ओजोन परत पर नया शोध, नई जानकारी लेकिन खतरा टला नहीं..

     विकास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यही कारण है कि विश्व के ज्यादातर देश किसी न किसी रूप से विकास कर रहे हैं। जीवन स्तर सुधारने के लिए विकास की यह प्रक्रिया सुखद है लेकिन क्या इस विकास से सच्चे अर्थों में हमारा जीवन स्तर सुधर पाया है ? भौतिक रूप से देखें तो निश्चित रूप से हमारा जीवन स्तर सुधरा है लेकिन विकास की इस प्रक्रिया ने हमारे पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाई है। इसका असर न केवल प्रकृति के स्वास्थ्य बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। इस दृष्टि से देखें तो हमारा जीवन स्तर सुधरा नहीं है, अपितु खराब ही हुआ है। विकास की इस प्रक्रिया ने प्रकृति को कई जख्म दिए है। प्रकृति के इन जख्मों ने इंसान के स्वास्थ्य पर बहुत ज्यादा प्रभाव डाला है। विभिन्न तरह से हमारी रक्षा करने वाली ओजोन परत का क्षरण भी विकास की अंधाधुंध प्रक्रियाओं का ही नतीता है। समय-समय पर ओजान परत को लेकर कई अध्ययन प्रकाशित होते रहते हैं। दरअसल ओजोन परत पृथ्वी के वातावरण की एक महत्वपूर्ण है। यह परत हमें सूर्य की हानिकारण पराबैंगनी किरणों से बचाती है। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों को पता चला था कि यह परत तेजी से पतली हो रही है। मुख्य रूप से अंटार्कटिका के ऊपर एक ओजोन छेद बन रहा था। वैज्ञानिकों ने बताया था कि इसका मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसे रसायन हैं जो फ्रिज, एयरकंडीशनर और स्प्रे उत्पादों में इस्तेमाल किए जाते हैं। अब एक नए अध्ययन में बताया गया है कि ओजोन परत का क्षरण 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज से बहुत पहले ही शुरू हो चुका था। इस अध्ययन के अनुसार ओजोन क्षरण के शुरुआती संकेत 1957 में ही दिखाई देने लगे थे।

     मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने अपने नए अध्ययन में दावा किया है कि अगर आज जैसी उन्नत निगरानी तकनीकें पहले उपलब्ध होतीं तो वैज्ञानिक ओजोन क्षरण के संकेत 1957 में ही पकड़ सकते थे। इसका अर्थ यह है कि ओजोन छिद्र की खोज से लगभग तीन दशक पहले ही इस सुरक्षात्मक परत को नुकसान होेना शुरू हो चुका था। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया है कि ओजोन परत में शुरुआती गिरावट का पहला स्पष्ट संकेत अंटार्कटिका में नहीं बल्कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के ऊपरी समताप मंडल में दिखाई देता। अब तक मुख्य रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन को ही ओजोन परत के शुरुआती क्षरण के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है लेकिन इस अध्ययन में बताया गया है कि क्लोरोफ्लोरोकार्बन नहीं बल्कि कार्बन टेट्राक्लोराइड नाम का एक औद्यागिक रयासन ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार था। दरअसल लगातार हो रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों का सबसे बड़ा लाभ यही है कि नई-नई जानकारियां सामने आती रहती है। ऐसे अध्ययनों में कई बार पिछले अध्ययनों को नकार भी दिया जाता है। यही विज्ञान की सबसे बड़ी ताकत है। विज्ञान की इसी ताकत के बल पर नए आविष्कार होते हैं और नया शोध प्रमाण के साथ सामने आता है। ओजोन परत पर हुआ यह नया अध्ययन संकेत कर रहा है कि कई बार तकनीक के अभाव में ज्यादा सटीक जानकारी सामने नहीं आ पाती हैं और समय के अनुसार हुए अध्ययन के आधार पर ही हमें उस जानकारी को मानना पड़ता है। हो सकता है कि भविष्य में इस संबंध में कोई नया शोध सामने आ जाए। ओजोन परत पर हुए इस नए अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में बताया गया है कि कार्बन टेट्राक्लोराइड 1930 के दशक से ही ड्राईक्लीनिंग और मशीनों की सफाई में चिकनाई हटाने वाले सॉल्वेंट के रूप में इस्तेमाल हो रहा था। बर्फ की गहराइयों से निकाले गए आइस कोर नमूनों में भी इसके निशान मिले। इससे पता चलता है कि 1940 के दशक से ही वातावरण में इसकी मात्रा बढ़ने लगी थी। यही रसायन ओजोन परत का शुरुआती क्षरण कर रहा था। हालांकि अब कार्बन टेट्राक्लोराइड का इस्तेमाल दुनिया के कई हिस्सों में बंद किया जा चुका है। इस रसायन से पर्यावरण और स्वास्थ्य को काफी नुकसान हो रहा था।

     अब कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि ओजोन परत का क्षरण कम हुआ है। दरअसल इस दौर में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। विभिन्न देशों की सरकारें भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रही हैं। हालांकि पर्यावरण के मुद्दे पर अभी भी कई देशों का व्यवहार खोखले आदर्शवाद की परिधि में आता है। कई देश अपने स्वार्थों को देखते हुए इस मुद्दे पर दूसरे देशों को तो भाषण देते हैं लेकिन उनके अपने क्रियाकलाप ही पर्यावरण के प्रति ठीक नहीं होते हैं। इसके बावजूद यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस दौर में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है और इस दिशा में कुछ काम भी हो रहा है। यही कारण है कि आज ओजोन परत की स्थिति में सुधार हुआ है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत ओजोन परत की दशा सुधारने के लिए कई तरीके के उपाय किए गए। यह भी कटु सत्य है कि पर्यावरण के विभिन्न मुद्दों पर होने वाली वैश्विक संगोष्ठियों में कई बार अपेक्षित निर्णय नही लिए जाते। अनेक बार कई तरह के विरोधाभास भी उभर आते हैं लेकिन इन सब विसंगतियों के बावजूद जब बार-बार ऐसे मुद्दों पर चर्चा होती है तो कुछ सार्थक परिणाम भी सामने आते ही हैं। इन परिणामों का ही यह नतीजा है कि आज ओजोन परत की स्थिति में सुधार हुआ है। हालांकि इस सुधार के आधार पर यह मान लेना कि खतरा पूरी तरह टल गया है, उचित नहीं है। हमें इस दिशा में लगातार प्रयास करने होंगे। अगर इन प्रयासों में कहीं भी कमी हुई तो ओजोन परत के क्षरण का खतरा पुनः पैदा हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि ओजोन परत को संरक्षित करना जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *