अजय सहाय
प्रतिनियुक्ति नहीं, समर्पित कैडर; केवल राहत नहीं, विज्ञान और तकनीक आधारित 24×7 सुरक्षा तंत्र
बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, हिमनदीय झील विस्फोट, चक्रवात, भूकंप, जंगल की आग और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएँ यह प्रश्न खड़ा कर रही हैं कि क्या भारत में आपदा प्रबंधन को अब केवल विभिन्न विभागों के अधिकारियों की अतिरिक्त जिम्मेदारी या प्रतिनियुक्ति पर आधारित व्यवस्था से आगे ले जाने का समय आ गया है?
मेरा मानना है कि हाँ—अब एक पूर्णकालिक, पेशेवर, तकनीकी और वैज्ञानिक “प्राकृतिक आपदा प्रबंधन सेवा” विकसित करने पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। इसमें मुख्य पदों पर ऐसे अधिकारी और कर्मचारी हों जिनका मूल कार्य ही आपदा जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व चेतावनी, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्वास हो।
इसका अर्थ मौजूदा राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बलों को हटाना नहीं, बल्कि उनके साथ स्थायी विशेषज्ञ आपदा-प्रबंधन कैडर जोड़ना है।
1. आपदा अब कभी-कभार आने वाली घटना नहीं
जलवायु परिवर्तन ने जोखिम की प्रकृति बदल दी है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार 2024 उस समय तक दर्ज सबसे गर्म वर्ष था। वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-पूर्व स्तर से लगभग 1.55°C ऊपर रहा।
गर्म वातावरण अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है। प्रत्येक 1°C तापमान वृद्धि पर इसकी अधिकतम नमी धारण क्षमता लगभग 7 प्रतिशत बढ़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर स्थान पर हमेशा 7 प्रतिशत अधिक बारिश होगी, लेकिन अत्यधिक वर्षा के लिए वातावरण में अधिक नमी उपलब्ध हो सकती है।
हिमालय में ग्लेशियर, अस्थिर ढलान, हिमनदीय झीलें, तीव्र वर्षा और बढ़ता निर्माण जोखिम को और जटिल बनाते हैं।
जब खतरे की प्रकृति स्थायी और तकनीकी हो गई है, तो उससे लड़ने वाली संस्था भी स्थायी और तकनीकी होनी चाहिए।
2. प्रतिनियुक्ति आधारित मॉडल की सीमा
कई प्रशासनिक व्यवस्थाओं में अधिकारी दूसरे विभागों से कुछ वर्षों के लिए आते हैं। इससे प्रशासनिक अनुभव तो मिलता है, लेकिन अत्यधिक विशेषज्ञ आपदा विज्ञान में संस्थागत निरंतरता की चुनौती उत्पन्न हो सकती है।
मान लीजिए किसी अधिकारी को तीन वर्षों में किसी हिमनदीय झील, नदी घाटी, पुराने मलबा-प्रवाह क्षेत्र और स्थानीय निकासी प्रणाली की गहरी समझ विकसित हुई। उसका स्थानांतरण होते ही नया अधिकारी फिर शुरुआत से सीखता है।
आपदा विज्ञान में यह निरंतरता महत्त्वपूर्ण है।
इसलिए प्रस्ताव होना चाहिए कि महत्वपूर्ण तकनीकी और परिचालन पदों पर स्थायी आपदा प्रबंधन पेशेवर नियुक्त हों। प्रशासन, पुलिस, सेना, स्वास्थ्य, सिंचाई, मौसम और स्थानीय निकाय उनके सहयोगी हों, लेकिन मूल तकनीकी टीम का संस्थागत ज्ञान उसी संगठन में बना रहे।
3. एक नई ‘भारतीय आपदा प्रबंधन सेवा’ पर विचार
देश को भविष्य में भारतीय आपदा प्रबंधन सेवा जैसे विशेष पेशेवर कैडर की व्यवहार्यता पर विचार करना चाहिए।
राष्ट्रीय स्तर के साथ प्रत्येक राज्य में उसका विशेष ढांचा और हर उच्च जोखिम वाले जिले में पूर्णकालिक तकनीकी इकाई हो सकती है।
इसमें केवल सामान्य प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि मौसम वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक, हिमनद विशेषज्ञ, जल वैज्ञानिक, नदी विशेषज्ञ, भूकंप विशेषज्ञ, भू-स्थानिक सूचना प्रणाली विशेषज्ञ, उपग्रह विश्लेषक, ड्रोन पायलट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषज्ञ, संचार अभियंता, संरचनात्मक अभियंता, चिकित्सक, खोज एवं बचाव विशेषज्ञ और समुदाय प्रशिक्षण विशेषज्ञ शामिल हों।
यानी आपदा प्रबंधन एक विभाग नहीं, बहुविषयक वैज्ञानिक सुरक्षा प्रणाली बने।
4. प्रत्येक कर्मचारी तकनीक से जुड़ा हो
नई सेवा की सबसे बड़ी पहचान आधुनिक तकनीक होनी चाहिए।
हर संवेदनशील नदी, पहाड़ और ग्लेशियर से आने वाले आंकड़े एकीकृत नियंत्रण कक्ष में दिखाई दें। उपग्रह चित्र, मौसम रडार, स्वचालित वर्षामापी, नदी जलस्तर सेंसर, मिट्टी की नमी, ढलान गति सेंसर और हिमनदीय झील निगरानी डेटा को एक ही डिजिटल मंच पर जोड़ा जाए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता पुराने और वास्तविक समय के आंकड़ों का विश्लेषण करके बताए—
5. ‘डिजिटल ट्विन’ बने प्रत्येक संवेदनशील घाटी का
भविष्य में प्रत्येक अत्यधिक संवेदनशील नदी घाटी का डिजिटल प्रतिरूप—डिजिटल ट्विन तैयार किया जा सकता है।
इसमें पहाड़ की ऊँचाई, ढाल, नदी, पुल, सड़क, घर, अस्पताल, विद्यालय, होटल, आबादी, पुराने भूस्खलन और पुराने नदी मार्ग तक दर्ज हों।
फिर कंप्यूटर मॉडल में परिस्थितियाँ चलाकर देखा जाए—
यदि एक घंटे में 100 मिलीमीटर बारिश हुई तो क्या होगा?
यदि किसी हिमनदीय झील का अवरोध टूट गया तो पानी किस दिशा में जाएगा?
यदि मुख्य पुल बह गया तो वैकल्पिक निकासी मार्ग क्या होगा?
यदि मोबाइल नेटवर्क बंद हो गया तो संचार कैसे होगा?
आपदा आने के बाद नक्शा बनाने के बजाय आपदा से पहले संभावित भविष्य का नक्शा तैयार होना चाहिए।
6. 24×7 ‘हिमालय प्रहरी’ जैसी विशेष इकाई
हिमालयी राज्यों के लिए इस स्थायी सेवा के भीतर अलग हिमालयी आपदा निगरानी एवं प्रतिक्रिया इकाई बनाई जा सकती है।
इसकी जिम्मेदारी केवल राहत पहुँचाना नहीं हो। यह वर्ष भर ग्लेशियर, हिमनदीय झील, ढलान, बादल, नदी और मलबा-प्रवाह क्षेत्रों की निगरानी करे।
ड्रोन और उपग्रह से नियमित तुलना हो। किसी झील के आकार, ढलान की गति या नदी के व्यवहार में असामान्य बदलाव मिलने पर वैज्ञानिक जांच तत्काल शुरू हो।
यह व्यवस्था प्राकृतिक खतरे को घटना बनने से पहले पहचानने की दिशा में बड़ा बदलाव होगी।
7. ‘गोल्डन मिनट्स’ को बचाना सबसे बड़ा लक्ष्य
आपदा प्रबंधन में कई परिस्थितियों में शुरुआती मिनट अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।
इसलिए चेतावनी केवल जिला मुख्यालय तक पहुँचना सफलता नहीं है।
अंतिम गांव, पर्यटक, होटल, विद्यालय, वाहन चालक और नदी किनारे काम कर रहे व्यक्ति तक चेतावनी पहुँचना आवश्यक है।
मोबाइल संदेश, सेल-ब्रॉडकास्ट, सायरन, रेडियो, उपग्रह संचार और स्थानीय सार्वजनिक चेतावनी प्रणाली को एक साथ जोड़ा जाए।
हर संदेश सरल हो—
“खतरा किस दिशा से आ रहा है, आपको कहाँ जाना है और आपके पास लगभग कितना समय है।”
8. केवल बचावकर्मी नहीं, ‘आपदा वैज्ञानिक’ भी चाहिए
आज आधुनिक आपदा प्रबंधन में केवल नाव, रस्सी और राहत सामग्री पर्याप्त नहीं है।
मलबे में फँसे व्यक्ति को खोजने के लिए जीवन-खोज रडार, तापीय कैमरे और खोजी कुत्ते उपयोगी हो सकते हैं। ड्रोन दुर्गम क्षेत्र का मानचित्र बना सकते हैं। उपग्रह संचार नेटवर्क विफल होने पर संपर्क बनाए रख सकता है। भू-स्थानिक प्रणाली यह बता सकती है कि कौन-सा मार्ग खुला है।
इसीलिए भविष्य की टीम में बचाव कर्मियों के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों का होना अनिवार्य है।
9. हर जिले में स्थायी आपदा प्रबंधन केंद्र
उच्च जोखिम वाले प्रत्येक जिले में 24×7 एकीकृत आपदा नियंत्रण एवं तकनीकी केंद्र होना चाहिए।
यह केंद्र वर्ष भर सक्रिय रहे—आपदा आने पर ही नहीं।
यह जिले के नदी जलस्तर, वर्षा, मौसम चेतावनी, संवेदनशील ढलान, जलाशय, सड़क, पुल, अस्पताल, राहत केंद्र और उपलब्ध बचाव संसाधनों का वास्तविक समय डैशबोर्ड संचालित करे।
प्रत्येक गांव का जोखिम मानचित्र और निकासी योजना डिजिटल रूप में उपलब्ध हो।
वर्ष में कम से कम एक बार संवेदनशील गांवों, विद्यालयों, अस्पतालों और पर्यटन क्षेत्रों में अभ्यास कराया जाए।
10. भर्ती के बाद लगातार प्रशिक्षण
स्थायी कैडर बनाने का अर्थ केवल नई नौकरी पैदा करना नहीं है।
प्रत्येक कर्मचारी को नियमित तकनीकी प्रशिक्षण और पुनःप्रमाणीकरण से गुजरना चाहिए। उसे ड्रोन, भू-स्थानिक प्रणाली, उपग्रह चित्र, प्राथमिक चिकित्सा, खोज-बचाव, आपात संचार और संबंधित जोखिमों का प्रशिक्षण दिया जाए।
देश में एक अत्याधुनिक राष्ट्रीय आपदा प्रौद्योगिकी एवं प्रशिक्षण अकादमी इस उद्देश्य को मजबूत कर सकती है।
यहाँ वास्तविक घटनाओं के डिजिटल अनुकरण तैयार हों—भूकंप आया तो निर्णय क्या होगा, बादल फटा तो कौन-सा अलार्म सक्रिय होगा, ग्लेशियर झील टूटी तो कौन-से गांव पहले खाली होंगे।
11. राहत पर खर्च से पहले जोखिम घटाने में निवेश
आपदा के बाद सड़क, पुल और भवन फिर बनाना आवश्यक होता है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण है आपदा से पहले जोखिम घटाना।
एक सक्षम पूर्व चेतावनी व्यवस्था यदि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दे तो उसकी वास्तविक उपलब्धि केवल आर्थिक बचत नहीं, बल्कि बचाए गए मानव जीवन हैं।
इसलिए आपदा बजट का बड़ा और सुनिश्चित हिस्सा जोखिम मानचित्रण, सेंसर नेटवर्क, अनुसंधान, प्रशिक्षण, सामुदायिक तैयारी और पूर्व चेतावनी क्षमता पर होना चाहिए।
निष्कर्ष : आपदा प्रबंधन को पेशा नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था बनाना होगा
अब समय आ गया है कि हम प्राकृतिक आपदा प्रबंधन को केवल आपदा के बाद सक्रिय होने वाली व्यवस्था न मानें।
एक स्थायी, पूर्णकालिक, वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीक आधारित प्राकृतिक आपदा प्रबंधन कैडर पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विचार होना चाहिए।
इसकी अपनी भर्ती हो, अपना प्रशिक्षण हो, अपना तकनीकी कैडर हो, अनुसंधान व्यवस्था हो और स्पष्ट करियर संरचना हो। मुख्य तकनीकी पद केवल अल्पकालिक प्रतिनियुक्ति पर निर्भर न रहें।
भारत के पास अंतरिक्ष तकनीक है, मौसम विज्ञान है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, ड्रोन हैं, रडार हैं और विशाल वैज्ञानिक क्षमता है। अब इन क्षमताओं को एकीकृत आपदा सुरक्षा तंत्र में बदलने की आवश्यकता है।
“भविष्य का सबसे सफल आपदा प्रबंधन वह नहीं होगा जो आपदा के बाद सबसे अधिक लोगों को बचाए, बल्कि वह होगा जो विज्ञान, तकनीक और पूर्व चेतावनी के माध्यम से लोगों को आपदा की चपेट में आने से पहले ही सुरक्षित कर दे।”
यही भविष्य की प्राकृतिक आपदा नीति का लक्ष्य होना चाहिए—स्थायी टीम, आधुनिक तकनीक, चौबीसों घंटे निगरानी और अंतिम व्यक्ति तक समय पर चेतावनी।