रोहित कौशिक
हाल ही में नेपाल में आई बाढ़ ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पर्यावरण से जुड़े इन सवालों पर यदि गंभीरता से चिंतन नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसी आपदाओं के बढ़ने की उम्मीद है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हम विकास के चक्कर में हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। नेपाल में आई बाढ़ तो एक उदाहरण भर है। हमारे देश में भी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं लेकिन हम इन आपदाओं से कोई सबक नहीं लेते हैं। पिछले कुछ समय से भारत में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या और तीव्रता बढ़ी है। ये आपदाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि हमारी आवाज सुनने की कोशिश करो लेकिन विकास के शोर में इन प्राकृतिक आपदाओं की आवाज नहीं सुनी जा रही है। जब भी इस तरह की आपदा आती हैं तो इस खोखले विकास को कठघरे में खड़ा किया जाता है लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है।
पहाड़ों में नदी, नालों और पानी के रास्ते के किनारे होने वाले निर्माण और अतिक्रमण को हम रोक नहीं पाए हैं। अभी भी धड़ल्ले से इस तरह के निमार्ण और अतिक्रमण हो रहे हैं। जाहिर है कि जब इस तरह की आपदाएं आती हैं तो किनारे पर होने वाले अतिक्रमण और निर्माण की वजह से जान-माल की हानि ज्यादा होती है। हमारे देश में भी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में बादल फटने, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी आपदाएं बढ़ती जा रही हैं। निश्चित रूप से कई बार मौसम खराब होने के कारण भी ऐसी आपदाएं आती हैं लेकिन मौसम खराब होना ऐसी आपदाओं का एक कारण है। मानवीय गतिविधियां बढ़ने के कारण भी ऐसी आपदाएं बढ़ती जा रही हैं। इस तरह की कई आपदाएं पहाड़ों पर जान और माल का नुकसान बढ़ा रही हैं। इसलिए इस दौर में इन आपदाओं के कारणों पर व्यापक रूप से चिंतन करना होगा। कई भूवैज्ञानिकों का मानना है कि पहाड़ों पर हिमनदों के पिघलने की दर बढ़ रही है। बढ़ते तापमान और पहाड़ों के भीतर हो रहे कई तरह के बदलावों के कारण हिमनदों के टूटने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। कुछ समय पहले संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हिमालय के विभिन्न हिमनद जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघल रहे है। इस कारण वहां किसी भी समय बड़ी प्राकृतिक आपदा आ सकती है। कुछ समय पहले उत्तराखंड में हिमनद पिघलने की वजह से ऐसी कई प्राकृतिक आपदाओं ने भारी तबाही मचाई थी।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हम केदारनाथ आपदा से सबक नहीं ले पाए और पहाड़ों पर जल प्रलय के शास्त्र को समझे बिना विकास की परियोजनाओं को हरी झंडी देते चले गए। यही कारण है कि हमें लगातार इस तरह की आपदाओं का आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रारम्भ से ही पहाड़ों पर अत्यधिक जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध होता रहा है। अनेक वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि पहाड़ों पर ये जल विद्युत परियोजनाएं भविष्य में और भी बड़ी तबाही मचा सकती हैं। हर क्षेत्र का अपना अलग पर्यावरण होता है। हम पहाड़ के पर्यावरण की तुलना मैदानी क्षेत्रों के पर्यावरण से नहीं कर सकते। यदि हम पहाड़ के पर्यावरण को समझे बिना विकास की परियोजनाओं को आगे बढ़ाएंगे तो इस तरह की आपदाओं को ही निमंत्रण देंगे। यह विडम्बना ही है कि मानव हस्तक्षेप के चलते पहाड़ों पर इस तरह की आपदाएं बढ़ती जा रही हैं। गौरतलब है कि पहाड़ों पर बनने वाले बांधों ने ग्लेशियरों को कमजोर किया है। ग्लेशियरों के मुहाने पर बनने वाले बांध पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड में ज्यादातर ग्लेशियरों पर बर्फबारी के कारण कई लाख टन बर्फ का भार बढ़ जाता है। जिसकी वजह से ग्लेशियरों के खिसकने व टूटने का खतरा बना रहता है। हालांकि सर्दियों में ग्लेशियर टूटने की घटनाएं कम होती हैं। दरअसल विकास की विभिन्न परियोजनाओं के लिए जिस तरह से जंगलों को नष्ट किया गया और पेड़ों की कटाई की गई, उसने स्थिति को और भयावह बना दिया। इस भयावह स्थिति के कारण मानसून तो प्रभावित हुआ ही, ग्लेशियरों का टूटना, भू-क्षरण एवं नदियों द्वारा कटाव किए जाने की प्रवृति भी बढ़ी। ग्लेशियर टूटने के कारण बाढ़ का खतरा लगातार बना रहता है। इस तरह की घटनाओं के कारण भविष्य में पहाड़ों पर बाढ़ का खतरा और बढ़ेगा।
आज विकास का जो हवा महल बनाया जा रहा है, वह किसी न किसी रूप से आम आदमी की कब्र खोदने का काम ही कर रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हम बड़े ही शर्मनाक तरीके से इस विकास पर अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं। क्या हम विकास का ऐसा माडल नहीं बना सकते जिससे पहाड़ भी सुरक्षित रहे और पहाड़ के निवासियों को स्थाई रूप से फायदा हो। आज निश्चित रूप से विज्ञान निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर है लेकिन वह प्रकृति के सामने बौना ही है। अगर विश्व के बुद्धिजीवी प्रकृति के साथ विज्ञान की प्रतियोगिता कराएंगे तो किसी न किसी रूप में वे तबाही को ही जन्म देंगे। विज्ञान और प्रगतिवादी सोच का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए न कि मानव विनाश के लिए। सम्पूर्ण विश्व में जब भी प्रकृति के साथ किसी भी रूप में छेड़छाड़ हुई है तो उसने तबाई मचाई है। अक्सर हमारे कुछ वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी विभिन्न तर्क देकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं कि प्रकृति की आड़ में विकास परियोजनाओं को नहीं रोका जा सकता। ऐसा कहकर ये बुद्धिजीवी एक तरह से प्रकृति को चुनौती ही देते हैं। यह अनेक बार सिद्ध हो चुका है कि विभिन्न भविष्यवाणियों के बावजूद हम प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने में असमर्थ हैं। भारत जैसे विकासशील देश में पीने के पानी ,सिचाई एवं ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जिससे कि संसाधनों का समुचित उपयोग एवं ठीक ढंग से पर्यावरण संरक्षण हो सके। इस व्यवस्था में वर्षा जल के संरक्षण ,वैकल्पिक स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने तथा जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था से गरीबो का भी भला होगा। हमें यह ध्यान रखना होगा कि पहाड़ का अपना अलग पर्यावरण होता है। इस पर्यावरण की रक्षा करना आम नागरिकों का कर्तत्व तो है ही, सरकार का कर्तव्य भी है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि विभिन्न सरकारें विकास की परियोजनाओं में पहाड़ के पर्यावरण का ख्याल नहीं रखती हैं।