मरुस्थलीकरण से जल–आत्मनिर्भरता तक की दूरदर्शी दिशा
अजय सहाय
भारत एक विशाल भूगोल वाला देश है जिसकी नदियाँ, जलवायु और पारिस्थितिकी अत्यंत विविधतापूर्ण हैं; पूर्वोत्तर भारत में प्रतिवर्ष औसतन 2000–3000 मिमी वर्षा होती है जबकि पश्चिमी भारत के मरुस्थलीय क्षेत्र जैसे राजस्थान का थार डेज़र्ट केवल 100–300 मिमी वार्षिक वर्षा पर निर्भर है, परिणामस्वरूप यहाँ पर मरुस्थलीकरण और जल–अभाव लगातार बढ़ते जा रहे हैं, दूसरी ओर गंगा–ब्रह्मपुत्र बेसिन, असम और पूर्वी राज्यों में बाढ़ का संकट हर वर्ष लाखों हेक्टेयर भूमि को डुबो देता है, यह असमानता बताती है कि भारत में पानी की कमी नहीं बल्कि उसके वितरण और प्रबंधन की समस्या है ।
आँकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा जल गिरता है, किंतु इसमें से केवल 1123 BCM ही उपयोग में आता है जबकि शेष 3000 BCM से अधिक जल व्यर्थ चला जाता है, कभी समुद्र में गिरकर तो कभी बाढ़ के रूप में नष्ट होकर; ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ा समाधान है राष्ट्रीय जल ग्रिड (National Water Grid) का निर्माण, जिसके द्वारा अतिरिक्त जल वाले क्षेत्रों से पानी को पाइपलाइन और नहरों द्वारा जल–अभाव वाले क्षेत्रों तक पहुँचाया जा सके ।
यह कोई असंभव कल्पना नहीं है क्योंकि चीन ने South–North Water Diversion Project और Western Water Diversion Project बनाकर यही कार्य किया है, जिससे उसके लगभग 30 प्रतिशत रेगिस्तानी क्षेत्र में पानी पहुँचाकर हरियाली और कृषि संभव हो गई है, वहीं इज़राइल ने भी National Water Carrier बनाकर नेगेव रेगिस्तान तक पानी पहुँचाया है ।
चीन के South–North Project की क्षमता लगभग 44.8 बिलियन क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष जल स्थानांतरित करने की है और इसकी लागत लगभग 62 बिलियन अमेरिकी डॉलर आई, किंतु इस परियोजना ने बीजिंग, टियांजिन और गोबी डेज़र्ट जैसे क्षेत्रों को स्थायी जल आपूर्ति दी, नतीजतन गोबी जैसे बंजर इलाके में अब लाखों हेक्टेयर भूमि पर कृषि हो रही है ।
भारत में भी इसी तरह की सोच इंदिरा गांधी नहर परियोजना (1958) में दिखाई दी थी, जिसने सतलज और ब्यास नदियों का पानी राजस्थान के थार मरुस्थल में पहुँचाया और 16,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को हरा–भरा बना दिया, परंतु यह सीमित क्षेत्र तक ही सिमट गया ।
यदि भारत एक संपूर्ण राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाता है तो गंगा–ब्रह्मपुत्र बेसिन से अतिरिक्त जल को राजस्थान, गुजरात और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में पहुँचाकर मरुस्थलीकरण को रोका जा सकता है और जल–आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ा जा सकता है ।
इस दृष्टि से भारत को न केवल जल स्थानांतरण पर ध्यान देना होगा बल्कि तकनीक पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा, क्योंकि आज भी भारत के लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र हैंडपंप और पारंपरिक कुओं से जल खींचते हैं, लेकिन राजस्थान और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में भूजल 400–500 फीट नीचे जा चुका है, जिसे हैंडपंप से निकालना लगभग असंभव है, वहीं डीज़ल पंप महँगे और प्रदूषणकारी हैं ।
ऐसे में समाधान है सौर ऊर्जा आधारित उन्नत तकनीक का प्रयोग, जैसे सोलर वाटर पंप जिनसे मुफ्त और स्वच्छ ऊर्जा द्वारा भूजल को ऊपर खींचा जा सके और गाँव–गाँव पानी उपलब्ध कराया जा सके; राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में यह प्रयोग सफल हुआ है, जहाँ कुसुम योजना (KUSUM Yojana) के तहत किसानों को सोलर पंप दिए गए, जिनसे सिंचाई भी हुई और अतिरिक्त बिजली बेचकर किसान की आय भी बढ़ी, यह मॉडल पूरे मरुस्थलीय क्षेत्र में फैलाया जा सकता है ।
राष्ट्रीय जल ग्रिड की परिकल्पना को सौर ऊर्जा के साथ जोड़ा जाए तो यह एक डुअल सॉल्यूशन होगा — एक तरफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित होगी और दूसरी तरफ पाइपलाइन–कैनाल पर लगाए गए सोलर पैनलों से बिजली उत्पादन कर लागत कम की जा सकेगी ।
नीति आयोग और केंद्रीय जल आयोग के अनुसार यदि भारत अपने व्यर्थ हो रहे 3000 BCM पानी का केवल 20 प्रतिशत भी उपयोग कर ले और उसे राष्ट्रीय जल ग्रिड के माध्यम से रेगिस्तानी इलाकों तक पहुँचा दे तो थार डेज़र्ट, कच्छ और बुंदेलखंड के लाखों हेक्टेयर भूमि को हरा–भरा बनाया जा सकता है, इससे न केवल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ेगा बल्कि भूजल रिचार्ज होगा, जलवायु परिवर्तन से होने वाले मरुस्थलीकरण की गति घटेगी और प्रवासियों को रोजगार मिलेगा ।
इससे जल आत्मनिर्भर भारत 2047 का लक्ष्य भी साकार होगा क्योंकि पानी केवल कृषि या पीने का साधन नहीं बल्कि ऊर्जा, उद्योग और पर्यावरण सुरक्षा का आधार है; इस दृष्टि से राष्ट्रीय जल ग्रिड भारत के लिए केवल जल परियोजना नहीं बल्कि 21वीं सदी का हरित–क्रांति मॉडल बन सकता है ।
किंतु समस्या यह है कि भारत में अभी तक इतनी दूरदर्शी दृष्टि नहीं अपनाई गई, सरकारें अधिकतर स्थानीय जल योजनाओं, हैंडपंप, ट्यूबवेल या सीमित नहर परियोजनाओं पर ध्यान देती रही हैं, जबकि चीन और इज़राइल ने इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया, इसलिए अब भारत को भी साहसिक कदम उठाने की आवश्यकता है, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर राष्ट्रीय जल ग्रिड की योजना को धरातल पर उतारें, नदी जोड़ो परियोजना को व्यापक स्तर पर लागू करें, रेगिस्तानी इलाकों में पाइपलाइन नेटवर्क बिछाएँ और सोलर ऊर्जा से चलने वाले पंपिंग स्टेशन बनाएँ, साथ ही नदी पंचायतें और जल उपयोगकर्ता समूह बनाकर जनभागीदारी को भी जोड़ें ।
यदि ऐसा होता है तो भारत के रेगिस्तानी क्षेत्र न केवल हरियाली में बदलेंगे बल्कि कृषि उत्पादन, रोजगार और पर्यावरण संतुलन के क्षेत्र में भी वैश्विक उदाहरण बनेंगे और यदि यह दृष्टि नहीं अपनाई गई तो 2047 तक भारत का लगभग 25 प्रतिशत भूभाग मरुस्थलीकरण का शिकार हो सकता है जैसा कि संयुक्त राष्ट्र CCD रिपोर्ट और NITI आयोग ने चेतावनी दी है ।
इसलिए निष्कर्ष यह है कि भारत को राष्ट्रीय जल ग्रिड बनाना चाहिए और हैंडपंप पर निर्भर रहने के बजाय सौर ऊर्जा आधारित उन्नत तकनीक को अपनाना चाहिए, तभी देश का हर गाँव, हर खेत और हर परिवार जल आत्मनिर्भर बन सकेगा और मरुस्थलीय क्षेत्र भी जीवन और हरियाली का प्रतीक बन जाएंगे।