भारत जल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025: हिमालय की शुद्धता से लेकर मैदानों के ‘जहर’ तक का सफर

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2025 के आंकड़े

शाहिद अख्तर, वरिष्ठ पत्रकार

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 2025 के आंकड़े साफ साफ आगाह करते हैं कि भारत का जल संकट अब केवल पानी की कमी का नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता के खत्म होने का है।

देश में पानी की शुद्धता के मामले में उत्तर-पूर्वी राज्य सबसे आगे हैं, जहाँ मिजोरम (92.5%) और सिक्किम (91%) जैसे राज्य एक मिसाल पेश कर रहे हैं। कम औद्योगीकरण और घने जंगलों के कारण यहाँ की नदियाँ अब भी जीवित हैं।

इसके ठीक विपरीत, भारत का हृदय स्थल यानी दिल्ली-NCR और उत्तर भारत के मैदानी इलाके एक Ecological Disaster का सामना कर रहे हैं। दिल्ली इस सूची में 50% के सबसे निचले स्कोर पर है, जिसका अर्थ है कि यहाँ का आधा जल संसाधन पूरी तरह मृत हो चुका है। यमुना अब नदी नहीं, बल्कि औद्योगिक कचरे और सीवेज का एक खुला नाला बन चुकी है।

मैदानी राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश (55%) में संकट केवल सतह पर नहीं, बल्कि जमीन की गहराई में भी है। यहाँ खेती में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने भूजल को ‘नाइट्रेट’ से भर दिया है, जो 59 जिलों में खतरनाक स्तर तक पहुँच चुका है। राजस्थान के 33 जिलों में पानी का खारापन और आयरन की मात्रा स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।

ये आंकड़े पूरी सच्चाई नही बयान करते हैं। नक्शे पर दिखने वाला औसत स्कोर असलियत नहीं बताता। हकीकत यह है कि NCR और उत्तर भारत के कृषि प्रधान इलाकों में CPCB का ‘क्लास A’ (यानी बिना ट्रीटमेंट के पीने लायक पानी) मिलना अब एक सपना बन गया है।

देश की 70% नदियाँ और जल स्रोत प्रदूषित हो चुके हैं, और सबसे ज्यादा प्रदूषित हिस्से (Polluted Stretches) इसी क्षेत्र में आते हैं।

अगर हम उत्तर भारत और NCR के दायरे से बाहर निकलकर शेष भारत की स्थिति देखें, तो संकट अपना रूप बदल लेता है। यहाँ समस्या केवल गंदगी की नहीं, बल्कि भारी धातुओं (Heavy Metals) और औद्योगिक रसायनों की भी है।

भारत के नक्शे पर महाराष्ट्र (58.5%) और गुजरात (63%) की स्थिति काफी चिंताजनक है। 2025 की CPCB रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में देश के सबसे अधिक 54 प्रदूषित नदी क्षेत्र हैं। मुंबई, पुणे और नासिक जैसे औद्योगिक शहरों के आसपास की नदियाँ—जैसे मीठी, मुला-मुथा और गोदावरी—में क्रोमियम और अन्य रसायनों की मात्रा सुरक्षित स्तर से बहुत ऊपर है। गुजरात में साबरमती नदी का हाल भी दिल्ली की यमुना जैसा ही है, जहाँ कई जगहों पर पानी में ऑक्सीजन (BOD) का स्तर लगभग खत्म हो चुका है।

पश्चिम बंगाल (67%), बिहार (68%) और ओडिशा (73%) की स्थिति एक अलग तरह का खतरा पेश करती है।

पश्चिम बंगाल और बिहार के मैदानी इलाकों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा बहुत अधिक है। इसे ‘स्लो पॉइजन’ कहा जाता है क्योंकि यह धीरे-धीरे हड्डियों और शरीर के अंगों को नुकसान पहुँचाता है। ओडिशा में औद्योगिक कचरे के साथ-साथ तटीय इलाकों में समुद्री पानी के घुसने (Salinity) की समस्या भी बढ़ रही है।

दक्षिण भारत के तमिलनाडु (75%), तेलंगाना (74%) और कर्नाटक (76%) जैसे राज्यों का स्कोर उत्तर भारत से बेहतर जरूर है, लेकिन यहाँ की नदियाँ अब ‘नालों’ में तब्दील हो रही हैं।

चेन्नई की कूअम (Cooum) और अडयार नदियाँ अब केवल सीवेज ढोने का जरिया बन गई हैं।

कर्नाटक के 76% स्कोर के बावजूद, बेंगलुरु की वृषभावती नदी और बेलंदूर जैसी झीलें रासायनिक झाग और भारी प्रदूषण के लिए जानी जाती हैं। यहाँ ‘Priority-1’ यानी सबसे खतरनाक श्रेणी के प्रदूषित क्षेत्र पाए गए हैं।

केरल जैसे राज्य, जो 85% स्कोर के साथ बेहतर दिखते हैं, वहां भी घनी आबादी की वजह से घरेलू सीवेज का नदियों में गिरना एक बड़ी समस्या है। लक्षद्वीप और अंडमान (लगभग 80%) जैसे द्वीप समूह तुलनात्मक रूप से सुरक्षित हैं।

कुल मिलाकर, 2025-26 के ये आंकड़े एक स्पष्ट चेतावनी हैं। पूरे देश की 70% नदियाँ प्रदूषित हैं और ‘साफ पानी’ अब एक बुनियादी अधिकार के बजाय एक लग्जरी (Luxury) बनता जा रहा है। पहाड़ों में पानी अब भी साफ है और दक्षिण में स्थिति को संभालने के प्रयास जारी हैं, लेकिन भारत का विशाल मैदानी और औद्योगिक क्षेत्र एक ऐसे जल संकट की गिरफ्त में है, जिससे उबरने के लिए अब समय बहुत कम बचा है।

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