रोहित कौशिक
क्या वास्तव में नदियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं या फिर समय के प्रभाव से नदियों के स्वरूप में परिवर्तन हो रहा है ? निश्चित रूप से समय का प्रभाव तो है ही, लेकिन समाज के स्वार्थ के कारण भी आज नदियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी नदियों पर एक बड़ा खतरा पैदा हो गया है। हालांकि कुछ नदियों पर यह खतरा अभी नहीं दिखाई दे रहा है लेकिन भविष्य में ऐसी नदियों पर इस खतरे का प्रभाव पड़ सकता है। हमारे देश में तो नदियों की पूजा की जाती है। भारत में नदियों का सामाजिक महत्व तो ही, धार्मिक महत्व भी है। हमारे यहां प्राचीन समय से ही धार्मिकता के आधार पर नदियों को विशेष महत्व दिया गया है। इस दौर में लगातार हो रहे विकास ने भी नदियों के पर्यावरण को प्रभावित किया है। एक नए अध्ययन में बताया गया है कि निर्माण कार्यों के लिए रेत और बजरी का दोहन प्रकृति की पुनर्भरण क्षमता से अधिक गति से हो रहा है, जिससे नदियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। दरअसल शहरीकरण की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। इस समय कस्बों और शहरों का तेजी से विस्तार हो रहा है। जब लोग रोजगार के लिए शहरों में आते हैं तो निर्माण कार्यों में भी तेजी आती है। निर्माण कार्यों में रेत और बजरी की जरूरत होती है। इसका दबाव नदियों पर पड़ता है। रेत का अत्यधिक दोहन भारत समेत दुनिया भर की नदियों के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है।
हाल ही में सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया। यह अध्ययन 26 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की समीक्षा पर केन्द्रित है। इसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल ‘रिव्यूज ऑफ जियोफिजिक्स’ में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने 1974 से अब तक प्रकाशित 411 वैज्ञानिक अध्ययनों का विश्लेषण किया। अध्ययन में बताया गया है कि किसी भी नदी से ज्यादा रेत निकालने के कारण उसके किनारे कमजोर होने लगते हैं। इसके साथ ही भूजल स्तर कम होने लगता है और जल प्रदूषित होने लगता है। तटीय इलाकों में समुद्र का खारा पानी अंदर तक पहुंचने लगता है। किसी भी तरह के निर्माण पर तो इसका असर पड़ता ही है, यह कृषि को भी प्रभावित करता है। सवाल यह है कि क्या भविष्य में रेत के इस्तेमाल को कम किया जा सकता है ? जिस तरह से निर्माण कार्य बढ़ते जा रहे हैं, उससे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में रेत की मांग और बढ़ेगी। इसका सीधा प्रभाव नदियों पर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि 2060 तक निर्माण क्षेत्र में रेत की मांग 45 फीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। इस रिपोर्ट की बात छोड़ दें तो भी इसके लिए किसी बड़े गणित की आवश्यकता नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत में सरकार इस मुद्दे पर कोई वैकल्पिक नीति बना रही है ? वैकल्पिक नीति की तो बात ही छोड़ दें, कई स्थानों पर अवैध खनन हो रहा है लेकिन राज्य सरकारें अवैध खनन भी नहीं रोक पा रही हैं। विदेशों में इस संबंध में सख्त-नियम कानून हैं लेकिन हमारे देश में इस मुद्दे पर कई तरह की विसंगतियां हैं।
दरअसल दुनिया में लगभग 5000 करोड़ टन रेत और बजरी का खनन हो रहा है। रेत और बजरी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर हम अपना अधिकार समझते हैं। हम यह नहीं समझ पाते हैं कि जिस रेत और बजरी का हम अंधाधुंध खनन कर रहे है उन्हें बनने में एक लंबा समय लगता है। चीन कंक्रीट निर्माण के लिए सबसे ज्यादा रेत और बजरी का इस्तेमाल करता है। दूसरे नंबर पर भारत निर्माण के लिए सबसे ज्यादा इस सामग्री का इस्तेमाल करता है। भारत में खनन के कारण विभिन्न क्षेत्रों की नदियों में अलग-अलग बदलाव देखे गए। उत्तर-पश्चिम भारत की हिमालयी नदियों में तलछट का प्रवाह ठीक तरीके से नहीं हो रहा है। नदियों की चौड़ाई घट रही है और तल गहरा हो रहा है। बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद इन नदियों का तल सूखकर दिखाई देने लगता है। इस कारण वहां से आसानी के साथ रेत निकाला जाता है। भारत की मयुराक्षी नदी, हिमालय की तलहटी में बहने वाली गौला नदी और सतलुज नदी पर हुए अध्ययनों में यह बात सामने आई कि अत्यधिक खनन नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को बदल रहा है। नदियां संकरी हो रही हैं और किनारों पर कटाव बढ़ा है। इसी तरह दक्षिण भारत में खनन की वजह से भूजल में कमी देखी गई। इसके साथ ही लवणता भी बढ़ गई। तेलंगाना और केरल की नदियों के पीएच स्तर में बदलाव दर्ज किया गया। दरअसल रेत हमारे पारिस्थितिक तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। रेत मछलियों, कछुओं, केकड़ों और अन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करती है। इसके साथ ही रेत समुद्री कटाव को रोकती है और बाढ के असर को कम करती है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कई जगहों पर संरक्षित क्षेत्रों में भी रेत का खनन हो रहा है। सवाल यह है कि इस दौर में क्या सरकार कोई ऐसी योजना बना सकती है, जिससे जरूरी निर्माण कार्य भी होते रहें और नदियों को भी संरक्षित किया जा सके ? हमें भी यह समझना होगा कि रेत और बजरी का अत्यधिक दोहन केवल नदियों को ही बर्बाद नहीं करेगा बल्कि हमारी जिंदगी को भी प्रभावित करेगा।