहीं तोड़ सकता। इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए हमें युद्ध स्तर पर काम करने की आवश्यकता है। जैसे हम तापमान मापते हैं, वैसे ही प्रत्येक शहर में यूवी इंडेक्स की रीयल-टाइम जानकारी देने वाली व्यवस्था होनी चाहिए।
शहरों में कंक्रीट के विस्तार को रोककर घने वनों का विकास करना होगा जो प्राकृतिक रूप से ओज़ोन के प्रभाव को कम कर सकें। दक्षिण भारत के राज्यों को विशेष सुरक्षा कानून लाने चाहिए, जिसके तहत दोपहर के समय खुले में शारीरिक श्रम को प्रतिबंधित किया जाए।
दक्षिण भारत आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रकृति अपनी पूरी शक्ति से हमें चेतावनी दे रही है। कर्नाटक की सिलिकॉन वैली से लेकर तमिलनाडु के तटों और केरल के शांत बैकवाटर तक, गर्मी और विकिरण का यह जाल हम सबकी सामूहिक विफलता का परिणाम है।
यदि हमने अपनी विकास योजनाओं में प्रकृति के संरक्षण, जल निकायों की रक्षा और प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता नहीं दी, तो आने वाले समय में दक्षिण की यह गौरवशाली धरती इंसानी निवास के लिए अत्यंत कठिन हो जाएगी। यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि कठोर और त्वरित नीतिगत बदलावों का है ताकि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और रहने योग्य पर्यावरण सौंप सकें।