विश्व वर्षावन दिवस (22 जून): महत्व, उद्देश्य, थीम और संरक्षण के उपाय।

वर्षावनों के संरक्षण तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 22 जून को विश्व वर्षावन दिवस (वर्ल्ड रेन फोरेस्ट डे) मनाया जाता है। वास्तव में, यह दिवस पृथ्वी के उन अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को रेखांकित करता है, जो मानव जीवन, जैव-विविधता और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। आज स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। एक उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज लॉगिंग (पेड़ों की कटाई), अवैध खनन, अनियंत्रित विकास तथा कृषि विस्तार के कारण हर मिनट लगभग 40 फुटबॉल मैदानों के बराबर वर्षावन नष्ट हो रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार पिछले 50 वर्षों में अकेले अमेज़न वर्षावन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा समाप्त हो चुका है।

बहरहाल, यदि हम यहां पर इस दिवस के इतिहास की बात करें तो पाठकों को बताता चलूं कि विश्व वर्षावन दिवस की शुरुआत वर्ष 2017 में गैर-लाभकारी संस्था रेनफोरेस्ट पार्टनरशिप द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य वर्षावनों के संरक्षण के लिए विश्वभर के लोगों, संगठनों और सरकारों को एक साझा मंच पर लाना था। तब से यह दिवस विश्व के अनेक देशों में पर्यावरण संरक्षण अभियानों, वृक्षारोपण कार्यक्रमों, संगोष्ठियों तथा जन-जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से मनाया जा रहा है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि वर्षावन पृथ्वी के सबसे समृद्ध और जैव-विविधता वाले पारिस्थितिक तंत्र हैं। यद्यपि वे पृथ्वी की भूमि का अपेक्षाकृत छोटा भाग घेरते हैं, फिर भी इनमें विश्व की लगभग आधी से अधिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं। ये वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा पृथ्वी के जल-चक्र और वर्षा प्रणाली को संतुलित बनाए रखते हैं। लाखों आदिवासी और स्थानीय समुदाय अपनी आजीविका, संस्कृति और जीवन-निर्वाह के लिए वर्षावनों पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक चिकित्सा में उपयोग होने वाली 25 प्रतिशत से अधिक दवाओं के तत्व वर्षावनों के पौधों से प्राप्त होते हैं, जिनमें अनेक कैंसर-रोधी औषधियाँ भी शामिल हैं।

इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य आम लोगों को वर्षावनों के महत्व के प्रति जागरूक करना तथा उनके संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। यह सरकारों, संस्थाओं और नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करता है तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने का संदेश देता है। पिछले वर्ष अर्थात् 2025 में विश्व वर्षावन दिवस की थीम ‘एमपावरिंग एक्शन’ (कार्रवाई को सशक्त बनाना) रखी गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य वर्षावनों के संरक्षण हेतु जमीनी स्तर पर ठोस और प्रभावी कदम उठाने पर बल देना था। इस थीम के अंतर्गत स्वदेशी समुदायों को सशक्त बनाने तथा उनके पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया था। वहीं वर्ष 2026 की थीम ‘ द फोरेस्ट विद इन यू’ (आपके भीतर का जंगल) है। यह थीम इस विचार को प्रस्तुत करती है कि वर्षावन भले ही भौगोलिक रूप से हमसे दूर हों, लेकिन हवा, पानी और जलवायु के माध्यम से वे हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। यह मनुष्य और प्रकृति के गहरे एवं आंतरिक संबंध को रेखांकित करती है।

वर्षावनों से जुड़े अनेक तथ्य अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण हैं। वर्षावन पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के 3 प्रतिशत से भी कम हिस्से में फैले हैं, लेकिन वे विश्व की आधे से अधिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियों का घर हैं। अमेज़न जैसे विशाल वर्षावन हमारी सांसों के लिए आवश्यक ऑक्सीजन तथा स्वच्छ जल प्रणाली से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हें अक्सर ‘पृथ्वी के फेफड़े’ कहा जाता है, क्योंकि ये पृथ्वी के जलवायु संतुलन को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज वर्षावनों के समक्ष अनेक गंभीर चुनौतियाँ हैं, जिनमें पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, कृषि भूमि का विस्तार, अनियंत्रित औद्योगिक एवं शहरी विकास तथा जलवायु परिवर्तन प्रमुख हैं। विशेष रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया में पाम ऑयल के बागानों के लिए बड़े पैमाने पर वर्षावनों की कटाई की जा रही है, जो वैश्विक चिंता का विषय है। इसी प्रकार मवेशी पालन और चरागाहों के विस्तार के लिए भी बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र नष्ट किया जा रहा है।

वर्षावनों के संरक्षण के लिए हमें जिम्मेदार उपभोग की आदत विकसित करनी होगी। कागज और लकड़ी के उत्पादों का सीमित एवं समझदारीपूर्ण उपयोग करना चाहिए तथा अनावश्यक खरीदारी से बचना चाहिए। पुनर्चक्रण (री-साइक्लिंग) को बढ़ावा देना आवश्यक है। कागज का दोनों तरफ उपयोग करना चाहिए, री-सायकल किए गए कागज और अन्य उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए तथा जहाँ संभव हो डिजिटल विकल्प अपनाने चाहिए।इसके साथ ही सतत (सस्टेनेबल) खरीदारी को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। सस्टेनेबल शॉपिंग का अर्थ है कि किसी भी वस्तु को खरीदने से पहले यह विचार किया जाए कि वह कहाँ से आई है, उसका निर्माण कैसे हुआ है तथा उसके उपयोग के बाद पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। हमें प्लास्टिक के बजाय कपड़े या जूट के थैले अपनाने चाहिए, ऑर्गेनिक तथा रीसायकल सामग्री से बने उत्पाद खरीदने चाहिए और स्थानीय तथा प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए। सरल शब्दों में कहा जाए तो कम लेकिन टिकाऊ खरीदारी करनी चाहिए। पाम ऑयल से जुड़े उत्पादों के प्रति भी जागरूक रहना आवश्यक है। ऐसे उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए जिनमें पर्यावरण-अनुकूल और प्रमाणित स्रोतों से प्राप्त पाम ऑयल का उपयोग किया गया हो। इसी प्रकार वैश्विक स्तर पर मांस की खपत कम करने से चरागाहों के विस्तार की आवश्यकता घटेगी और वनों पर दबाव कम होगा। आदिवासी एवं स्थानीय समुदाय प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की परंपरागत समझ रखते हैं, इसलिए उनके अधिकारों और ज्ञान की रक्षा भी आवश्यक है। साथ ही ऐसी सरकारों और कंपनियों का समर्थन किया जाना चाहिए जो सख्त पर्यावरणीय कानूनों और शून्य-वनकटाई (जीरो-डीफोरेस्टेशन) नीतियों का पालन करती हैं।

अंत में यही कहूंगा कि वर्षावनों के संरक्षण के लिए वृक्षों की कटाई पर रोक लगाना, अधिकाधिक वृक्षारोपण करना, झूमिंग कृषि प्रणाली को हतोत्साहित करना तथा सतत कृषि को बढ़ावा देना आवश्यक है। वन्यजीवों का संरक्षण, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों का विस्तार, ऊर्जा संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी आवश्यकता लोगों को वर्षावनों के महत्व और उनके संरक्षण के बारे में शिक्षित करने तथा व्यापक जन-जागरूकता फैलाने की है।

वास्तव में सच तो यह है कि वर्षावनों को बचाना किसी एक देश या सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज का सामूहिक और नैतिक दायित्व है। वर्षावन हमारे दैनिक जीवन, संस्कृति, स्वास्थ्य, जलवायु और भविष्य से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। वे हमें स्वच्छ वायु, संतुलित जलवायु, जैव-विविधता और जीवनदायी संसाधन प्रदान करते हैं। यदि हम आज इनके संरक्षण के लिए गंभीर प्रयास करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पर्यावरण, समृद्ध जैव-विविधता और सुरक्षित भविष्य प्रदान कर सकेंगे। इसलिए वर्षावनों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता ही नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त भी है।


सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।मोबाइल 9828108858

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