जलवायु आपदा की सर्वाधिक मार झेलता बाल बचपन: एक नीरव वैश्विक त्रासदी

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष द्वारा जारी हालिया आंकड़े इस भयावह वास्तविकता की ओर इशारा करते हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग एक अरब दस करोड़ बच्चे—यानी दुनिया की कुल बाल आबादी के करीब आधे बच्चे—पहले से ही कम से कम तीन परस्पर जुड़ते हुए जलवायु खतरों की चपेट में जीवन जीने को मजबूर हैं। इनमें अत्यधिक गर्मी और भीषण लू, सूखा, पानी की कमी, चक्रवात और बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ शामिल हैं। इस पहले से जारी संकट को अल-नीनो जैसे वैश्विक जलवायु पैटर्न ने कई गुना अधिक गंभीर और खतरनाक बना दिया है। अल-नीनो महासागरों और वायुमंडल की उस प्राकृतिक स्थिति को कहते हैं जहां प्रशांत महासागर की सतह का जल असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसके कारण दुनिया भर में मौसम के स्थापित पैटर्न बदल जाते हैं, कहीं अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कहीं असामान्य मूसलाधार बारिश होती है।

हाल के शोध और आधिकारिक आकलनों के अनुसार, अल-नीनो के इस मौजूदा चक्र के कारण दुनिया भर के चौंतीस करोड़ सत्तर लाख से अधिक बच्चे सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं। इनमें से सबसे बड़ी संख्या दक्षिण एशिया और प्रशांत महासागर के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों की है, जहां अकेले उन्नीस करोड़ से अधिक बाल आबादी अत्यधिक सूखे या असामान्य रूप से भीषण वर्षा और बाढ़ के संकट से जूझ रही है। यह आंकड़ा इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि एशिया और उसके आसपास का क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की इस नई लहर का सबसे प्रमुख केंद्र बन चुका है। अल-नीनो का यह प्रभाव केवल मौसम की विषमता तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पैदा होने वाली अत्यधिक गर्मी के कारण वैश्विक स्तर पर साढ़े चार लाख से अधिक अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई गई है, जिसमें एक बड़ा हिस्सा नवजात और छोटे बच्चों का है।

बच्चों का शरीर वयस्कों की तुलना में तापमान के उतार-चढ़ाव को सहन करने में बहुत कम सक्षम होता है। उनका शरीर तेजी से गर्म होता है और उन्हें पसीना कम आता है, जिससे वे भीषण गर्मी और लू के दौरान जल्दी ही डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और अंगों के काम न करने जैसी गंभीर स्थितियों का शिकार हो जाते हैं। वर्तमान में दुनिया भर के लगभग छप्पन करोड़ बच्चे अत्यधिक लू के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि का यही रुझान जारी रहा, तो वर्ष दो हजार पचास तक पृथ्वी पर रहने वाला लगभग हर बच्चा—यानी दो अरब से अधिक बच्चे—वर्ष में कई-कई बार भीषण लू का सामना करने के लिए विवश होगा। यह एक ऐसी डरावनी स्थिति होगी जहां बच्चों का खुले मैदानों में खेलना या सामान्य दिनचर्या बिताना भी जीवन के लिए खतरनाक बन जाएगा।

गर्मी के अलावा, जल सुरक्षा का संकट भी बाल स्वास्थ्य की जड़ों को खोखला कर रहा है। दुनिया भर में करीब पचानवे करोड़ यानी लगभग एक अरब बच्चे उन इलाकों में रहने को मजबूर हैं जहां स्वच्छ पेयजल की भारी किल्लत है या जहां जल तनाव अत्यधिक उच्च स्तर पर है। जब नदियाँ और कुएँ सूख जाते हैं या बाढ़ के कारण पेयजल के स्रोत दूषित हो जाते हैं, तो परिवारों के पास असुरक्षित जल का उपयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इसका सीधा परिणाम जल जनित और कीट जनित बीमारियों के विस्फोटक प्रसार के रूप में सामने आता है। डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियां बच्चों के शरीर से आवश्यक पोषक तत्वों को छीन लेती हैं। इसी तरह, तापमान में वृद्धि और बेमौसम बारिश के कारण मच्छर जनित बीमारियों जैसे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया का भौगोलिक दायरा बढ़ रहा है, और इन बीमारियों के सबसे आसान शिकार बच्चे ही बनते हैं।

खाद्य सुरक्षा और पोषण पर जलवायु परिवर्तन का प्रहार एक और अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है। सूखा पड़ने से फसलें नष्ट हो जाती हैं और बाढ़ खेत की उपजाऊ मिट्टी को बहा ले जाती है। कृषि चक्र के पूरी तरह अनिश्चित हो जाने के कारण खाद्य पदार्थों की उपलब्धता घटती है और महंगाई बढ़ती है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए पौष्टिक आहार जुटाना असंभव होने लगता है। इसका सीधा असर गर्भवती माताओं और छोटे बच्चों के खान-पान पर पड़ता है। पर्याप्त पोषण न मिलने के कारण बच्चों में शारीरिक विकास रुकने यानी बौनेपन की समस्या, कम वजन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की गंभीर कमी देखने को मिलती है। बचपन में कुपोषण के शिकार हुए बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास जीवनभर के लिए बाधित हो जाता है, जिससे उनकी सीखने की क्षमता और भविष्य में कार्य करने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित हो जाती है।

पर्यावरण का यह बढ़ता संकट बच्चों की शिक्षा की नींव पर भी प्रहार कर रहा है। हर वर्ष दुनिया भर में चक्रवात, बाढ़ और जंगल की आग जैसी चरम घटनाओं के कारण हजारों स्कूल भवन पूरी तरह जमींदोज हो जाते हैं। अनेक मामलों में, आपदा के बाद बचे हुए स्कूल भवनों को हफ्तों या महीनों के लिए राहत शिविरों में बदल दिया जाता है, जिससे बच्चों की नियमित पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है। अकेले एक वर्ष के भीतर जलवायु संबंधी झटकों और आपदाओं के कारण चौबीस करोड़ से अधिक बच्चों की स्कूली शिक्षा बाधित होने के प्रमाण मिले हैं। जो बच्चे पहले से ही गरीबी या कठिन सामाजिक परिस्थितियों के कारण बमुश्किल स्कूल पहुंच पाते हैं, वे आपदा के बाद अक्सर कभी दोबारा स्कूल नहीं लौट पाते।

पढ़ाई छूटने के साथ ही बाल अधिकारों के हनन और सामाजिक अपराधों का एक नया दौर शुरू हो जाता है। जब जलवायु आपदाओं के कारण परिवारों की आजीविका के साधन छिन जाते हैं और वे पाई-पाई को मोहताज हो जाते हैं, तो आर्थिक दबाव के कारण बच्चों को स्कूल से निकालकर बाल श्रम में धकेल दिया जाता है। कृषि क्षेत्रों, ईंट भट्ठों या असंगठित मजदूरी में बच्चों का शोषण बढ़ने लगता है। अनेक प्रभावित क्षेत्रों में परिवारों द्वारा बेटियों का समय से पहले विवाह कर देने की कुप्रथा भी तेजी से बढ़ती देखी गई है, ताकि परिवार पर एक व्यक्ति के पालन-पोषण का बोझ कम हो सके। इसके अतिरिक्त, विस्थापन के दौरान बच्चों का तस्करों और आपराधिक तत्वों की चपेट में आने का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण बेघर होने और शरणार्थी शिविरों में रहने का मानसिक प्रभाव भी अत्यंत गहरा और दीर्घकालिक होता है। अपनी आंखों के सामने अपना घर, खिलौने, स्कूल और कभी-कभी अपनों को खो देने का जो आघात बच्चे झेलते हैं, वह उन्हें गंभीर अवसाद, चिंता और मानसिक तनाव की ओर ले जाता है। अचानक आई आपदाएं बच्चों के मन में असुरक्षा की एक ऐसी गहरी भावना भर देती हैं जो उनके व्यक्तित्व के सामान्य विकास को बाधित करती है।

इस पूरी त्रासदी का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि जब वैश्विक स्तर पर जलवायु नीतियों, अनुकूलन रणनीतियों और वित्तीय आवंटन की बात आती है, तो बच्चों की विशिष्ट आवश्यकताओं को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय जलवायु निधियों का एक बहुत ही सूक्ष्म हिस्सा बाल केंद्रित स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा प्रणालियों पर खर्च किया जाता है। यदि समय रहते इस दृष्टिकोण में बुनियादी बदलाव नहीं किया गया, तो जलवायु संकट के परिणाम और भी अधिक विनाशकारी होंगे।

आगे की राह इस बात पर निर्भर करती है कि विश्व समुदाय कितनी तेजी से बाल केंद्रित जलवायु कदम उठाता है। सबसे पहली आवश्यकता यह है कि स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और पेयजल प्रणालियों को बुनियादी रूप से इतना मजबूत और जलवायु-अनुकूल बनाया जाए कि वे चक्रवात, बाढ़ या भीषण गर्मी जैसी स्थितियों का सामना कर सकें। दूसरे, वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाली सभी जलवायु नीतियों के केंद्र में बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही, स्थानीय और वैश्विक जलवायु अनुकूलन कोष में से एक निश्चित और बड़ा हिस्सा बाल कल्याण, पोषण सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के दौरान बच्चों के लिए विशेष सुरक्षा ढांचा तैयार करने के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए।

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