रोहित कौशिक
जलवायु परिवर्तन का असर न जाने कितने रूपों में हमारे सामने आ रहा है। इस दौर में जिस विकास पर हम गर्व कर रहे हैं, अंततः वह विकास ही विभिन्न खतरों को आमंत्रण दे रहा है। आज जलवायु परिवर्तन के कारण प्रकृति के हर तत्व पर खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि जमीन के नीचे भी पहुंच गया है। कहने का अर्थ यह है कि भूजल पर भी एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। प्रकृति के हर अवयव का अपना महत्व है लेकिन जल के बिना हमारी जिंदगी में कई तरह की समस्याएं पैदा हो जाती हैं। ये समस्याएं ऐसे लोगों से बेहतर कोई नहीं जान सकता जो लोग उन क्षेत्रों में रह रहे हैं जहां पानी की कमी है। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी नहीं है, वहां लोग पानी को लेकर लापरवाह हैं। हालांकि अब देश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इसके बावजूद लोगों में जल संकट को लेकर एक अजीब तरह की लापरवाही दिखाई देती है। हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) द्वारा जारी ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ नामक रिपोर्ट में बताया गया है कि पृथ्वी का जल चक्र बहुत ही अनिश्चित होता जा रहा है। धरती की सतह और उसके नीचे जमा कुल जल भंडारण में 2014-16 के बाद से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार 2022 से 2025 के बीच अमेरिका के कुछ हिस्सों, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में लगातार भूजल की कमी दर्ज की गई। मध्य और पूर्वी यूरोप, मध्य अमेरिका, चिली, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में भूजल का स्तर सामान्य से बहुत कम दर्ज किया गया। जिन भूमिगत जल भंडारों को बनने में कई साल या कई दशक लगते हैं, उन पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। डब्ल्यूएमओ ने धरती पर जमा पानी को एक प्रकार का प्राकृतिक बचत खाता कहा है। दरअसल भूजल, झीलें, नदियां, मिट्टी की नमी, बर्फ और ग्लेशियर लंबे समय तक पानी को जमा रखते हैं। जब सूखे की स्थिति होती है, तो यही भंडार पारिस्थितिक तंत्र की आवश्यकता पूरी करता है। जलवायु परिवर्तन का असर विभिन्न तरीकों से हो रहा है। कहीं नदियां सूख रही हैं, कहीं अचानक अत्यधिक बारिश से बाढ़ विनाश कर रही है। कहीं भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है तो कहीं ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। एक सैटेलाइट अध्ययन के अनुसार एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में हर वर्ष 2,420 करोड़ टन भूजल गायब हो रहा है। इस अध्ययन के अनुसार एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग दो-तिहाई हिस्से में भूजल लगातार घटा है। सबसे ज्यादा गिरावट उन क्षेत्रों में देखी गई जहां घनी आबादी है और सिंचाई का काफी दबाव है। इनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन, सिंधु बेसिन और अमू दरिया बेसिन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
भूजल में गिरावट मानवीय गतिविधियों के कारण तो हो ही रही है, इसका एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन भी है। इसमें हिमनदों और बर्फीले क्षेत्रो की भूमिका भी अहम है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अध्ययन में बताया गया है कि यदि पानी के इस्तेमाल की आदतें और नीतियां नहीं बदली गईं, तो भूजल का स्तर लगातार गिरता चला जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार हिमनदों के पिघलने से 2060 के आसपास कुछ क्षेत्रों में भूजल में आ रही गिरावट थोड़े समय के लिए धीमी हो सकती है लेकिन यह प्रक्रिया अस्थायी होगी। इसके बाद भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिर सकता है, जिससे निचले इलाकों में कृषि क्षेत्रों पर भारी संकट आ सकता है। हालांकि कुछ जगहों पर जल चक्र में आश्चर्यजनक रूप से बदलाव देखा गया है। यानी एक तरफ सूखा है तो दूसरी तरफ बाढ़ है। इसका अर्थ है कि जल चक्र दोनों दिशाओं में चरम पर जा रहा है यानी बहुत कम और बहुत ज्यादा पानी। दरअसल भूजल स्तर में गिरावट के अनेक कारण हैं। कई जगहों पर कृषि कार्यों के लिए बोरवेल और नलकूपों से पानी की जरूरत से ज्यादा निकासी की जाती है। धान और गेहूं जैसी अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती इसका प्रमुख कारण है। कई जगहों पर कृषि पंपों के लिए मुफ्त या बहुत सस्ती बिजली मिलने से पानी बचाने का प्रोत्साहन कम हो जाता है, जिससे लगातार और अत्यधिक पंपिंग होती है।
इस दौर में लगातार शहरीकरण हो रहा है। पक्की सड़कों और इमारतों के निर्माण से बारिश का पानी जमीन के अंदर नहीं जा पाता, जिससे भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण रुक जाता है। इसके साथ ही कम बारिश, लंबे शुष्क दौर और बढ़ते तापमान के कारण सतही जल की कमी होती है। इस वजह से सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि बढ़ती आबादी की पानी की दैनिक जरूरतें और उद्योगों द्वारा भारी मात्रा में भूजल का उपयोग करने से जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। पेड़ों का कटना भी भूजल स्तर में गिरावट का एक कारण है। पेड़ों के कटने से मिट्टी की पानी रोकने और जमीन में सोखने की क्षमता कम हो जाती है। दरअसल भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। कई अध्ययनों में यह चिंता व्यक्ति की गई है कि भारत गंभीर जल संकट की तरफ बढ़ रहा है। हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर भूजल दोहन की औसत दर 61 प्रतिशत है। देश के बीस से अधिक बड़े शहरों जिनमें दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद शामिल हैं, भूजल का स्तर शून्य के करीब पहुंच चुका है। इस दौर में वर्षा जल संचयन, भूजल संरक्षण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन के माध्यम से हम काफी हद तक इस संकट को कम कर सकते हैं।