पंकज चतुर्वेदी
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर पर इन दिनों जलवायु परिवर्तन का साया लगातार गहराता जा रहा है। जिस घाटी की पहचान उसकी बर्फ से ढकी चोटियों, बहते कल-कल झरनों, शीतल हवाओं और संतुलित मौसम से हुआ करती थी, आज वही वादी पर्यावरण के एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रही है। प्रकृति का जो मिजाज कभी इंसानों और मवेशियों के लिए वरदान हुआ करता था, वही अब अनिश्चितता और विनाश का पर्याय बनता जा रहा है। मौसम के चक्र में आया यह अप्रत्याशित बदलाव केवल घाटी के प्राकृतिक सौंदर्य को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहा, बल्कि इसने वहां की संवेदनशील पारिस्थितिकी, कृषि, स्थानीय समाज और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जलवायु परिवर्तन के इस भयावह दौर का सबसे सीधा और विनाशकारी असर क्षेत्र के समाज, वहां के बुनियादी ढांचे और आम जनजीवन पर देखने को मिल रहा है। हाल ही में जारी सरकारी आंकड़े इस त्रासदी की भयावहता की स्पष्ट गवाही देते हैं। बीते दो वर्षों के दौरान राज्य में अचानक आई बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं ने भयानक तबाही मचाई है। इस अवधि में चौबीस हजार से अधिक रिहायशी मकान पूरी तरह या आंशिक रूप से तबाह हो गए। केवल घर ही नहीं ढहे, बल्कि जनजीवन को सुचारू रूप से चलाने वाला नेटवर्क भी बिखर गया। पांच हजार से अधिक सड़कें बह गईं और हजारों जलापूर्ति योजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। जब सड़कें टूटती हैं और पानी की आपूर्ति ठप्प होती है, तो समाज का दैनिक ताना-बाना पूरी तरह प्रभावित होता है। प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए सिर छुपाने की जगह बचाना और पीने के साफ पानी का प्रबंध करना ही दिन का सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है।
इस प्राकृतिक प्रकोप का सबसे अधिक प्रभाव जम्मू संभाग के साथ-साथ घाटी के मैदानी और पहाड़ी इलाकों में भी देखने को मिला है। उधमपुर, राजौरी, डोडा और जम्मू जैसे जिलों में तबाही का मंजर बेहद दर्दनाक रहा है, वहीं कश्मीर घाटी में बड़गाम, पुलवामा और कुलगाम जैसे जिलों ने भारी तबाही झेली है। अकेले उधमपुर में सात हजार के करीब घर क्षतिग्रस्त हुए, तो राजौरी और जम्मू में भी हजारों परिवारों के आशियाने छिन गए। यह तबाही केवल आंकड़ों का एक संग्रह भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे उन हजारों परिवारों की कहानियां हैं जिनकी जीवन भर की जमापूंजी पल भर में मिट्टी में मिल गई। जब किसी परिवार का आशियाना ढहता है, तो केवल दीवारें ही नहीं गिरतीं, बल्कि उनके सपने, सुरक्षा की भावना और सामाजिक स्थिरता भी जमींदोज हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन का यह प्रहार केवल इमारतों और सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि और बागवानी क्षेत्र को भी गहरा घाव दिया है। इस क्षेत्र की बड़ी आबादी खेती और सेब के बागानों पर निर्भर है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते दो सालों में एक लाख दस हजार हेक्टेयर से अधिक फसल क्षेत्र पूरी तरह प्रभावित हुआ है। इसमें से करीब एक लाख हेक्टेयर कृषि भूमि अकेले जम्मू संभाग में बर्बाद हुई, जबकि कश्मीर के कुलगाम और बड़गाम जैसे इलाकों में भी हजारों हेक्टेयर फसल पानी और मलबे की भेंट चढ़ गई। कृषि भूमि का इस पैमाने पर नष्ट होना एक बड़े खाद्य और आर्थिक संकट की आहट है। अचानक आने वाली बाढ़ अपने साथ भारी मात्रा में गाद और पत्थर लाती है, जो उपजाऊ खेतों को बंजर बना देती है। एक बार खेत खराब हो जाएं, तो उन्हें दोबारा उपजाऊ बनाने में सालों का समय और अकूत मेहनत लगती है।
फसलों की तबाही के साथ-साथ इस संकट ने पालतू जानवरों और स्थानीय पशुधन को भी बड़े पैमाने पर अपना शिकार बनाया है। अकेले जम्मू संभाग में पांच हजार से अधिक पालतू जानवरों की जान चली गई, जबकि कश्मीर घाटी में भी मवेशियों का नुकसान हुआ। ग्रामीण और पहाड़ी समाज में मवेशी केवल दूध या कृषि कार्य का जरिया नहीं होते, बल्कि वे परिवार की वित्तीय सुरक्षा का एक प्रमुख आधार होते हैं। आपदा के समय जब मवेशी मारे जाते हैं, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ऐसा धक्का लगता है जिसकी भरपाई करने में सालों लग जाते हैं। किसान अपनी कटी हुई फसलें और अपने मवेशी गंवाकर आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं। मौसम के बदलते ढर्रे ने किसानों और पशुपालकों के मन में भविष्य को लेकर गहरा भय पैदा कर दिया है।
हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक बनावट अत्यंत नाजुक है। वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण इस क्षेत्र का वर्षा पैटर्न पूरी तरह से अनियंत्रित हो गया है। पहले जहां महीनों तक हल्की और नियमित बारिश हुआ करती थी, वहीं अब बेहद कम समय में अत्यधिक बारिश होने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। बादलों के फटने की घटनाएं इसी का नतीजा हैं। जब बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी पहाड़ी ढलानों पर गिरता है, तो वह अपने साथ पहाड़ों की मिट्टी और मलबे को बहा ले जाता है। यही पानी नीचे आकर नदियों और नालों में विकराल बाढ़ का रूप ले लेता है। इसके अलावा, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अनियोजित निर्माण कार्य और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह से की जाने वाली छेड़छाड़ ने स्थिति को और भी अधिक संवेदनशील बना दिया है।
आपदा के बाद पुनर्वास और राहत का सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। यद्यपि सरकार और प्रशासन की ओर से आपदा प्रतिक्रिया कोष और मुख्यमंत्री राहत कोष के माध्यम से प्रभावितों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है, तथापि तबाही का दायरा इतना विशाल है कि यह सहायता पर्याप्त साबित नहीं हो पा रही है। बुनियादी ढांचे की अस्थायी मरम्मत तो कर दी जाती है, लेकिन स्थायी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया बेहद धीमी और जटिल होती है। जब तक स्थायी सड़कें और पेयजल योजनाएं पूरी तरह से बहाल नहीं हो जातीं, तब तक आम जनता को रोजाना की बुनियादी जरूरतों के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है।
जलवायु परिवर्तन का यह संकट अब केवल पर्यावरणविदों के अध्ययन का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट बन चुका है। जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र के लिए अब एक दीर्घकालिक और समावेशी नीति की तत्काल आवश्यकता है। केवल आपदा के बाद राहत बांटने से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। हमें विकास की अपनी अवधारणा में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता को शामिल करना होगा। बुनियादी ढांचे के निर्माण में पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का उपयोग करना, ढलानों पर सघन वृक्षारोपण करना और नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित करना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, मौसम की पूर्व चेतावनी प्रणाली को और अधिक आधुनिक बनाना होगा ताकि समय रहते लोगों और मवेशियों की जान बचाई जा सके। यदि हमने प्रकृति की इन स्पष्ट चेतावनियों से अब भी सबक नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में यह प्राकृतिक असंतुलन हमारे समाज और जीवन के लिए और भी बड़े खतरे पैदा करता रहेगा।