अल नीनो की धमक ने वैशाख को जेठ बनाया

भारत में बढ़ती तपिश और जानलेवा होती लू

खजुराहो- 45 डिग्री , भटिंडा -43 डिग्री , कानपुर 45 दिल्ली एनसीआर  43 डिग्री! अप्रैल के  तीसरे हफ्ते में मौसम के यह मिजाज है तो डर  लगता है कि आने वाले दो महीने सूरज कैसी आग बरसाएगा । भारत में बढ़ती तपिश और जानलेवा होती लू के पीछे छिपे जलवायु परिवर्तन के गहरे संकट को अल नीनो के रुख ने और घातक कर दिया है ।

मौसम विज्ञान के नवीनतम आँकड़े भविष्य की जिस भयावहता को रेखांकित कर रहे हैं उसकी बानगी अप्रैल के दूसरे हफ्ते  से देखने को मिल गई जिस दौरान देश के बड़े हिस्से में सूरज की तपिश ने जून जैसी स्थिति पैदा कर दी। दुनिया के सबसे गर्म शहरों की सूची में भारतीय शहरों का दबदबा एक गंभीर पर्यावरणीय चेतावनी है।

यह महज एक मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि वायुमंडल में बनते ‘हीट डोम’ और कंक्रीट के फैलते जंगलों का नतीजा है, जिसने शहरों को ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में तब्दील कर दिया है। जहाँ ग्रामीण इलाके रात में ठंडे हो जाते हैं, वहीं शहरों में रात का तापमान सामान्य से काफी ऊपर बना रहता है, जिससे मानव शरीर को पिछले दिन की गर्मी से उबरने का समय नहीं मिल पा रहा।

स्काईमेट वेदर  की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट इस स्थिति को और अधिक चिंताजनक बनाती है, जिसके अनुसार इस साल भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून ‘सामान्य से कम’ रहने का अनुमान है। आंकड़े बताते हैं कि यह दीर्घावधि औसत  एल  पी ए ) का लगभग 94% तक सिमट सकता है।

सबसे भयावह तथ्य यह है कि अल नीनो, जो वर्तमान में अपनी प्रारंभिक अवस्था में है, मानसून के शुरुआती दौर में विकसित होकर अगस्त और सितंबर के दौरान और अधिक मजबूत होगा। हालांकि जून में मानसून की शुरुआत 101% LPA के साथ सामान्य रह सकती है, लेकिन जुलाई (95%) से स्थिति बिगड़नी शुरू होगी। इसका सबसे अधिक खतरा मध्य भारत के वर्षा आधारित क्षेत्रों और उत्तर-पश्चिम भारत के राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान पर मंडरा रहा है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर स्काईमेट वेदर की भविष्यवाणियाँ भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत दे रही हैं। इस वर्ष मानसून पर अल नीनो का काला साया मंडराता दिख रहा है, जिसके कारण कुल वर्षा लंबी अवधि के औसत यानी एलपीए का केवल 94 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और इसके मई से जुलाई के बीच सक्रिय होने की प्रबल संभावना है, जो ऐतिहासिक रूप से भारतीय मानसून को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। हालांकि मानसून की शुरुआत जून के महीने में सामान्य रह सकती है, लेकिन जैसे-जैसे सीजन आगे बढ़ेगा, अल नीनो का प्रभाव गहराता जाएगा।

विशेष रूप से अगस्त और सितंबर के महीनों में वर्षा के स्तर में भारी गिरावट आने की आशंका है, जो रबी और खरीफ दोनों फसलों के लिए संकट पैदा कर सकता है। क्षेत्रीय स्तर पर इसका सबसे अधिक प्रभाव उत्तर और मध्य भारत के वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर रहने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि गर्मी की इस बढ़ती आवृत्ति का सीधा संबंध वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि से है। 1981 से 2020 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 1 डिग्री बढ़ चुका है। ध्यान देना होगा कि भारत में शहरीकरण बढ़ रहा है ।  तभी  पहले लू का प्रभाव केवल गंगा के मैदानी इलाकों तक सीमित था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़कर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैल गया है।

शहर यानि पक्की सड़कने आलीशान भवन और  कंक्रीट और डामर की सड़कें प्राकृतिक मिट्टी की तुलना में कई गुना अधिक गर्मी अवशोषित करती हैं। रात के समय जब ग्रामीण इलाके ठंडे होने लगते हैं, शहर की ये इमारतें अपनी जमा की हुई गर्मी को छोड़ती रहती हैं। इसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है, जिसके कारण शहरों का तापमान आसपास के गांवों से 5 से 7 डिग्री सेल्सियस तक अधिक बना रहता है।

समझना होगा कि सन् अल नईनों और ला नीना है क्या ।  1600 में पश्चिमी पेरू के समुद्र तट पर मछुआरों ने दर्ज की, जब क्रिसमस के आसपास सागर का जल स्तर असामान्य रूप से बढ़ता दिखा। इसी मौसमी बदलाव को स्पेनिश शब्द अल नीनो परिभाषित किया गया, जिसका अर्थ होता है— छोटा बच्चा या ‘बाल-यीशु’।

अल नीनो असल में मध्य और पूर्व-मध्य भूमध्यरेखीय समुद्री सतह के तापमान में नियमित अंतराल के बाद होने वाली वृद्धि है जबकि ला नीना इसके विपरीत अर्थात् तापमान कम होने की मौसमी घटना को कहा जाता है। ला नीना भी स्पेनिश भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है छोटी बच्ची।

दक्षिणी अमेरिका से भारत तक के मौसम में बदलाव के सबसे बड़े कारण अल नीनो और ला नीना प्रभाव ही होते हैं। अल नीनो का संबंध भारत व ऑस्ट्रेलिया में गर्मी और सूखे से है, वहीं ला नीना अच्छे मानसून का वाहक है और इसे भारत के लिए वरदान कहा जा सकता है। भले ही भारत में इसका असर हो लेकिन अल नीनो और ला नीना घटनाएं पेरू के तट (पूर्वी प्रशांत) और ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट (पश्चिमी प्रशांत) पर घटित होती हैं। हवा की गति इन प्रभावों को दूर तक ले जाती है।

यहाँ जानना जरूरी है कि भूमध्य रेखा पर समुद्र की सीधी किरणें पड़ती हैं। इस इलाके में पूरे 12 घंटे निर्बाध सूर्य के दर्शन होते हैं और इस तरह से सूर्य की ऊष्मा अधिक समय तक धरती की सतह पर रहती है। तभी भूमध्य क्षेत्र या मध्य प्रशांत इलाके में अधिक गर्मी पड़ती है व इससे समुद्र की सतह का तापमान प्रभावित रहता है।

आम तौर पर सामान्य परिस्थिति में भूमध्यरेखीय हवाएं पूर्व से पश्चिम (पछुआ) की ओर बहती हैं और गर्म हो चुके समुद्री जल को ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी समुद्री तट की ओर बहा ले जाती हैं। गर्म पानी से भाप बनती है और उससे बादल बनते हैं व परिणामस्वरूप पूर्वी तट के आसपास अच्छी बरसात होती है।

नमी से लदी गर्म हवाएं जब ऊपर उठती हैं तो उनकी नमी निकल जाती है और वे ठंडी हो जाती हैं। तब क्षोभ मंडल की पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली ठंडी हवाएं पेरू के समुद्री तट व उसके आसपास नीचे की ओर आती हैं। तभी ऑस्ट्रेलिया के समुद्र से ऊपर उठती गर्म हवाएं इससे टकराती हैं। इससे निर्मित चक्रवात को वॉकर चक्रवात कहते हैं। असल में इसकी खोज सर गिल्बर्ट वॉकर ने की थी।

अल नीनो परिस्थिति में पछुआ हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं व समुद्र का गर्म पानी लौट कर पेरू के तटों पर एकत्र हो जाता है। इस तरह समुद्र का जल स्तर 90 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो जाता है व इसके परिणामस्वरूप वाष्पीकरण होता है व इससे बरसात वाले बादल निर्मित होते हैं। इससे पेरू में तो भारी बरसात होती है लेकिन मानसूनी हवाओं पर इसके विपरीत प्रभाव के चलते ऑस्ट्रेलिया से भारत तक सूखा हो जाता है।

ला नीना प्रभाव के दौरान भूमध्य क्षेत्र में सामान्यतया पूर्व से पश्चिम की तरफ चलने वाली अंधड़ हवाएं पेरू के समुद्री तट के गर्म पानी को ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं। इससे पेरू के समुद्री तट पर पानी का स्तर बहुत नीचे आ जाता है, जिससे समुद्र की गहराई का ठंडा पानी थोड़े से गर्म पानी को प्रतिस्थापित कर देता है।

इस अंधकारमय परिदृश्य के बीच एकमात्र उम्मीद ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (आई ओ डी ) से है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के अंत तक एक ‘पॉजिटिव आई ओ डी ‘ विकसित हो सकता है, जो अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक कम करने में सहायक हो सकता है।

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