पंकज चतुर्वेदी
धरती के बढ़ते तापमान का सबसे प्रत्यक्ष और चिंताजनक असर आज हिमालय के ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है। दुनिया का तीसरा ध्रुव कहे जाने वाले इस पर्वतीय क्षेत्र में बर्फ पिघलने की रफ्तार बीते दशकों में कई गुना बढ़ चुकी है, और इसका सीधा प्रभाव सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, सतलुज और यांग्त्से जैसी विशाल नदियों के जलस्तर, प्रवाह और व्यवहार पर पड़ रहा है। हिमाचल प्रदेश से लेकर लद्दाख तक फैले ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में यह बदलाव अब केवल पानी की सालाना मात्रा तक सीमित नहीं रहा; बर्फ और ग्लेशियर पिघलने के समय में बदलाव, नदियों में गाद जमने और किनारों की स्थिरता कमजोर होने से नदी प्रवाह की मूल प्रकृति ही बदल रही है।
आंकड़े इस संकट की गंभीरता को साफ दिखाते हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईमोड की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से 2020 के दशक में हिमालय के ग्लेशियर उससे पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत तेजी से पिघले हैं। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि डेढ़ से दो डिग्री सेल्सियस के बीच भी सीमित रहती है, तब भी सन 2100 तक हिमालय के ग्लेशियरों का 30 से 50 प्रतिशत आयतन समाप्त हो जाने की आशंका है। आईपीसीसी की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट भी चेतावनी देती है कि आने वाले कुछ दशकों में बर्फ के तेज पिघलने से नदियों के वार्षिक प्रवाह में अस्थायी वृद्धि होगी, जिसके बाद ग्लेशियरों के सिकुड़ने से जलस्तर में भारी गिरावट आएगी।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान इंदौर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलूरू, अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र अहमदाबाद, राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र गोवा और ब्रिटेन के एबरडीन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मिलकर लद्दाख और हिमाचल प्रदेश की घाटियों पर जो अध्ययन किया है, वह और भी बारीक तस्वीर सामने रखता है। 1975 से 2024 के बीच लद्दाख के तापमान में हर साल औसतन 0.02 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई, जिसके चलते बर्फ पिघलने का समय पहले खिसक गया और झरनों का बहाव लगातार घटता गया। ऊपरी सिंधु की सहायक नदियों में तो कुल जल बहाव का 62 से 72 प्रतिशत हिस्सा आज भी बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर ही निर्भर है। 1977 से 2019 के बीच लद्दाख के 2,257 ग्लेशियरों के विश्लेषण में पाया गया कि इन 42 वर्षों में ग्लेशियर क्षेत्र 8,511 वर्ग किलोमीटर से घटकर 7,923 वर्ग किलोमीटर रह गया, यानी लगभग 97 प्रतिशत ग्लेशियर पीछे हट चुके हैं। लद्दाख के ही स्टोक क्षेत्र में 2003 से 2019 तक हुए अध्ययन में सामने आया कि वहां सालाना नदी प्रवाह में बर्फ पिघलने की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत, ग्लेशियर पिघलने की 19 प्रतिशत और बारिश की मात्र 16 प्रतिशत रही, जबकि इसी दौरान ग्लेशियर क्षेत्र में 4.2 प्रतिशत की कमी आई। इस पानी पर स्टोक के तीन सौ से अधिक परिवारों की खेती पूरी तरह निर्भर है।
हिमाचल प्रदेश की चंद्रा-भागा घाटी की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। इस नदी तंत्र से जुड़े 251 ग्लेशियरों के अध्ययन में पाया गया कि 1993 से 2019 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र 996 वर्ग किलोमीटर से घटकर 973 वर्ग किलोमीटर रह गया। पिघलने की दर भी बढ़ती जा रही है — 1993 से 2000 के बीच यह प्रति वर्ष 0.025 वर्ग किलोमीटर थी, जो 2010 से 2019 के बीच बढ़कर 0.036 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष हो गई। एक अन्य अध्ययन बताता है कि गर्मियों में हवा का तापमान महज एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर चंद्रा नदी का बहाव औसतन 22 घन मीटर प्रति सेकंड तक बढ़ जाता है, जिसमें भूजल, ग्लेशियर पिघलन और मौसमी बर्फ पिघलन का लगभग बराबर योगदान है, जबकि बारिश की भूमिका नगण्य रहती है।
यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं, इसके भयावह उदाहरण हाल के वर्षों में सामने आ चुके हैं। फरवरी 2021 में उत्तराखंड में नंदा देवी ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर गिरने से धौलीगंगा और ऋषिगंगा नदियों में जो जलप्रलय आया, उसने दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया और दो सौ से अधिक लोगों की जान ले ली। अक्तूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक ग्लेशियल झील के फटने से तीस्ता नदी में आई भीषण बाढ़ ने चुंगथांग बांध, कई पुल और पूरा बुनियादी ढांचा नष्ट कर डाला। ऐसी दुर्घटनाएं ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहलाती हैं, और गर्मियों में तेज बर्फ पिघलन तथा मानसून की भारी बारिश का दोहरा असर जब एक साथ पड़ता है, तो ब्रह्मपुत्र, गंगा, सतलुज और सिंधु की सहायक नदियों के मैदानी इलाकों में भूमि कटाव और बाढ़ की आवृत्ति कई गुना बढ़ जाती है।
यह बदलाव खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसके दुष्प्रभाव कई स्तरों पर एक साथ पड़ते हैं। बर्फ के तेज पिघलने से चट्टानें, मलबा और मिट्टी बहकर नदियों में जमा होती जाती है, जिससे नदी का तल उथला हो जाता है और मामूली बारिश में भी बाढ़ आने लगती है, साथ ही जलविद्युत संयंत्रों की टरबाइनें भी क्षतिग्रस्त होती हैं। दूसरी ओर, आज जो अल्पकालिक बाढ़ दिख रही है, वह भविष्य के गंभीर सूखे की चेतावनी भी है — ग्लेशियर जब सिकुड़ जाएंगे, तो गर्मियों में पानी का मुख्य स्रोत ही खत्म हो जाएगा, जिससे लद्दाख, हिमाचल और मैदानी इलाकों के लाखों लोगों के सामने पीने के पानी और सिंचाई का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। नदियों के प्रवाह, जलमात्रा और तापमान में आ रहे बदलाव हिमालयी ट्राउट और गंगा डॉल्फिन जैसी प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को भी नष्ट कर रहे हैं, जबकि लद्दाख और हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती, पशुपालन और स्थानीय जलापूर्ति बाधित होने से कई परिवार जलवायु शरणार्थी बनने को विवश हो रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश से लद्दाख तक और समूचे हिमालयी क्षेत्र में हो रहा यह परिवर्तन केवल पर्यावरण का स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिण एशिया के लगभग डेढ़ से दो अरब लोगों की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक वैश्विक संकट बन चुका है। इससे निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में तेज कटौती के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर भी ठोस कदम अनिवार्य हैं — ऊंचाई वाली हिमालयी झीलों और ग्लेशियरों की उपग्रह तथा जमीनी सेंसर के जरिये चौबीसों घंटे निगरानी करने वाली पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करनी होगी, नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगानी होगी, और बदलती जल उपलब्धता के अनुरूप फसलों के ढांचे तथा सिंचाई तकनीकों में भी बदलाव लाना होगा।
हिमालय की नदियां सदियों से करोड़ों लोगों के जीवन का आधार रही हैं; उनके बदलते मिजाज को समय रहते समझना और उसके अनुरूप नीतियां बनाना अब विलंब सहन करने वाला विषय नहीं रह गया है।