© UNDP/Andrea Egan प्रशान्त महासागर के द्वीप समूह टोकेलाउ में फ़सलों के ऊपर सौर पैनल लगाए गए हैं, जिससे एक ही भूमि पर खाद्य उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा, दोनों सम्भव हो रहे हैं.
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए स्वच्छ ऊर्जा ढाँचे का तेज़ी से विस्तार हो रहा है. लेकिन क्या यही ढाँचा भूमि की पुनर्बहाली में भी मदद कर सकता है?
इस सप्ताह मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में संयुक्त राष्ट्र के मरुस्थलीकरण सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर चर्चा की कि नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार करते हुए किस तरह भूमि की रक्षा और पुनर्बहाली भी की जा सकती है. इसके लिए दुनिया के कई हिस्सों से उदाहरण पेश किए गए.
दक्षिण अफ़्रीका में खनन से ख़राब हुई भूमि का इस्तेमाल नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए किया जा रहा है. चीन के रेगिस्तानी इलाक़ों में सौर पैनलों के साथ वनस्पति, जल-संग्रह और रेत को फैलने से रोकने के उपाय अपनाए जा रहे हैं. भारत में सौर सिंचाई से किसान एक ही ज़मीन पर खेती के साथ स्वच्छ ऊर्जा भी पैदा कर रहे हैं.
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने के लिए आने वाले वर्षों में सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं का बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा. फ़िलहाल इनके लिए क़रीब पाँच लाख हैक्टेयर भूमि इस्तेमाल हो रही है, जो 2032 तक बढ़कर 30 लाख हैक्टेयर हो सकती है.
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) में जैवविविधता और भूमि शाखा के प्रमुख जूलियन ब्लांक के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार “इतिहास में भूमि उपयोग के सबसे बड़े बदलावों में से एक” हो सकता है.
उन्होंने कहा, “अब सवाल यह नहीं है कि नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार होगा या नहीं. यह होना तय है. असली सवाल यह है कि क्या यह इस तरह होगा कि भूमि, पारिस्थितिकी तंत्र और लोगों को भी फ़ायदा पहुँचे.”
स्थानीय परिस्थितियाँ बेहद अहम
विशेषज्ञों के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की योजना इस तरह बनाई जानी चाहिए कि वे ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ भूमि की पुनर्बहाली में भी मदद कर सकें. इसमें सौर पैनलों के लिए इस्तेमाल होने वाली भूमि से लेकर बिजली पहुँचाने वाली पारेषण लाइनों तक, सभी पहलुओं पर विचार करना ज़रूरी है.
संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन की G20 वैश्विक भूमि पहल के निदेशक मुरली थुम्मारुकुडी ने कहा कि किसी परियोजना के निर्माण से पहले ही उस भूमि और उसकी स्थानीय परिस्थितियों को समझना ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, “अगर सौर ऊर्जा परियोजना सही जगह पर लगाई जाए, तो वह केवल ऊर्जा का ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक पुनर्बहाली का भी समाधान बन सकती है. लेकिन हर जगह ऐसा हो, यह ज़रूरी नहीं है.”
उनके अनुसार, स्थानीय परिस्थितियाँ बेहद अहम हैं, चाहे बात मंगोलिया के चरागाहों की हो या चीन के रेगिस्तानों की.
‘कोई भी परियोजना प्रभाव मुक्त नहीं’
सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए कई बार वनस्पति हटानी पड़ती है. इससे वन्यजीव प्रभावित हो सकते हैं, पानी के प्राकृतिक बहाव में बदलाव आ सकता है और कुछ जगहों पर बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी तरह बनाई गई परियोजनाएँ भी समस्या पैदा कर सकती हैं, अगर एक ही क्षेत्र में बहुत अधिक परियोजनाएँ विकसित हों. मलावी की शायर नदी घाटी में UNEP ने पाया कि कई जलविद्युत परियोजनाएँ मिलकर मत्स्य संसाधनों, जैवविविधता और निचले इलाक़ों में रहने वाले समुदायों पर दबाव बढ़ा सकती हैं.
UNEP के जूलियन ब्लांक ने कहा, “कोई भी परियोजना पूरी तरह प्रभाव से मुक्त नहीं होती.”
उनके अनुसार, पहले किसी जगह का चयन कर उसके पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करने के बजाय, पूरे क्षेत्र की जैवविविधता, जल संसाधनों,समुदायों, वन्यजीवों के प्रवास मार्गों और बाढ़ व सूखे के जोखिम को समझकर परियोजना की जगह तय की जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि योजना बनाते समय स्थानीय समुदायों और उनके ज्ञान को भी शामिल करना ज़रूरी है, क्योंकि वे सूखे, बाढ़ और अन्य जोखिमों को बेहतर समझ सकते हैं, जो तकनीकी आकलनों में छूट सकते हैं.
बिजली से आगे का फ़ायदा
अन्तरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) की कार्यक्रम अधिकारी गायत्री नायर ने कहा कि बेहतर योजना से नवीकरणीय ऊर्जा और भूमि के दूसरे उपयोगों के बीच टकराव से बचा जा सकता है.
उन्होंने भारत में छोटे किसानों के लिए चल रहे सौर सिंचाई कार्यक्रम का उदाहरण दिया, जहाँ सौर ऊर्जा खेती की ज़मीन कम करने के बजाय किसानों के लिए आमदनी का एक अतिरिक्त ज़रिया बन रही है.
शुरुआत में किसान खेतों में सौर पैनल लगाने को लेकर हिचक रहे थे. एक डिजिटल मंच की मदद से खेतों के उन हिस्सों की पहचान की गई, जो सौर ऊर्जा के लिए सबसे उपयुक्त थे.
इसके बाद स्थानीय बिजली कम्पनी ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था शुरू की. सौर बिजली से सिंचाई पम्प चलाए जाते हैं और बची हुई बिजली बेचकर किसान अतिरिक्त आमदनी भी कमा सकते हैं.
तकनीक का इस्तेमाल
चीन के रेगिस्तानों में सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ज़रिए तकनीक पहले से ही भूमि की पुनर्बहाली में मदद कर रही है.
त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हे जिजियांग ने हाल में अपनी क्षेत्रीय यात्राओं के आधार पर कहा, “प्राकृतिक रेगिस्तानी पर्यावरण की तुलना में, चीन के अधिकतर रेगिस्तानी सौर ऊर्जा क्षेत्रों की पारिस्थितिक स्थिति में लगातार सुधार हुआ है.”
तकलामाकन रेगिस्तान में सौर ऊर्जा से चलने वाले पम्प सिंचाई के लिए पानी पहुँचाते हैं, जिससे सड़कों के किनारे वनस्पति उगती है और रेत को फैलने से रोकने में मदद मिलती है.
टेंगर रेगिस्तान में सौर पैनल वाष्पीकरण एवं ज़मीन के पास हवा की गति कम करते हैं, जबकि झाड़ियाँ उड़ती रेत को थामती हैं. पैनलों से गिरने वाले पानी को पौधों तक पहुँचाया जाता है. आसपास की वनस्पति का इस्तेमाल पशु चारे के लिए भी होता है, जबकि कुछ पौधे रेत को स्थिर रखने और शहद उत्पादन में मदद करते हैं.
कोई एक तय मॉडल नहीं
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनाए जा रहे ये तरीक़े उत्साहजनक हैं, लेकिन हर जगह एक ही मॉडल काम करे, यह ज़रूरी नहीं है.
UNEP जल्द ही ऐसी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के उदाहरण जुटाएगा, जिनमें भूमि, जल, जैवविविधता और स्थानीय समुदायों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर काम किया गया है. इसका उद्देश्य देशों को ऐसे अनुभव और प्रमाण उपलब्ध कराना है, जो नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार में उनके काम आ सकें.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के शब्दों में, दुनिया को “जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता समाप्त” करने के साथ-साथ “प्रकृति की बड़े पैमाने पर रक्षा और पुनर्बहाली” भी करनी होगी.
साभार: यूएन समाचार