रोहित कौशिक
प्रकृति में जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का विशेष महत्व है। यह जैवविविधता ही प्रकृति की असली ताकत है। पौधों और जीवों के माध्यम से ही प्रकृति अपना संतुलन बनाने की कोशिश करती है। इस दौर में पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं पर कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। कुछ खतरे तो इंसान स्वयं ही पैदा कर रहा है और कुछ खतरे परिस्थिति के कारण उत्पन्न हो रहे हैं। इसका प्रभाव अंततः पर्यावरण पर ही पड़ रहा है। तेज भागती जिंदगी के सफर में इंसान के पास न तो समय है और न ही यह इच्छाशक्ति कि वह पर्यावरण के बारे में कुछ बेहतर सोच सके। जिनके पास समय है वे अपना समय सोशल मीडिया को देकर किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं। अपने मुहल्ले के किसी खाली पड़े हुए प्लॉट को देखिए। आपको वहां कूड़ा-करकट, घास, झाड़ियां और कुछ अनचाहे पेड़-पौधे दिखाई देंगे। हम ऐसे प्लॉट की साफ-सफाई के बारे में तो कुछ नहीं सोचते हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर उसे कूड़ाघर बना देते हैं। ऐसे जगहों पर कभी-कभी विदेशी पौधों की प्रजातियां भी काफी नुकसान करती हैं। खाली प्लॉट पर विदेशी प्रजातियों के उगने का मुख्य कारण प्राकृतिक संतुलन का अभाव और इन पौधों की आक्रामक अनुकूलन क्षमता है। प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल ‘साइंस’में प्रकाशित एक नए अध्ययन में बताया गया है कि विदेशी आक्रामक प्रजातियां भारत सहित अन्य विकासशील देशों में अनुमान से कहीं अधिक तबाही मचा रही हैं। एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों में इन प्रजातियों का कहर विकसित देशों की तुलना में लगभग 50 फीसद अधिक गंभीर हैै।
इस समस्या के कारण हमारे जंगलों से स्थानीय पेड़-पौधे गायब हो रहे हैं और पक्षियों के साथ-साथ दूसरे जीव बेघर हो रहे हैं। इस वजह से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज (आईपीबीईएस) ने भी अपनी रिपोर्ट ‘द असेसमेंट रिपोर्ट ऑन इनवेसिव एलियन स्पीशीज एंड देयर कंट्रोल’ में बताया है कि दुनिया भर में 60 फीसदी पौधों और जीवों के विलुप्त होने की वजह विदेशी आक्रामक प्रजातियां हैं। दरअसल इस तरह के अध्ययन हमें कई खतरों के बारे में सचेत करते हैं लेकिन हम इस तरह के अध्ययनों पर गंभीरता के साथ चर्चा नहीं करते हैं। यही कारण है कि ज्यादातर मामलों में इस तरह के अध्ययन किताबों में बंद होकर रह जाते हैं। इन अध्ययनों को तभी पढ़ा जाता है जब कोई शोधार्थी ऐसे मुद्दों पर शोध करता है। यही कारण है कि अक्सर नीतिगत मामलों में ऐसे अध्ययनों का इस्तेमाल बहुत कम किया जाता है और व्यावहारिक धरातल पर समस्या बढ़ती चली जाती है। गौरतलब है कि ये विदेशी आक्रामक प्रजातियां हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था को 42,300 करोड डॉलर से ज्यादा का नुकसान पहुंचा रही हैं। इनमें तालाबों को ढंक देने वाली जलकुम्भी से लेकर पक्षियों के अंडों को खाने वाले चूहों, लैंटाना, अफ्रीकी कैटफिश, केकड़ों, चिट्रिड फंगस, सीपों, कीकड़ जैसे पेड़-पौधों, एशियन हॉर्नेट, गिलहरी और सांप तक शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 37,000 से ज्यादा विदेशी प्रजातियां हैं, जिनमें से लगभग 3500 से ज्यादा आक्रामक प्रजातियां अपने मूल स्थानों से दूर भी स्थानीय जैवविविधता के लिए खतरा पैदा कर रही हैं। इसके साथ ही हर साल 200 नई विदेशी प्रजातियां दर्ज की जाती हैं।
यदि भारत के संदर्भ में देखें तो विलायती कीकर ने काफी नुकसान पहुंचाया है। विलायती कीकर को अंग्रेज 20वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली लाए थे। भारत में लैंटाना, जलकुंभी, कांग्रेस घास और अफ्रीकी कैटफिश ने भी जंगलांे, जलाशयों और कृषि भूमि में फैलकर पर्यावरण को काफी हानि पहुंचाई है। अपनी अच्छी अनुकूलन क्षमता के कारण ये प्रजातियां स्थानीय पौधों और जीवों के अस्तित्व को समाप्त कर देती हैं। दरअसल आक्रामक विदेशी प्रजातियां जैवविविधता के लिए बड़ा खतरा पैदा करती हैं। इनके कारण स्थानीय और वैश्विक प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। इसके साथ ही ये प्रजातियां इंसान के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर सकती हैं। ऐसी प्रजातियां जंगलों में लगने वाली आग को और ज्यादा भड़का सकती हैं। मच्छरों की आक्रामक प्रजातियों से उन देशों में भी डेंगू, मलेरिया, जीका और वेस्ट नाइल जैसे रोगों के संक्रमण का खतरा हो सकता है, जहां पहले कभी इनसे खतरा नहीं था। दरअसल वैश्विक व्यापार और बड़े पैमाने पर परिवहन प्रणालियों में वृद्धि के कारण पिछले कई वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी बढ़ी है। दूसरी तरफ इसी अवधि में आक्रामक प्रजातियों में काफी वृद्धि दर्ज की गई। आक्रामक प्रजातियां स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को बदल देती हैं। इसके साथ ही जल, जीव विज्ञान और मिट्टी की सुरक्षा को भी प्रभावित करती हैं। ऐसी प्रजातियां अपने मूल वातावरण से दूर बहुत तेजी से फैलती हैं और तेजी से अधिक क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। इस कारण नए क्षेत्र में बदलाव हो जाता है और देसी प्रजातियां बेदखल हो जाती हैं। सवाल यह है कि इन विदेशी प्रजातियों को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है ? क्या इन प्रजातियों को रोकने के लिए कोई गंभीर नीति बनाई गई है। ऐसी प्रजातियों को रोकने के लिए कुछ हद तक तो प्रयास हुए हैं लेकिन इन प्रयासों को बहुत सार्थक नहीं कहा जा सकता। दरअसल इनकी रोकथाम के लिए हर देश में मजबूत प्रबंधन तंत्र और प्रभावी निगरानी जरूरी है। कटु सत्य तो यह है कि सरकारी नीतियों में इन विदेशी प्रजातियों को रोकने के लिए कोई गंभीर विश्लेषण नहीं किया गया है। यही कारण है कि हमारे देश में उस तरह के सार्थक प्रयास नहीं हुए हैं, जिस तरह के प्रयास वास्तव में होने चाहिए थे। हमें यह समझना होगा कि यदि इस दिशा में गंभीरता के साथ प्रयास नहीं किए गए तो पर्यावरण के साथ-साथ इंसान के लिए भी कई तरह के खतरे उत्पन्न हो जाएंगे।