मीठे पानी के घटते भंडार: ‘नई जल वास्तविकता के लिए तैयार रहें देश’ – WMO

बर्फ से ढके पहाड़ों और आंशिक रूप से बादलों से घिरे आकाश के नीचे एक शांत झील के पार एक विशाल नीले रंग का ग्लेशियर फैला हुआ है, जिसके चारों ओर सदाबहार पेड़ हैं।

© WMO/Leonor Hernandez अर्जेंटीना के एल कैलाफ़ाते में पेरितो मोरेनो हिमनद.

जलवायु और पर्यावरण

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने संगठन की नवीनतम ‘वैश्विक जल संसाधनों की स्थिति’ रिपोर्ट पेश करते हुए कहा, “यह केवल एक ख़राब वर्ष की बात नहीं है, बल्कि एक ऐसा रुझान है जो पिछले एक दशक से लगातार दिखाई दे रहा है.”

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 दुनिया भर में नदियों के प्रवाह के लिहाज़ से पिछले 35 वर्षों के सबसे शुष्क वर्षों में से एक रहा. विश्व के 36 प्रतिशत नदी घाटी क्षेत्रों में जल प्रवाह सामान्य से कम दर्ज किया गया.

यह लगातार सातवाँ वर्ष था, जब सामान्य स्तर पर बहने वाली नदियाँ कम संख्या में रहीं. WMO के अनुसार, यह संकेत है कि दुनिया का जल चक्र अब पहले की तुलना में अधिक अनियमित और अप्रत्याशित होता जा रहा है.

सेलेस्टे साउलो ने कहा, “जल से जुड़ी चरम घटनाएँ, समुदायों और अर्थव्यवस्थाओं पर लगातार विनाशकारी असर डाल रही हैं.”

© UNICEF दक्षिण सूडान में बाढ़ से प्रभावित अपने घर के सामने, बच्चों को गोद में लिए खड़ी एक महिला.

जल का ‘बचत खाता’

भूजल, हिमनद, बर्फ़, मिट्टी की नमी, झीलें व ज़मीन पर जमा मीठे पानी के अन्य भंडार, सूखे और कम वर्षा के समय सहारा देते हैं. सेलेस्टे साउलो ने इन्हें पृथ्वी का “बचत खाता” बताया.

उन्होंने कहा कि आम तौर पर ये भंडार सूखे वर्षों का असर कम करने में मदद करते हैं, ताकि एक ही शुष्क मौसम तुरन्त जल संकट में न बदल जाए.

उन्होंने कहा, “हम इस बचत खाते को लगातार खाली कर रहे हैं.”

लगभग 2014-2016 के बाद से ज़मीन पर जमा पानी की मात्रा लगातार घट रही है, जबकि कई क्षेत्रों में भूजल स्तर भी वर्षों से नीचे जा रहा है.

2025 में निगरानी किए गए लगभग दो-तिहाई भूजल कुओं में जल स्तर सामान्य दायरे में नहीं था. साथ ही, सुधार के बजाय अधिक स्थानों पर पानी की कमी बढ़ती दिखाई दी.

हालाँकि, कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले. दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में कई वर्षों की गम्भीर कमी के बाद जल भंडार में कुछ सुधार हुआ, जबकि मध्य और दक्षिणी अफ़्रीका की कई बड़ी झीलों में जल स्तर सामान्य से काफ़ी अधिक रहा.

© Adobe Stock/Richard इंडोनेशिया के पापुआ में गुनुंग जया विजया का सिकुड़ता भूमध्यरेखीय हिमनद.

पिघलते हिमनद

दुनिया के सभी प्रमुख हिमनद क्षेत्रों में लगातार चौथे वर्ष बर्फ़ की मात्रा कम हुई है.

WMO में जल विज्ञान और हिममंडल के निदेशक वेन जेनकिन्सन ने कहा, “दुनिया के सभी 19 हिमनद क्षेत्रों में बर्फ़ की मात्रा कम हुई है. मध्य एशिया,आइसलैंड, रूसी आर्कटिक और पश्चिमी कैनेडा व अमेरिका में यह अब तक दर्ज तीन सबसे ख़राब वर्षों में से एक था.”

केवल 2025 में ही हिमनदों ने लगभग 408 गीगाटन बर्फ़ खोई, जबकि 2023 से 2025 के बीच कुल नुक़सान लगभग 1,400 गीगाटन रहा. यह दुनिया में एक वर्ष में निकाले जाने वाले मीठे पानी की लगभग एक-तिहाई मात्रा के बराबर है.

जेनकिन्सन ने आगाह किया कि मध्य योरोप, कॉकेशस और पश्चिमी कैनेडा व अमेरिका जैसे छोटे हिमनदों वाले कुछ क्षेत्र शायद पहले ही ‘पीक वॉटर’ की स्थिति में पहुँच चुके हैं, यानि वहाँ हिमनदों के पिघलने से मिलने वाला पानी अपने उच्चतम स्तर पर पहुँचने के बाद अब घटने लगा है.

उन्होंने कहा, “इसके बाद हिमनदों से हर वर्ष कम पानी मिलता है, क्योंकि पिघलने के लिए बर्फ़ की मात्रा घटती जाती है. इसका सीधा असर उन समुदायों पर पड़ता है, जो गर्म और शुष्क मौसम में हिमनदों के पानी पर निर्भर हैं.”

WMO में हिममंडल निगरानी, पूर्वानुमान व सेवाओं की प्रमुख नैरेल वैन डर वेल ने कहा कि हिमनदों का कुछ और नुक़सान अब टाला नहीं जा सकता, लेकिन आगे यह नुक़सान कितना बढ़ेगा, यह अभी तय नहीं है.

उन्होंने कहा, “हिमनदों का कुछ नुक़सान अपरिहार्य है, लेकिन क्या वे पूरी तरह ख़त्म हो जाएँगे, यह अभी निश्चित नहीं है.”

उन्होंने कहा कि आगे हिमनदों के नुक़सान को सीमित करने के लिए उत्सर्जन में कटौती बेहद ज़रूरी है.

बदलती आधार रेखा

रिपोर्ट में इन सभी बदलावों के लिए केवल जलवायु परिवर्तन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया है. WMO के अनुसार, जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव और प्राकृतिक उतार-चढ़ाव भी इसमें भूमिका निभा रहे हैं.

वेन जेनकिन्सन ने कहा कि पुराने रुझान अब पहले जितने भरोसेमन्द नहीं रहे, इसलिए सरकारों को बदलती ‘आधार रेखाओं’ यानि बदलती स्थितियों के अनुसार तैयारी करनी होगी.

उन्होंने कहा, “30 वर्ष पहले की स्थिति और आज की स्थिति एक जैसी नहीं है.” देशों को “उन बदलावों के लिए तैयार होना होगा, जो पहले ही सामने आ चुके हैं.”

पिछले पाँच वर्षों में जल से जुड़ी कम से कम आधी चरम घटनाएँ एशिया और अफ़्रीका में दर्ज की गईं. इन घटनाओं से हुई 80 प्रतिशत से अधिक मौतें भी इन्हीं क्षेत्रों में हुईं. इसके बावजूद, एशिया और अफ़्रीका में पानी की स्थिति पर नज़र रखने और उससे जुड़े आँकड़े जुटाने की व्यवस्था अब भी सबसे कमज़ोर है.

© UNICEF/Laxmi Prasad Ngakhusi विनाशकारी अचानक आई बाढ़ के बाद नेपाल के मध्य-उत्तरी नुवाकोट ज़िले में कीचड़ की मोटी परत छाई हुई है.

WMO ने पाँच वर्ष पहले यह रिपोर्ट प्रकाशित करना शुरू किया था. उस समय केवल सात देश, 14 नदी-प्रवाह केन्द्रों से आँकड़े उपलब्ध कराते थे. अब 52 देश, 3100 से अधिक केन्द्रों से जानकारी साझा कर रहे हैं.

फिर भी, WMO का कहना है कि बदलती जल परिस्थितियों के लिए तैयार रहने में बेहतर निगरानी, आँकड़ों का आदान-प्रदान और समय पर चेतावनी की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी.

हाल में चीन और नेपाल में चट्टान व हिमनद टूटने से जुड़ी आपदा को WMO ने “आपस में जुड़े विनाशकारी संकटों” का उदाहरण बताया. इस घटना ने दिखाया कि ऐसे ख़तरों का पहले से अनुमान लगाना कितना मुश्किल है.

सेलेस्टे साउलो ने कहा, “पानी सीमाओं को नहीं मानता. इसलिए साझा आँकड़े, साझा मानक और साझा पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ बेहद ज़रूरी हैं.”

साभार संयुक्त राष्ट्र समाचार

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