पंकज चतुर्वेदी
इस साल पूर्वोत्तर भारत में बारिश का हिसाब जितना चौंकाता है, तबाही का मंज़र उससे कहीं ज़्यादा डराता है। भारतीय मौसम विभाग के आँकड़े बताते हैं कि 1 जून से 26 अगस्त 2026 के बीच पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में कुल बारिश सामान्य से करीब 27 प्रतिशत कम रही। असम में तो जून-जुलाई के दौरान महज 594.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य आँकड़ा 839.6 मिलीमीटर है यानी लगभग 29 प्रतिशत की कमी। अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से 41 फीसदी कम, सर्वाधिक बरसात के लिए मशहूर मेघालय में 58 प्रतिशत, मणिपुर में 43 प्रतिशत कम बरसात हुई इसके बावजूद इस साल उत्तर-पूर्वी राज्यों ने जो बाढ़, भूस्खलन और तबाही झेली, वह पिछले कई दशकों की सबसे भयावह घटनाओं में गिनी जा रही है। यह विरोधाभास ही इस साल की कहानी की जड़ है — कम बारिश, मगर ज़्यादा विनाश।हाल में नेपाल में आई त्रासदी ने जताया दिया है कि हिमालय की गोद में बसे राज्यों की जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता गंभीर मोड पर है। यहाँ निर्माण कार्य, जल विद्धुत परियोजना, खनन आदि सभी कार्यों के लिए संभल कर काम करना होगा ।
इसका जवाब छिपा है इस बात में कि बारिश कहाँ और कैसे हुई। मोकोकचुंग में सामान्य से 493 प्रतिशत ज़्यादा और पूरे नागालैंड में औसतन 181 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज हुई। यानी कुल मौसम में भले ही पानी कम गिरा हो, लेकिन नागा पहाड़ियों और अरुणाचल प्रदेश की चोटियों पर बहुत कम समय में बेहद केंद्रित बारिश हुई। इस पानी को पहाड़ों से मैदान तक पहुँचने में देर नहीं लगती और यही देर न लगना असम के लिए काल बन गया। असम विश्वविद्यालय, सिलचर की एक टीम ने अगस्त 2026 में तैयार अपनी रिपोर्ट में इसी पहलू को रेखांकित किया है — इस बार ब्रह्मपुत्र नदी अपने चरम प्रवाह तक पहुँचने से पहले ही दिखौ, दिसांग, झांजी और धनसिरी जैसी दक्षिण-तटीय सहायक नदियाँ उफन पड़ीं और पुराने तटबंधों को तोड़ बैठीं। यानी बाढ़ का सामान्य क्रम ही उलट गया, पहले सहायक नदियाँ, फिर मुख्यधारा। इसका सबसे बुरा असर चराइदेव, शिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट जिलों पर पड़ा। चरम स्थिति में करीब 2.12 लाख लोग प्रभावित हुए, जबकि पूरी बाढ़ अवधि में यह संख्या करीब 7 लाख तक जा पहुँची। 25 अगस्त तक असम में 1,37,590 लोग, दस जिले और 11,933 हेक्टेयर से ज़्यादा फसल क्षेत्र प्रभावित बताए गए, और मृतकों की संख्या 107 तक पहुँच गई।
अगर सिर्फ असम की बात न करें तो पूरे पूर्वोत्तर की तस्वीर और भी व्यापक है। एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय शोध, जिसमें भारत, स्वीडन, अमेरिका, नीदरलैंड और ब्रिटेन के वैज्ञानिक शामिल थे, ने पाया कि 28 जून के आसपास आई पहली भारी बारिश ने छह जिलों में 22,000 से ज़्यादा लोगों को प्रभावित किया, और फिर 18 से 21 जुलाई के बीच दूसरी, कहीं ज़्यादा गंभीर बारिश ने 16 जिलों और 794 गाँवों को जलमग्न कर दिया। इस पूरे दौर में क्षेत्र में पाँच लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए और अकेले असम में कम से कम 99 लोगों की मौत हुई। केंद्र सरकार ने राहत के तौर पर असम को 379.35 करोड़ रुपये की तुरंत सहायता जारी की, जो सात बाढ़-प्रभावित राज्यों को दी गई कुल 2,117.85 करोड़ रुपये की मदद का हिस्सा थी। नुकसान सिर्फ इंसानी जिंदगियों तक सीमित नहीं रहा — 235 सड़कें, 40 पुल, 75 पुलिया, 161 जलापूर्ति प्रणालियाँ, 823 बिजली के खंभे, 66 सिंचाई परियोजनाएँ, 122 सरकारी भवन, 41 स्कूल और 16 बाढ़ सुरक्षा दीवारें क्षतिग्रस्त हुईं। आठों राज्यों में राष्ट्रीय राजमार्गों का करीब 40.36 किलोमीटर हिस्सा भी बर्बाद हो गया। सिक्किम के नामची जिले में तीस्ता जलविद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में भूस्खलन से कम से कम दस मज़दूरों की जान चली गई।
अब सवाल यह उठता है कि जब सामान्य से कम बारिश हुई, तो इतनी तबाही क्यों हुई। इसका एक बड़ा कारण भूगोल में ही छिपा है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बती पठार से निकलकर पूर्वी हिमालय से गुज़रती हुई असम की घाटी में उतरती है, और रास्ते में भारी मात्रा में गाद और मलबा साथ लाती है। जैसे ही यह नदी पहाड़ों से मैदान में उतरती है, ढाल अचानक कम हो जाता है और यह गाद नदी-तल में जमा होने लगती है। इससे नदी की जल-वहन क्षमता लगातार घटती जाती है। सन 1954 से अब तक करीब 3,800 वर्ग किलोमीटर ज़मीन कटाव में समा चुकी है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार बीते छह दशक में असम की 4.27 लाख हेक्टेयर ज़मीन, यानी राज्य के कुल क्षेत्रफल का 7.40 प्रतिशत, नदी में विलीन हो चुकी है — हर साल औसतन आठ हज़ार हेक्टेयर। ब्रह्मपुत्र की औसत चौड़ाई 5.46 किलोमीटर है, लेकिन कटाव के चलते कई जगह यह 15 किलोमीटर तक फैल चुकी है। यही ऊँचा होता नदी-तल है जो थोड़े-से अतिरिक्त पानी को भी तटों से बाहर फेंक देता है।
इसमें एक अहम भूमिका पहाड़ों में हो रहे अवैध खनन और बेतरतीब निर्माण की भी है। नागालैंड के मोन ज़िले में और आसपास के इलाकों में अवैध कोयला खनन, पहाड़ काटकर सड़कें बनाना और जंगलों की कटाई ढलानों की मज़बूती को कमज़ोर करती रही है। जब बारिश होती है तो पानी मिट्टी में समाने की बजाय तेज़ी से नीचे बहता है और अपने साथ खदानों तथा सड़क-कटिंग का मलबा भी नदियों में उड़ेल देता है। इससे नदी-तल में गाद बढ़ती है और उनकी पानी बहाने की क्षमता और घट जाती है। हालाँकि नागालैंड के एक स्थानीय संगठन ने इस साल की बाढ़ को अवैध खनन या किसी जलाशय से छोड़े गए पानी से सीधे जोड़े जाने से इनकार भी किया है और इसका कारण सिर्फ असाधारण स्थानीय बारिश तथा भूस्खलन बताया है। इसी तरह मेघालय में 2014 के प्रतिबंध के बावजूद जारी रैट-होल कोयला खनन से वनस्पति और मिट्टी की ऊपरी परत उखड़ती है, अम्लीय पानी खदानों में जमा होता है और बारिश के दौरान यह मलबा धाराओं में बह जाता है। हालाँकि इस साल की असम बाढ़ को मेघालय के खनन से सीधा जोड़ने के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण अभी सामने नहीं आए हैं, इसलिए वैज्ञानिकों का सुझाव है कि उपग्रह मानचित्रण, वर्षा-आँकड़े, नदी-प्रवाह और तलछट के रासायनिक विश्लेषण को मिलाकर ही निर्णायक निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। इसी शोध-दल का आकलन बताता है कि इस साल की बाढ़ से जुड़ी तीन-दिन और तीस-दिन की वर्षा का पुनरावृत्ति-काल दो साल से भी कम है, यानी यह बारिश आज के जलवायु में कोई असाधारण घटना नहीं थी। मौजूदा आँकड़ों और जलवायु मॉडलों के विश्लेषण से यह भी सामने आया कि 1.4 डिग्री सेल्सियस की वैश्विक तपन ने इस साल की भारी बारिश की संभावना या तीव्रता को किसी निर्णायक ढंग से नहीं बदला, हालाँकि क्षेत्र में मौसम केंद्रों की कमी के चलते आँकड़ों में अनिश्चितता भी बहुत ज़्यादा है, इसलिए किसी घटते या बढ़ते रुझान को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो इस साल की तबाही का मुख्य कारण अकेले जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद भौतिक और संरचनात्मक कमज़ोरियाँ रहीं, जिन्होंने साधारण-सी बारिश को भी असाधारण नुकसान में बदल दिया।
कुल मिलाकर 2026 की यह बाढ़ किसी एक कारण की देन नहीं, बल्कि कई कारकों के एक साथ मिलने का नतीजा है — केंद्रित पर्वतीय वर्षा, सहायक नदियों का एक साथ उफनना, गाद से पटा नदी-तल, जर्जर तटबंध, सिकुड़ती आर्द्रभूमियाँ, अवैध खनन और वनों की कटाई से कमज़ोर होते ढलान, और बाढ़-मैदानों में बढ़ती आबादी व असुरक्षित बसावट। वैज्ञानिक इसे ‘कंपाउंड डिज़ास्टर’ यानी बहु-कारणीय आपदा कहते हैं। आगे की राह के लिए विशेषज्ञ नदी-तट कटाव को अधिसूचित आपदा घोषित करने, सेंटिनल और NISAR जैसे उपग्रहों से बाढ़-जोखिम मानचित्रण करने, वेटलैंड बहाल करने, तटबंधों की जगह बाढ़-मैदान बहाली और सामुदायिक तैयारी को प्राथमिकता देने, तथा हर क्षेत्र के लिए अलग-अलग रणनीति बनाने का सुझाव देते हैं। जब तक पहाड़ों में हो रहे अवैध खनन, बेतरतीब निर्माण और वनों की कटाई पर लगाम नहीं लगती, और मैदानी इलाकों में तटबंधों की जगह नदियों के साथ तालमेल बिठाने वाली नीतियाँ नहीं अपनाई जातीं, तब तक पूर्वोत्तर के लिए हर मानसून एक नई परीक्षा बना रहेगा — भले ही बारिश कम हो या ज़्यादा।