पंकज चतुर्वेदी
सहरसा जिले के सिरवार गाँव में कोसी ऐसी बिफरी कि जमीन का बाद हिस्सा अपने साथ ले गई । दर्जनों घर नदी में समा गए । भागलपुर जिले के मदरौनी , जेबी चौरहर आदि गाँव डूबे हुए हैं । सुपौल सहरसा, मधेपुरा , कटिहार, यदि जिले भी हर साल की तरह बाढ़ग्रस्त हैं । हिमालय पर्वत के उत्तुंग पर्वतों से निकलने वाली तीन धाराओं – सुन कोसी। अरुण कोसी और तमूर कोसी का जब मिलन उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में होता है तो यह “बिहार का शोक” बन जाती है । यह नाम नदी के स्वभाव और उससे होने वाली विनाशलीला का प्रत्यक्ष प्रमाण है। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र से निकलकर यह नदी भारी मात्रा में बालू, कंकड़ और गाद बहाते हुए बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। पिछले लगभग ढाई सौ वर्षों में इस नदी ने अपना मार्ग एक सौ बीस किलोमीटर तक बदल लिया है, जो दुनिया की किसी भी नदी के लिए असाधारण घटना मानी जाती है। इसकी वार्षिक बाढ़ लगभग इक्कीस हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को प्रभावित करती है, जिससे लाखों परिवारों की खेती-बाड़ी, घर और आजीविका तबाह हो जाती है। अकेले बिहार राज्य में ही पूरे देश के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का साढ़े सोलह प्रतिशत और बाढ़ से प्रभावित होने वाली आबादी का बाईस प्रतिशत हिस्सा समाया हुआ है। यह आँकड़ा इस बात की गवाही देता है कि बिहार भारत के सबसे अधिक बाढ़ग्रस्त राज्यों में गिना जाता है और इसमें कोसी की भूमिका सबसे बड़ी है।
पिछले एक दशक के सरकारी आँकड़े देखें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट होकर सामने आती है। दो हजार पंद्रह से दो हजार चौबीस के बीच बाढ़ के कारण करीब छह करोड़ छिहत्तर लाख लोग प्रभावित हुए। किसी एक वर्ष में सत्रह जिलों में आई बाढ़ ने पौने दो करोड़ के करीब लोगों को प्रभावित किया, साढ़े आठ लाख घर क्षतिग्रस्त हुए और लगभग आठ लाख एकड़ फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं में बाढ़ सबसे विनाशकारी घटक है और देश में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले कुल नुकसान में बाढ़ की हिस्सेदारी लगभग आधी है। यह केवल आर्थिक क्षति की बात नहीं है, बल्कि हर बाढ़ के साथ हजारों परिवार बेघर होते हैं, खेतों में जमा गाद वर्षों तक जमीन की उर्वरता छीन लेती है, बीमारियाँ फैलती हैं और बच्चों की पढ़ाई तथा स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है।
अब सवाल उठता है कि आखिर कोसी की धारा इतनी अनियमित और अप्रत्याशित क्यों हो गई है। इसका सबसे बड़ा कारण हिमालय पर्वत श्रृंखला में तेजी से हो रहा बदलाव है। वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि के कारण ऊँचाई पर स्थित हिमनद यानी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इस पिघलने की प्रक्रिया से पहाड़ों में नई-नई झीलें बन रही हैं और पुरानी झीलों का आकार भी असामान्य रूप से बढ़ रहा है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब साढ़े सात हजार ऐसी हिमनद झीलें मौजूद हैं, जिनमें से लगभग दो सौ झीलों को अत्यधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। उपग्रह चित्रों के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि बीते अड़तीस वर्षों में इन झीलों में से नवासी प्रतिशत का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका है। जब इन झीलों को रोकने वाला बर्फीला या मिट्टी-पत्थर का बांध अचानक टूटता है, तो नीचे की ओर भारी मात्रा में पानी और मलबा तेज गति से बहता है, जिसे हिमनद झील विस्फोट बाढ़ कहा जाता है। कुछ वर्ष पहले सिक्किम में हुई ऐसी ही एक घटना में पचपन से अधिक लोगों की जान चली गई थी और एक बड़ी जलविद्युत परियोजना भी क्षतिग्रस्त हो गई थी। कोसी नदी का जलग्रहण क्षेत्र भी इसी हिमालयी पेटी में फैला होने के कारण इस खतरे से अछूता नहीं है। ग्लेशियर पिघलने से जहाँ गर्मियों में अचानक जलस्तर बढ़ जाता है, वहीं मानसून के दौरान असामान्य और केंद्रित वर्षा से भी नदी की धारा में उतार-चढ़ाव तेज हो गया है। पहले जो वर्षा कई दिनों में फैलकर होती थी, अब वही पानी कुछ ही घंटों में बरस जाता है, जिससे नदी को संभलने का समय नहीं मिलता और वह अपने किनारे तोड़कर नया रास्ता खोज लेती है।
जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मानवीय हस्तक्षेप भी इस समस्या को और गहरा बना रहा है। हिमालय से बहकर आने वाली भारी मात्रा में गाद अब नदी की तली में लगातार जमा होती जा रही है, जिससे नदी का पेटा धीरे-धीरे ऊँचा उठता जा रहा है। कोसी पर शोध करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि गाद लाना और अपना रास्ता बदलना इस नदी का स्वाभाविक गुण है, और उत्तर बिहार का पूरा मैदान इसी गाद से बना है। सत्तर के दशक तक किसान इस गाद के फायदे को समझते थे, क्योंकि यह खेतों को उपजाऊ बनाती थी। लेकिन बाढ़ रोकने के लिए बनाए गए तटबंधों ने नदी को एक संकरे दायरे में बांध दिया, जिससे गाद प्राकृतिक रूप से फैलने के बजाय नदी के तल में ही जमा होती चली गई। परिणामस्वरूप नदी का पेटा आसपास की जमीन से भी ऊँचा हो गया है, और जब भी तटबंध कमजोर पड़ता या टूटता है, तो पानी सीधे बस्तियों में घुस जाता है और नदी नया मार्ग बना लेती है। यही कारण है कि दशकों से बनाए गए बाढ़ नियंत्रण के तमाम प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं।
इतने बड़े और जटिल संकट से निपटने के लिए किसी एक उपाय से काम नहीं चलेगा, बल्कि दीर्घकालिक और बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहली आवश्यकता है हिमालयी क्षेत्र की उन झीलों की निरंतर वैज्ञानिक निगरानी, जो खतरनाक श्रेणी में आती हैं। उपग्रह आधारित तकनीक और स्वचालित संवेदकों की मदद से इन झीलों के जलस्तर पर नजर रखी जा सकती है और खतरा बढ़ने पर नीचे बसे गाँवों को समय रहते सूचना दी जा सकती है। नेपाल और भारत दोनों देशों के बीच नदी के जलस्तर और मौसम संबंधी वास्तविक समय की जानकारी साझा करने की व्यवस्था को और मजबूत बनाना जरूरी है, क्योंकि कोसी का जलग्रहण क्षेत्र दोनों देशों में फैला है और अकेले किसी एक देश के प्रयास से समाधान संभव नहीं है। दूसरा महत्वपूर्ण कदम है तटबंधों के रखरखाव और डिजाइन में सुधार। पुराने और कमजोर तटबंधों की नियमित मरम्मत तथा उन्हें आधुनिक इंजीनियरिंग मानकों के अनुसार मजबूत बनाना आवश्यक है, साथ ही कुछ स्थानों पर तटबंधों के बीच की दूरी बढ़ाकर नदी को अधिक प्राकृतिक स्थान देने पर भी विचार होना चाहिए, ताकि गाद स्वाभाविक रूप से फैल सके और नदी का तल लगातार ऊँचा न उठे।
गाद प्रबंधन इस पूरी समस्या का एक बड़ा और उपेक्षित पहलू है। नियमित रूप से नदी की तली से गाद निकालने, उसे खेती और निर्माण कार्यों में उपयोग करने की योजनाबद्ध व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके साथ ही हिमालयी पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कटाई रोककर और बड़े पैमाने पर पौधरोपण करके मिट्टी के कटाव को कम किया जा सकता है, जिससे गाद की मात्रा में भी कमी आएगी। जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक असर से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन घटाने के वैश्विक प्रयासों में भारत जैसे देशों की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना सीधे तौर पर वैश्विक तापमान वृद्धि से जुड़ा हुआ है। स्थानीय स्तर पर बाढ़ प्रभावित गाँवों में पूर्व चेतावनी प्रणाली, ऊँचे और सुरक्षित शरण स्थलों का निर्माण, बाढ़ के अनुकूल फसलों और खेती के तरीकों को अपनाना, तथा नाव व अन्य आपातकालीन संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन समितियों को प्रशिक्षित करके स्थानीय लोगों को ही आपदा के समय पहली प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाया जा सकता है।
यह समझना जरूरी है कि कोसी को पूरी तरह वश में करना शायद संभव न हो, क्योंकि गाद लाना और मार्ग बदलना उसका मूल स्वभाव है। इसलिए नीति निर्माताओं को नदी से लड़ने के बजाय उसके साथ सामंजस्य बिठाने की दिशा में सोचना होगा। वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को जोड़कर ही बिहार के इस शोक को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। यदि समय रहते ठोस और समन्वित कदम नहीं उठाए गए, तो बदलते जलवायु के इस दौर में कोसी की मार और भी विकराल रूप ले सकती है, और इसका सबसे बड़ा खामियाजा वही लाखों गरीब और कमजोर परिवार भुगतेंगे, जो सदियों से इस नदी के किनारे अपना जीवन बसर करते आए हैं।