धीरज चतुर्वेदी
वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए ग्लेशियरों के नए और उन्नत मॉडल दर्शाते हैं कि अल्पकालिक मौसम के उतार-चढ़ाव—विशेषकर अत्यधिक भीषण गर्मी और लू (Heatwaves)—बर्फ के पिघलने की रफ्तार को हमारी पिछली सभी कल्पनाओं से कहीं अधिक तेज कर रहे हैं।
हाल ही में सामने आए एक महत्वपूर्ण शोध से यह खुलासा हुआ है कि यदि ग्लेशियरों के अध्ययन में मासिक (महीने भर के) औसत डेटा के बजाय दैनिक (रोज़मर्रा के) मौसम की चरम स्थितियों को शामिल किया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि ग्लेशियरों को कितना भारी नुकसान हो रहा है और समुद्र का जलस्तर कितनी तेजी से ऊपर उठ रहा है।
यह अध्ययन दुनिया भर के बर्फीले क्षेत्रों में हाल के वर्षों में देखी गई असाधारण हीटवेव और अत्यधिक बर्फ पिघलने की घटनाओं के गंभीर परिणामों पर रोशनी डालता है।
क्यों अहम है ‘दैनिक मौसम’ का आकलन?
पारंपरिक तौर पर, दुनिया भर के अधिकांश ग्लेशियर मॉडल मासिक जलवायु आंकड़ों पर निर्भर करते हैं। ये आंकड़े छोटे अंतराल वाले मौसम के बदलावों को एक औसत रूप में समेट देते हैं। हालांकि, असलियत में ग्लेशियर तापमान में अचानक होने वाले बदलावों, भारी बारिश और लू जैसी अल्पकालिक घटनाओं पर बेहद आक्रामक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं।
- गर्मी का असर: कुछ ही दिनों की असाधारण गर्मी या हीटवेव ग्लेशियर की ऊपरी सुरक्षात्मक बर्फ की परत को तेजी से नष्ट कर देती है। इसके बाद नीचे की प्राचीन बर्फ सीधी धूप के संपर्क में आती है, जो सूरज की किरणों को तेजी से सोखकर बहुत तीव्र गति से पिघलने लगती है।
- वर्षा का प्रभाव: तापमान के हिमांक बिंदु (Freezing point) के आसपास रहने पर होने वाली बारिश या बर्फबारी ग्लेशियर के संतुलन को बुरी तरह प्रभावित करती है।
इन तमाम प्रक्रियाओं का दिन-प्रतिदिन के आधार पर विश्लेषण करने पर नया मॉडल बर्फ से ढकी सतह और खुली बर्फ के बीच होने वाले तीव्र बदलावों को अधिक सटीकता से पकड़ पाता है।
इस शोध के प्रमुख लेखक लैंडर वैन ट्रिच (Lander Van Tricht – ETH ज्यूरिख / WSL / व्रिज यूनिवर्सिटी ब्रुसेल्स) बताते हैं, “ग्लेशियर मासिक औसत के हिसाब से प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि उन्हें हर दिन जिस मौसम का सामना करना पड़ता है, वे उसके अनुसार बदलते हैं। कुछ ही दिनों की हीटवेव भारी मात्रा में बर्फ को पानी में बदल सकती है। पूरे महीने के मौसम का औसत निकाल लेने से हम इन चरम घटनाओं के वास्तविक प्रभाव को कम आंकने की गलती कर बैठते हैं।”
अधिक सटीक और उन्नत मॉडल
इन पेचीदगियों को सटीक रूप से समझने के लिए शोधकर्ताओं ने ‘ग्लोबल ग्लेशियर इवोल्यूशन मॉडल’ (GloGEM) को दैनिक स्तर (Daily Resolution) पर काम करने के लिए अपग्रेड किया। इसे दुनिया भर के 12,500 से अधिक ग्लेशियरों पर लागू किया गया, जो वैश्विक ग्लेशियर बर्फ की कुल मात्रा का 94% हिस्सा हैं।
पुराने मासिक दृष्टिकोण की तुलना में, यह उन्नत मॉडल वास्तविक रूप में हुए ग्लेशियर नुकसान को बेहतर ढंग से प्रदर्शित करता है। विशेषकर उन वर्षों में जब असाधारण रूप से बर्फ पिघली हो—जैसे कि 2022 में यूरोपीय आल्प्स, 2023 में पश्चिमी उत्तर अमेरिका, 2024 में स्वालबार्ड, 2025 में मध्य एशिया और हाल ही में 2026 में यूरोपीय आल्प्स में देखी गई घटनाएं।
भविष्य की डरावनी तस्वीर और समुद्र का बढ़ता जलस्तर
अध्ययन यह चेतावनी देता है कि दैनिक मौसम की अस्थिरता का यह प्रभाव समय के साथ और अधिक घातक होता जाता है। जब भविष्य के लिए इसका आकलन किया गया, तो दैनिक मॉडल ने मासिक मॉडल की तुलना में ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने और बर्फ के अत्यधिक नुकसान की भविष्यवाणी की।
इसका सीधा और खतरनाक परिणाम यह होगा कि वैश्विक समुद्र के जलस्तर को बढ़ाने में ग्लेशियरों की भूमिका और बड़ी होगी। अध्ययन के मुताबिक, यह नया दैनिक मॉडल यह अनुमान लगाता है कि 21वीं सदी में समुद्र के स्तर में वृद्धि में ग्लेशियरों का योगदान पारंपरिक मॉडलों की तुलना में 5% से 10% अधिक होगा।
वैन ट्रिच आगे कहते हैं, “हमारे नतीजे बताते हैं कि मौजूदा वैश्विक अनुमान—जो ज्यादातर मासिक जलवायु चक्रों पर आधारित हैं—इस बात को कम आंक रहे हैं कि गर्म होती दुनिया में ग्लेशियर कितनी तेजी से अपनी बर्फ खोएंगे। यह केवल तापमान की क्रमिक वृद्धि का मामला नहीं है, बल्कि अत्यधिक पिघलाव की वे घटनाएं हैं जो यूरोपीय आल्प्स और अन्य जगहों पर तबाही मचा रही हैं। ग्लेशियरों के भविष्य को समझने के लिए इन चरम पलों को दर्ज करना बेहद जरूरी है।”
पेयजल संकट का बड़ा खतरा
ग्लेशियरों के सिकुड़ने और समुद्र के बढ़ने के अलावा, यह अध्ययन ग्लेशियरों से पिघलने वाले पानी के बहाव (Runoff) के समय और मात्रा में होने वाले भारी बदलावों को भी उजागर करता है, जिसका सीधा असर नदी के किनारे बसने वाले करोड़ों लोगों और जल संसाधनों पर पड़ेगा।
इस शोध के सह-पर्यवेक्षक हैरी ज़ेकोलारी (Harry Zekollari – व्रिज यूनिवर्सिटी ब्रुसेल्स) समझाते हैं, “ग्लेशियर दुनिया के लाखों-करोड़ों लोगों के लिए ताजे पानी का मुख्य स्रोत हैं। इसलिए सिर्फ यह जानना काफी नहीं है कि कितनी बर्फ गायब हो जाएगी, बल्कि यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि पिघला हुआ पानी कब और किस मात्रा में उपलब्ध होगा। हमारा यह अध्ययन जल सुरक्षा से जुड़े भविष्य के संकटों का सटीक अनुमान लगाने में बेहद मददगार साबित होगा।”