दिल्ली और आसपास के इलाकों में गर्मी की आहट के साथ ही हवा का मिजाज बदलने लगा है
पंकज चतुर्वेदी
मई महीने के पहले हफ्ते में दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले के सरकारी एमएमजी अस्पताल में आए 100 में से दस मरीज अस्थमा से पीड़ित मिले । इनमें बच्चों और बुजुर्गों की संख्या अधिक है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में गर्मी की आहट के साथ ही हवा का मिजाज बदलने लगा है। हाल के वैज्ञानिक शोधों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि इस दौरान केवल धूल और धुआं ही नहीं, बल्कि हवा में तैरने वाले अदृश्य परागकण भी सांसों के दुश्मन बन रहे हैं।
वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट और अन्य शोध संस्थानों के आंकड़े बताते हैं कि मार्च से जून के बीच दिल्ली की हवा में परागकणों की सांद्रता सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है, जो सीधे तौर पर अस्थमा और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों को न्योता दे रही है।
प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका ‘द लांसेट’ के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान पौधों के परागण चक्र को प्रभावित कर रहा है, जिससे दिल्ली जैसे महानगरों में ‘एलर्जिक सीजन’ की अवधि पहले के मुकाबले चार सप्ताह तक बढ़ गई है।
कैसी विडंबना है कि जो पेड़ पर्यावरण सुधारने के इरादे से सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों में लगाए गए, वे ही आज लोगों के दम घुटने का कारक बन रहे हैं। दिल्ली की हरियाली में सिरस, गुलमोहर, सफेदा, शिरीष, आम, नीम और मोलसरी जैसे पेड़ों की बहुतायत है। वैसे तो ये पेड़ शहर के फेफड़े माने जाते हैं, लेकिन इनके परागकणों से होने वाली बीमारियों पर चर्चा बहुत कम होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, परागकणों की असली ताकत उनके भीतर मौजूद प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है। जब ये कण सांस के जरिए अंदर जाते हैं, तो मनुष्य के बलगम के साथ मिलकर और भी जहरीले हो जाते हैं। जैसे ही यह प्रोटीन हमारे खून में मिलता है, एक तीव्र एलर्जी को जन्म देता है, जो अंततः गंभीर श्वसन रोगों का कारण बनती है।
दिल्ली के रिज क्षेत्र और शहरी जंगलों में मौजूद विलायती कीकर जैसे पेड़ भी इस मौसम में भारी मात्रा में पराग छोड़ते हैं। गर्मी के कारण हवा शुष्क होती है, जिससे ये सूक्ष्म कण घंटों वातावरण में तैरते रहते हैं। ‘लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ’ की रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते स्तर के कारण पौधे न केवल अधिक पराग उत्पन्न कर रहे हैं, बल्कि उन परागकणों की मारक क्षमता भी पहले से कहीं अधिक घातक हो गई है।
आमतौर पर परागकणों के उपजने का समय मार्च से मई के मध्य तक होता है, लेकिन जैसे ही जून-जुलाई में हवा में नमी का स्तर बढ़ता है, ये पराग और भी जहरीले होकर रक्त में अवशोषित होने लगते हैं। यही कारण है कि इन महीनों में अस्पतालों की ओपीडी में सांस के मरीजों की संख्या में तीस प्रतिशत तक का इजाफा देखा जा रहा है।
तापमान और प्रदूषण का घातक मेल इस स्थिति को और भयावह बना देता है। चूंकि गर्मी में ओजोन लेयर का प्रभाव और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है, ऐसे में परागकणों के शिकार लोगों के फेफड़े ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं।
शोध बताते हैं कि जब तापमान चालीस डिग्री के पार जाता है, तो हवा में मौजूद जहरीली गैसें परागकणों की बाहरी परत को तोड़ देती हैं, जिससे एलर्जी पैदा करने वाले तत्व और भी सक्रिय हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और लांसेट के संयुक्त आंकड़ों के मुताबिक, प्रदूषित हवा और पराग का यह मेल अस्थमा के कारण अस्पताल में भर्ती होने की दर को पंद्रह प्रतिशत तक बढ़ा देता है।
यह स्थिति इतनी जटिल है कि फिलहाल हवा में परागकणों के प्रकार और उनके सटीक घनत्व का पता लगाने की कोई पुख्ता तकनीक भी उपलब्ध नहीं है।
खासकर उन लोगों के लिए खतरा अधिक है जो पहले से ही दमा या सांस की समस्या से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, सुबह और शाम के समय जब हवा की गति कम होती है, तब परागकणों का घनत्व सबसे अधिक होता है।
‘लांसेट पब्लिक हेल्थ’ की एक केस स्टडी बताती है कि दिल्ली-एनसीआर में लगभग पच्चीस प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में पराग एलर्जी से प्रभावित है, लेकिन जागरूकता के अभाव में लोग इसे सामान्य सर्दी-जुकाम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
इससे न केवल छींकें और आंखों में जलन होती है, बल्कि अचानक अस्थमा का दौरा पड़ने की आशंका भी बढ़ जाती है। शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट के ढांचे ‘हीट आइलैंड’ बनाते हैं, जो परागकणों को जमीन के करीब ही रोके रखते हैं, जिससे रिहायशी इलाकों में इनका प्रभाव बहुत ज्यादा होता है।
बचाव के लिए अब केवल मास्क ही काफी नहीं है, बल्कि जीवनशैली में बदलाव की भी जरूरत है। स्वास्थ्य विभाग के परामर्श के अनुसार, तेज धूप और आंधी के बाद हवा में पराग की मात्रा बढ़ जाती है, इसलिए संवेदनशील लोगों को ऐसे समय में घर के भीतर ही रहना चाहिए। घर लौटने पर हाथ-मुंह धोने और कपड़े बदलने जैसी छोटी सावधानियां भी शरीर में पराग के प्रवेश को रोकने में मददगार साबित हो सकती हैं।
‘लांसेट’ के विशेषज्ञों का सुझाव है कि बढ़ते तापमान के बीच श्वसन स्वास्थ्य को बचाने के लिए अब व्यक्तिगत सावधानी के साथ-साथ नीतिगत बदलाव भी जरूरी हैं। वृक्षारोपण के समय अब यह भी देखना होगा कि हम किन प्रजातियों को चुन रहे हैं।
आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी का सीजन लंबा होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब मौसम विभाग को वायु गुणवत्ता सूचकांक के साथ-साथ ‘पराग सूचकांक’ भी जारी करना चाहिए।
इससे लोगों को पहले से जानकारी मिल सकेगी कि किस दिन हवा में एलर्जी का खतरा अधिक है और वे अपनी सुरक्षा के लिए तैयार रह सकेंगे। बिना वैज्ञानिक प्रबंधन और व्यापक डेटा निगरानी के, दिल्ली की तपती गर्मी में सांस लेना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। पर्यावरण सुधारने के हमारे प्रयास कहीं अनजाने में सेहत के लिए भारी न पड़ जाएं, इस पर व्यापक शोध और जागरूकता ही एकमात्र समाधान है।