अखण्ड प्रताप सिंह
देश की राजनीति, खेल, जनसंख्या में अपना अहम स्थान रखनें वाला उत्तर प्रदेश तेजी से जलविहीन हो रहा है जिसका मूल कारण जनमानस की उपेक्षा सरकारी उदासीनता और बारिश का कम होना है। उ0प्र0 में जलाशयों,(डैम) की भरमार है। सरकारी आंकडो पर नजर डालें तो 150 जल भण्डार या डैम हैं। जिनमें से 72 काफी बडें हैं। जिनकी कुल क्षमता लगभग 11 हजार एम.सी.एम.(मिलियन क्यूसेक मीटर) है। अर्थात 28 प्रतिशत पानी है।
उत्तर प्रदेश में रिहन्द और ओबरा में पानी की स्थित हमेशा बेहतर रखी जाती है क्योंकि इन जलाशयों से कई विघुत जल युनिटें संचालित होती हैं। इसके अतिरिक्त शारदा सागर (पीलीभीत) बलरामपुर का कोहर गड्डी,खेरवाँ,मझगवां…………..श्रावस्ती का रामपुर मोतीपुर महोबा का अर्जुन, चन्द्रावल आदि है तो बनारस को काटकर बनें जिले चंदौली का नौगढ़ और भेंसोड़ा आदि में सामान्य से कम पानी की मात्रा पायी गई जिसका कारण इनमें नदियों से आनें वाले पानी की मात्रा कम है। नदियों में दशकों से सिल्ट (कचरा,बालू,ंककड़) आदि का जमावड़ा है इसकी सफाई हुई ही नहीं। हिमालय से सीधे पोषित नदियों में गंगा,जमुना,राप्ती,गंडक,सरयू(घाघरा) आदि में पानी तो है परन्तु सिल्ट नें वहाँ भी अपना असर दिखा दिया है। नदियों में जब सिल्ट नहीं हटाया जायेगा तो वें गहरी नहीं हांेगी उनमें बारिश का पानी जमा न होकर गाँवों,अबादी को अपनी चपेट में लेगा जिससे पानी का बहाव ठहर जायेगा उनमें तेज प्रवाह नहीं होगा। हिमालय के ग्लेशियरो की स्थिति दिन-प्रतिदिन खराब हो रही है जिससे पानी का घटनां स्वाभाविक है।
कई नदियो में पानी का आकाल पड़ा है यूपी0 में लगभग 3 दर्जन नदियाँ सूख गई हैं जिनमें से 14 तो सिर्फ आजमगढ़ में हैं,अम्बेडकर नगर में 6, गोरखपुर मंे 10,देवरिया में 4 और बस्ती में 6 नदियाँ सूख रही हैं। जिनका मुख्य कारण नदियों के सिल्ट के चलते उथला होना और बारिश का कम होना है। यही नहीं बेंतवा,सोन,तमसा,मंजूषा,रामगंगा में पानी बहुतायत मात्रा में रहता था परन्तु यह सब हर वर्ष कम होती बारिश,सिल्ट के कारण तेजी से सूख रहीं हैं।
राज्य सरकार के आंकडांे के अनुसार कृषि की प्रधानता वाले इस प्रदेश में 77600 किमी. लम्बी विभिन्न नहर परियोजनाओं से सिंचाई की सुविधा दी जाती है। मुख्य नहरों की लम्बाई 4000 किमी, लिंक नहरों की लम्बाई 1440 किमी. है। 25 करोड़ की अबादी को पार कर गया उ.प्र. की पानी की जरूरतों को पूरा करनें के कई स्रोत है जिससे यह पता लगाना मुश्किल है कि प्रतिमाह, प्रतिदिन या अन्य अवधि के लिए कितना पानी की जरूरत है परन्तु यह तय है कि प्रदेश के जलाशय तेजी से सूख रहें हैं। पानी की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं।
उ.प्र. से विभाजित होकर बना उत्तराखण्ड मंे अवश्य 80प्रतिशत पानी है वहाँ पानी, बिजली सरप्लस है। यूपी का पड़ोसी राज्य बिहार भी बदहाल ही है। यहाँ की 22 नदियाँ सूखी पड़ी हैं। यहाँ भी उ.प्र. जैसी ही समस्या है यहां के 12 डैम मंे 10 प्रतिशत से भी कम पानी बचा है। जिसका कारण कम बारिश,भू-जल का अंधाधुंध उपयोग (सब मर्सिबल के जरिये) यहाँ भू-जल दोहन का स्तर 2004-2005 में 11 प्रतिशत था जो अब 34 प्रतिशत बढ़कर 51.24 प्रतिशत तक आ गया है। यहाँ जलाशय ही नहीं गाँव के तालाब भी इतिहास बन रहें है।
बिहार के विभाजन के बाद झारखण्ड बनें पहाड़ी राज्य में इस वर्ष अब तक सामान्य से 53 प्रतिशत कम बारिश हुई है। राज्य की अधिकतर नदियाँ सूखी पडी है जो बरसात में खूब उफनती थीं। इन राज्यों में जलाशयों की पांच बड़ी समस्याएं है- गाद(सिल्ट) का जमाव,गंदगी,कुप्रबंधन,जलवायु परिवर्तन और अवैध अतिक्रमण