माधव गाडगिल: वह चेतावनी, जिसे हमने बार-बार नज़रअंदाज़ कियामाधव गाडगिल: वह चेतावनी, जिसे हमने बार-बार नज़रअंदाज़ किया

माधव गाडगिल का नाम इतिहास में विशेष रूप से पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के साथ दर्ज रहेगा

पंकज चतुर्वेदी

प्रो. माधव गाडगिल का निधन केवल एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक का जाना नहीं है। यह भारतीय विकास-विमर्श में मौजूद उस नैतिक और बौद्धिक आवाज़ का मौन हो जाना है, जो लगातार याद दिलाती रही कि प्रकृति को रौंदकर किया गया विकास अंततः समाज को ही असुरक्षित करता है। उनके जाने से जो खालीपन बना है, वह विज्ञान, नीति और लोकतंत्र—तीनों के लिए गहरा है।

माधव गाडगिल उन दुर्लभ पर्यावरणविदों में थे, जिनके लिए पर्यावरण कोई भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी से जुड़ा प्रश्न था। उन्होंने विकास बनाम पर्यावरण की बहस को सरल द्वंद्व में नहीं बाँटा, बल्कि यह दिखाया कि असल टकरावविकास और विनाशकारी विकास के बीच है।

उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि विकास का मतलब सिर्फ सड़कें, बांध और आंकड़े नहीं होते। असली विकास वह है, जिसमें प्रकृति सुरक्षित हो, समुदाय सम्मानित हों और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकार सुरक्षित रहें।

24 अप्रैल 1942 को जन्मे माधव गाडगिल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में पारिस्थितिकी के क्षेत्र में दशकों तक अध्यापन और शोध किया।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक होने के बावजूद श्री गाडगिल ने खुद को अकादमिक दायरों तक सीमित नहीं रखा। वे वैज्ञानिक थे, पर केवल प्रयोगशाला के नहीं—वे गाँव, जंगल और नदी के वैज्ञानिक थे। उनका विश्वास था कि यदि विज्ञान समाज की ज़रूरतों और अनुभवों से कट जाए, तो वह अधूरा रह जाता है।

यही कारण है कि वे बार-बार लोकज्ञानऔर पारंपरिक पारिस्थितिक समझ की बात करते थे। आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को वे समस्या नहीं, समाधान का हिस्सा मानते थे—एक ऐसा दृष्टिकोण, जो भारत की विकास नीति में आज भी हाशिए पर है।

माधव गाडगिल का नाम इतिहास में विशेष रूप से पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के साथ दर्ज रहेगा। 2011 में प्रस्तुत इस रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट को अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र घोषित करते हुए खनन, बड़े बांधों, अनियंत्रित निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण की सिफारिश की थी।

लेकिन गाडगिल रिपोर्ट की सबसे बड़ी ‘गलती’ यह थी कि उसने निर्णय लेने का अधिकार ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदायों को सौंपने की बात कही। यह सुझाव उस विकास मॉडल के लिए असहज था, जो संसाधनों पर ऊपर से नीचे तक नियंत्रण चाहता है।

रिपोर्ट को जल्द ही ‘विकास विरोधी’ करार देकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बाद में आई कस्तूरीरंगन समिति ने इसकी धार को काफी हद तक कुंद कर दिया। आज पश्चिमी घाट क्षेत्र में बार-बार होने वाली बाढ़, भूस्खलन और पर्यावरणीय तबाही को देखकर यह सवाल और तीखा हो उठता है—क्या हमने एक वैज्ञानिक चेतावनी को राजनीतिक असुविधा के कारण अनसुना कर दिया?

माधव गाडगिल ने बार-बार इस धारणा को चुनौती दी कि पर्यावरण संरक्षण का मतलब लोगों को जंगलों से बाहर करना है। उनके लिए संरक्षण का अर्थ था—प्रकृति और समुदायों के बीच सह-अस्तित्व । उनका एक बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के बराबर महत्व दिया। उनका कहना था कि आदिवासी समाज प्रकृति के ‘उपभोक्ता’ नहीं, बल्कि उसके संरक्षक हैं।

उनका यह दृष्टिकोण भारत के उस संरक्षण मॉडल पर सवाल खड़ा करता है, जिसमें राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के नाम पर स्थानीय लोगों को विस्थापित किया गया, जबकि बड़े परियोजनाओं  को उसी क्षेत्र में छूट मिलती रही।

भारत के जैव विविधता अधिनियम, 2002के निर्माण में माधव गाडगिल की भूमिका एक स्थायी विरासत है। यह कानून जैव संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के अधिकार को मान्यता देता है और जैव विविधता के व्यावसायिक दोहन पर नियंत्रण की बात करता है। यह केवल

माधव गाडगिल की सबसे बड़ी ताकत उनका असहज सवाल पूछने का साहस था। वे यह पूछने से नहीं डरते थे कि—

  • विकास किसके लिए है?
  • इसकी कीमत कौन चुका रहा है?
  • और क्या भविष्य की पीढ़ियों की सहमति हमने कभी ली?

आज के दौर में, जब पर्यावरण अक्सर ‘ग्रीन ब्रांडिंग’ और सतही समाधानों तक सिमटता जा रहा है, गाडगिल का दृष्टिकोण कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है।पद्म भूषण सहित अनेक सम्मानों से नवाज़े गए माधव गाडगिल सत्ता के प्रिय नहीं थे—और शायद यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

वे नीति-निर्माताओं के लिए असुविधाजनक थे, क्योंकि वे सरल समाधान नहीं, कठिन सच्चाइयाँ पेश करते थे।उनकी विरासत हमें यह याद दिलाती है कि पर्यावरण संरक्षण कोई ‘एलीट प्रोजेक्ट’ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

श्री माधव गाडगिल का निधन ऐसे समय में हुआ है, जब जलवायु संकट, जैव विविधता ह्रास और प्राकृतिक आपदाएँ भारत के हर हिस्से को प्रभावित कर रही हैं—चाहे वह हिमालय हो, पश्चिमी घाट हों या तटीय क्षेत्र।उनकी चेतावनियाँ अब दस्तावेज़ों में दर्ज भविष्यवाणियाँ नहीं रहीं—वे हमारे सामने घटती घटनाएँ बन चुकी हैं।

आज उन्हें श्रद्धांजलि देने का सबसे ईमानदार तरीका यह नहीं कि हम उनके योगदान की प्रशंसा करें, बल्कि यह है कि हम उस विकास मॉडल पर गंभीर पुनर्विचार करें, जिसे उन्होंने बार-बार कटघरे में खड़ा किया था।

माधव गाडगिल केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय लोकतंत्र के पैरोकार हैं। उनका योगदान हमें यह सोचने को मजबूर करता है कि विकास की परिभाषा सिर्फ जीडीपी नहीं, बल्कि सुरक्षित पर्यावरण, टिकाऊ आजीविका और भावी पीढ़ियों का अधिकार भी है।माधव गाडगिल चले गए, लेकिन उनके सवाल अब भी हमारे सामने हैं—और उनसे मुँह मोड़ना, शायद अब संभव नहीं।