पंकज चतुर्वेदी
पनीर भारतीय रसोई की उस साख का नाम है, जिस पर करोड़ों घरों का भरोसा टिका है। शाकाहारी परिवारों में जब मांस-मछली से परहेज होता है, तब प्रोटीन की सबसे बड़ी उम्मीद पनीर से ही बंधती है। यही भरोसा अब खतरे में है। बाजार में तेजी से फैल रहा एनालॉग पनीर देखने और स्वाद में असली पनीर जैसा ही लगता है, मगर उसकी बुनियाद दूध नहीं, बल्कि वनस्पति तेल, स्टार्च, सोया या मटर के प्रोटीन और चिपकाने वाले रसायन हैं। समस्या यह नहीं कि यह उत्पाद बना क्यों है, समस्या यह है कि यह किस चालाकी से असली दूध के पनीर के भाव पर, बिना बताए, ग्राहक की थाली तक पहुंच रहा है।
इस समस्या की जड़ में एक अजीब विरोधाभास है। केंद्र की खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने इसे कभी अवैध नहीं ठहराया। उसका कहना है कि पैकेट पर साफ लिखा हो कि यह दूध से नहीं बना, तो इसे बनाने और बेचने में कोई बुराई नहीं। यह तर्क सुनने में उचित लगता है, पर व्यवहार में यह पूरी तरह विफल साबित हुआ है। होटल, ढाबे और छोटी दुकानें इस लेबलिंग के नियम को लगभग नजरअंदाज करती हैं। खुले बाजार में बिकने वाला पनीर तो और भी बड़ी चुनौती है, जहां न पैकेट होता है, न लेबल, और ग्राहक के पास यह जानने का कोई जरिया नहीं होता कि जो वह खरीद रहा है, वह असली है या नकली। जब नियम का पालन कराने की कोई ठोस व्यवस्था ही नहीं है, तो सिर्फ सूचना अंकन की शर्त रखकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेना अपने आप में एक तरह की लापरवाही है।
इसी लापरवाही का खामियाजा आम उपभोक्ता भुगत रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे चुके हैं कि इस तरह के उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली औद्योगिक चर्बी दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाती है और शरीर को इससे कोई पोषण नहीं मिलता। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी मानता रहा है कि ऐसी चर्बी का कोई ज्ञात लाभ नहीं होता। नियमित सेवन से पेट में संक्रमण, अम्लता की शिकायत, यकृत पर बुरा असर और रक्त में खराब वसा बढ़ने जैसी दिक्कतें सामने आती हैं। इसमें प्रोटीन और कैल्शियम असली दूध की तुलना में बहुत कम होता है, जबकि सोडियम और शोधित स्टार्च की मात्रा ज्यादा। नतीजा यह कि ग्राहक कीमत तो असली पनीर जितनी चुकाता है, मगर पोषण के नाम पर उसे कुछ खास नहीं मिलता। सबसे चिंता की बात यह है कि यही मिलावटी पनीर स्कूलों के आसपास ठेलों पर, शादी-समारोहों के भोज में और आम रेस्तराओं में बेधड़क परोसा जा रहा है, जहां बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं।
राज्यों की प्रतिक्रिया देखें तो तस्वीर और उलझी हुई नजर आती है। महाराष्ट्र और गुजरात ने पहले कदम बढ़ाए, फिर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने भी इसके निर्माण और बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी। इन राज्यों की सरकारों का तर्क साफ है कि जब तक उत्पादन पर ही अंकुश नहीं लगेगा, तब तक अकेले लेबलिंग के भरोसे बेईमान कारोबारियों को रोकना संभव नहीं। दूसरी ओर राजस्थान जैसा राज्य, जो देश के कुल दूध उत्पादन में लगभग पंद्रह प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, अब भी पुरानी नीति पर टिका हुआ है, जहां एनालॉग उत्पादों पर कोई अलग पाबंदी नहीं है और केवल सामान्य मिलावट जांच के भरोसे काम चलाया जा रहा है। एक ही देश में एक जैसे उत्पाद पर इतने अलग-अलग नियम होना अपने आप में इस बात का सबूत है कि केंद्र सरकार की नीति में स्पष्टता की भारी कमी है। जब सर्वोच्च न्यायालय तक को इस मसले पर हस्तक्षेप करना पड़े और केंद्र से जवाब मांगना पड़े, तो यह मान लेना चाहिए कि मामला अब सिर्फ बाजार अनुशासन का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती का बन चुका है।
अब सवाल यह है कि आगे रास्ता क्या हो। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि पूरी तरह रोक लगाना सही समाधान नहीं, क्योंकि इससे यह कारोबार भूमिगत हो जाएगा और निगरानी और कठिन हो जाएगी। यह आशंका पूरी तरह गलत भी नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हालात को यूं ही खुला छोड़ दिया जाए। समाधान बीच का रास्ता अपनाने में है, मगर वह बीच का रास्ता कड़ा और स्पष्ट होना चाहिए। सबसे पहले, केंद्र सरकार को पूरे देश के लिए एक समान नीति बनानी होगी, ताकि एक राज्य से दूसरे राज्य में उत्पाद खिसकाकर कानून की अनदेखी करने की गुंजाइश खत्म हो। दूसरा, ऐसे किसी भी उत्पाद की खुले बाजार में, बिना पैकेजिंग और बिना लेबल के, बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए, क्योंकि यही रास्ता धोखाधड़ी का सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है। तीसरा, होटल, ढाबों और मिठाई की दुकानों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे कच्चे माल का बिल और स्रोत सार्वजनिक रूप से दिखाएं, और इसका उल्लंघन करने पर लाइसेंस रद्द करने जैसी सख्त कार्रवाई हो। चौथा, जांच एजेंसियों को नियमित और आकस्मिक छापों के लिए पर्याप्त संसाधन और अधिकार दिए जाएं, क्योंकि अभी ज्यादातर कार्रवाई शिकायत मिलने या मीडिया में मामला उछलने के बाद ही होती दिखती है।
असल समाधान सिर्फ प्रतिबंध की घोषणा में नहीं, बल्कि उसे ईमानदारी से लागू करने में है। जिन राज्यों ने रोक लगाई है, वहां भी यह देखना जरूरी है कि यह कानून कागजों तक सीमित न रह जाए। साथ ही असली दूध उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति भी जरूरी है, ताकि किसानों को उचित दाम मिले और बाजार में सस्ते नकली विकल्प की मांग अपने आप कम हो। जब तक उपभोक्ता को यह भरोसा नहीं मिलता कि वह जो खा रहा है, वह वही है जो उसे बताया गया है, तब तक पारदर्शिता की बातें खोखली ही साबित होंगी। सेहत के साथ किया गया यह खिलवाड़ अब और बर्दाश्त करने लायक नहीं रह गया है, और इस पर फैसला लेने का समय आ गया है।