घटिया कोयला: कम बिजली, अधिक राख

घटिया कोयला: कम बिजली, अधिक राख

पंकज चतुर्वेदी

आखिर भारतीय कोयला इतना घटिया क्यों है? इसका जवाब मुख्यतः प्रकृति और भूविज्ञान में छिपा है। भारत का अधिकांश कोयला, करीब 90 प्रतिशत, लगभग 25 करोड़ वर्ष पुरानी गोंडवाना चट्टानों से प्राप्त होता है। यह कोयला “ड्रिफ्ट-मूल” प्रकार का है, यानी वनस्पति अवशेष नदी-प्रवाह के साथ बहकर जमा हुए, जिसके साथ रेत, मिट्टी और अन्य खनिज कण भी मिश्रित हो गए। इसके विपरीत, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे देशों का अधिकांश कोयला “इन-सीटू” प्रकार का है, जो वहीं जमा हुआ जहां वनस्पति उगी थी, इसलिए उसमें राख स्वाभाविक रूप से कम होती है। इसके अलावा भारतीय कोयला भंडार अपेक्षाकृत उथली गहराई पर, पतली और अनियमित परतों में स्थित हैं, और खुली खदान खनन के दौरान इन परतों के साथ ऊपर-नीचे की मिट्टी और शेल की परतें भी अनिवार्य रूप से मिश्रित हो जाती हैं। देश में उत्खनित कुल कोयले का बड़ा हिस्सा बिना धुलाई के सीधे बिजली घरों को भेज दिया जाता है, क्योंकि वाशरी क्षमता मांग से काफी कम है, और इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु के कारण भंडारण के दौरान कोयले में नमी भी बढ़ जाती है, जिससे उसका प्रभावी कैलोरी मान और घट जाता है।

जब बॉयलर में अधिक राख और कम कैलोरी मान वाला कोयला डाला जाता है, तो दहन की दक्षता घट जाती है, और संयंत्र को समान मात्रा में बिजली बनाने के लिए कहीं अधिक कोयला जलाना पड़ता है — विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यह खपत सामान्य से 15 से 20 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है। बॉयलर ट्यूबों में राख की परत जमने से ऊष्मा स्थानांतरण बाधित होता है, उपकरणों पर घर्षण बढ़ता है, और प्लांट लोड फैक्टर यानी संयंत्र की वास्तविक उत्पादन क्षमता में गिरावट आती है।

घटिया कोयले का असर केवल बिजलीघरों तक सीमित नहीं रहता, यह सीधे आम उपभोक्ता की बिजली दर पर भी पड़ता है। प्रयास एनर्जी ग्रुप के एक अध्ययन के अनुसार “बिल किए गए” और वास्तव में “जलाए गए” कोयले के कैलोरी मान में अक्सर बड़ा अंतर पाया जाता है। महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के कुछ मामलों में यह अंतर 1,200 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम तक पाया गया, जिससे कच्चे कोयले की कीमत पर करीब 61 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ पड़ा, और एनटीपीसी के संयंत्रों में वित्त वर्ष 2018 से 2022 के विश्लेषण में भी लगातार करीब एक ग्रेड की गिरावट पाई गई, जिससे वित्त वर्ष 2022 में प्रति टन लगभग 69 रुपये यानी 8.34 प्रतिशत का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा। चूंकि ईंधन लागत सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है, इसलिए घटिया कोयले की पूरी आर्थिक कीमत अंततः बिजली उपभोक्ता ही चुकाता है। कोयले की गुणवत्ता मापने की प्रक्रिया को स्वचालित बनाकर तथा गणना का आधार बदलकर महाराष्ट्र के राज्य ताप बिजलीघरों की ऊर्जा लागत में लगभग 13 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत में लगभग 71 प्रतिशत बिजली आज भी कोयला आधारित ताप संयंत्रों से बनती है, और देश के करीब 180 ताप संयंत्रों की कुल क्षमता 212 गीगावाट है। अप्रैल 2023 से 2024 के बीच बिजली उत्पादन के लिए लगभग 29.18 लाख मिलियन टन कोयला जलाया गया, जिससे लगभग 11.67 लाख टन फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश उत्पन्न हुई, और इसमें से करीब 8.35 लाख मिलियन टन राख निचले इलाकों और राख तालाबों में डंप कर दी गई, जबकि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 1999 में ही राख के 100 प्रतिशत उपयोग का निर्देश जारी किया जा चुका था। मध्य प्रदेश के झाबुआ जैसे कई इलाकों में कोयले की राख सामग्री 30 से 40 प्रतिशत तक पाई गई है, जिससे बनने वाली विशाल मात्रा में राख आसपास के गांवों में स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। सूखी राख हवा में उड़कर सूक्ष्म कणों के रूप में फैलती है, जिससे सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं, और राख तालाबों से रिसकर पारा, आर्सेनिक, सीसा व कैडमियम जैसी भारी धातुएं भूजल और कृषि भूमि में मिल जाती हैं। कम कैलोरी मान के कारण प्रति यूनिट बिजली उत्पादन में अधिक कोयला जलाना पड़ता है, जिससे प्रति मेगावाट कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ जाता है — यानी घटिया कोयला जलवायु परिवर्तन को भी अप्रत्यक्ष रूप से तेज करता है।

भारतीय कोयले की घटिया गुणवत्ता कोई अस्थायी प्रबंधकीय खामी नहीं, बल्कि उसकी भूवैज्ञानिक उत्पत्ति, खनन पद्धति और सीमित धुलाई क्षमता से जुड़ी एक संरचनात्मक समस्या है। इसका समाधान कोयला धुलाई क्षमता बढ़ाने, राख के औद्योगिक पुनर्उपयोग यानी सीमेंट, ईंट और सड़क निर्माण में इसके अनिवार्य इस्तेमाल, तथा दीर्घकाल में स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज़ी से बढ़ने में निहित है। जब तक ये कदम गंभीरता से नहीं उठाए जाते, तब तक अधिक कोयला, कम बिजली और ज्यादा राख का यह दुष्चक्र देश के ऊर्जा और पर्यावरण दोनों क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाता रहेगा।

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