डॉ. स्वप्निल व्यास — प्राध्यापक, लेखक एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता, इंदौर
हम जब किसी रास्ते पर चलते हैं तो पीछे अपने पैरों के निशान छोड़ जाते हैं। कुछ निशान थोड़ी देर बाद मिट जाते हैं और कुछ लंबे समय तक दिखाई देते हैं। हमारी आधुनिक जीवनशैली भी पृथ्वी पर ऐसे ही निशान छोड़ रही है। अंतर केवल इतना है कि ये निशान मिट्टी पर नहीं, बल्कि वातावरण पर पड़ रहे हैं। इन्हें हम कार्बन फुटप्रिंट कहते हैं। कार्बन फुटप्रिंट केवल कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं नहीं है। हमारे घर की बिजली, रसोई में इस्तेमाल होने वाला ईंधन, निजी वाहन, हवाई यात्रा, एसी, ऑनलाइन खरीदी गई वस्तुओं का परिवहन, प्लास्टिक का उपयोग और यहां तक कि हमारी भोजन संबंधी आदतें भी किसी न किसी रूप में कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी हैं। यानी जलवायु परिवर्तन की कहानी केवल बड़े उद्योगों की कहानी नहीं है, यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से भी जुड़ी हुई है।
आज विकास की गति पहले से कहीं अधिक तेज है। शहर फैल रहे हैं, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, वाहनों की संख्या बढ़ रही है, ऊर्जा की मांग बढ़ रही है और उपभोग हमारी जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। विकास आवश्यक है, लेकिन प्रश्न यह है कि विकास की यह गति पृथ्वी की सहनशीलता से कितनी आगे जा रही है?कार्बन फुटप्रिंट हमें इसी प्रश्न के सामने खड़ा करता है। आज मौसम के व्यवहार में दिखाई देने वाले बदलाव हमें संकेत दे रहे हैं। कहीं अत्यधिक वर्षा, कहीं लंबे समय तक सूखा, कहीं असामान्य गर्मी तो कहीं मौसम के पारंपरिक चक्र में बदलाव दिखाई देता है। इन घटनाओं का हर एक कारण केवल जलवायु परिवर्तन नहीं होता, लेकिन वैश्विक तापवृद्धि इन जोखिमों को बढ़ा सकती है। इसलिए कार्बन उत्सर्जन को कम करना केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि आने वाले समय की सुरक्षा का विषय भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्बन फुटप्रिंट को कम करने की शुरुआत किसी बड़े अभियान से ही हो, यह जरूरी नहीं। इसकी शुरुआत हमारे अपने घर से हो सकती है। अनावश्यक बिजली का उपयोग बंद करना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल करना, छोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का उपयोग करना, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देना, स्थानीय वस्तुओं का उपयोग बढ़ाना, जरूरत के अनुसार ही खरीदारी करना और प्लास्टिक तथा एकल-उपयोग वाली वस्तुओं को कम करना ये छोटे कदम हैं, लेकिन करोड़ों लोग इन्हें अपनाएं तो इनका सामूहिक प्रभाव बड़ा हो सकता है। इसी तरह पेड़ लगाना भी महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं है। पौधे का जीवित रहना, उसका बड़ा होना और स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप वृक्षों का चयन करना अधिक महत्वपूर्ण है। हमें ऐसी हरित व्यवस्था विकसित करनी होगी जो कार्बन को अवशोषित करने के साथ-साथ स्थानीय जैव विविधता, मिट्टी, जल और पक्षियों के लिए भी उपयोगी हो।
यहां हमें अपनी पुरानी जीवनशैली से भी सीखने की जरूरत है। भारतीय लोकजीवन में प्रकृति केवल संसाधन नहीं थी, वह जीवन का हिस्सा थी। पेड़-पौधों, नदियों, तालाबों, पशु-पक्षियों और ऋतुचक्र के साथ मनुष्य का संबंध केवल उपयोग का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का था। स्थानीय फलदार और औषधीय वृक्षों का महत्व समझा जाता था। वर्षाजल को रोकने के लिए तालाब और जलस्रोत बनाए जाते थे। जरूरत और उपभोग के बीच एक स्वाभाविक संतुलन था। आज आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान को साथ लाया जाए। भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही होगी कि हम अपनी बढ़ती जरूरतों को पृथ्वी की सीमित क्षमता के साथ कैसे संतुलित करें। आने वाली पीढ़ियां केवल यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितनी ऊंची इमारतें बनाईं, कितनी तेज सड़कें बनाईं या कितना उत्पादन बढ़ाया। वे यह भी पूछेंगी कि जिस पृथ्वी को हमने उनसे विरासत में लिया था, उसे हमने किस स्थिति में उनके लिए छोड़ा। इसलिए कार्बन फुटप्रिंट को केवल एक पर्यावरणीय शब्द समझना पर्याप्त नहीं है। यह हमारे समय की जीवनशैली का आईना है। यह बताता है कि हमारी सुविधा की कीमत प्रकृति कितनी चुका रही है। हमें अब “अधिक उपभोग ही अधिक विकास” की सोच से आगे बढ़कर “कम संसाधनों में बेहतर जीवन” की दिशा में सोचना होगा। शहरों की योजना में हरित क्षेत्र, जलस्रोत और स्थानीय जैव विविधता को उतना ही महत्व देना होगा जितना सड़कों और भवनों को दिया जाता है। सार्वजनिक परिवहन, साइकिल मार्ग, पैदल पथ, ऊर्जा दक्ष भवन, सौर ऊर्जा, वर्षाजल संचयन और स्थानीय वृक्षों पर आधारित हरित क्षेत्र भविष्य के शहरों की आवश्यकता होंगे।
विद्यालय और महाविद्यालय इस परिवर्तन की महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बन सकते हैं। बच्चों को केवल पर्यावरण दिवस पर पौधा लगाने तक सीमित रखने के बजाय उन्हें अपने विद्यालय का कार्बन फुटप्रिंट समझने, बिजली और पानी की खपत का आकलन करने, कचरे को कम करने और स्थानीय जैव विविधता को पहचानने की गतिविधियों से जोड़ा जा सकता है। जब पर्यावरण व्यवहार बनता है, तभी उसका प्रभाव स्थायी होता है। कार्बन फुटप्रिंट कम करना प्रकृति पर कोई एहसान नहीं है। यह वास्तव में अपने भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास है। पृथ्वी को हमारी जरूरत नहीं, लेकिन हमारा जीवन पृथ्वी की स्वस्थ परिस्थितियों पर निर्भर है। आज हम जो वाहन चुनते हैं, जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, जितना उपभोग करते हैं, जितना कचरा पैदा करते हैं और जितने पेड़ बचाते या लगाते हैं।इन सबका संबंध आने वाले कल से है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “मेरा कार्बन फुटप्रिंट कितना है?” असली सवाल यह होना चाहिए कि “मैं अपने पीछे कैसी पृथ्वी छोड़कर जाना चाहता हूं?” आज हमारे पास विकल्प मौजूद हैं। विकास भी चाहिए और पर्यावरण भी बचाना है। सुविधा भी चाहिए और संसाधनों का संरक्षण भी करना है। शहर भी बढ़ेंगे और हरियाली भी बचानी होगी। यही भविष्य की असली चुनौती है।
हमारे आज के कदम ही कल की पृथ्वी का स्वरूप तय करेंगे। पैरों के निशान मिट सकते हैं, लेकिन कार्बन की छाप लंबे समय तक वातावरण में बनी रह सकती है। इसलिए समय आ गया है कि विकास के रास्ते पर चलते हुए हम अपने कदमों की छाप को थोड़ा हल्का करें ताकि आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए केवल हवा नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, जीवंत प्रकृति और रहने योग्य पृथ्वी भी मिल सके।