25 वर्षों की न्यायिक, नीतिगत और पर्यावरणीय यात्रा
अजय सहाय
गंगा और यमुना नदियाँ भारतीय संस्कृति, सभ्यता, आस्था, कृषि और जीवनरेखा की प्रतीक मानी जाती हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से बढ़ते प्रदूषण, अवैध खनन, अतिक्रमण और वनों की कटाई ने इन नदियों की स्थिति को संकटग्रस्त बना दिया है, और इसी पृष्ठभूमि में 20 मार्च 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ (न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और आलोक सिंह) ने Mohd. Salim v. State of Uttarakhand & Others मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें गंगा और यमुना को “Living Entity” अर्थात जीवित इकाई और कानूनी व्यक्ति (Juridical Person) का दर्ज़ा दिया गया ।
याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीम ने अपनी जनहित याचिका में कहा था कि प्रशासन नदियों के किनारे हो रहे अवैध निर्माण और प्रदूषण को रोकने में विफल रहा है और इस कारण नदियों का प्राकृतिक स्वरूप और प्रवाह संकट में है, अदालत ने माना कि गंगा और यमुना केवल जलधाराएँ नहीं हैं बल्कि भारत की सांस्कृतिक और पारिस्थितिक धड़कन हैं जिन्हें मनुष्य के समान अधिकार दिए जाने चाहिए ताकि इनके प्रदूषण या शोषण पर वैसी ही कानूनी कार्रवाई हो सके जैसी किसी व्यक्ति के खिलाफ होती है ।
अदालत ने यह भी कहा कि गंगा और यमुना को “जीवित इकाई” घोषित कर उन्हें मौलिक अधिकार दिए जाएंगे और इसके लिए तीन अधिकारियों—उत्तराखंड के मुख्य सचिव, राज्य के एडवोकेट जनरल और जल संसाधन विभाग के निदेशक—को नदियों का “Loco Parentis” यानी माता-पिता के स्थान पर संरक्षक नियुक्त किया गया ताकि वे इन नदियों के अधिकारों की रक्षा कर सकें ।
इस फैसले का महत्व समझने के लिए 1992 से 2017 तक के 25 वर्षों का चरणबद्ध विकास देखना आवश्यक है—1993 में गंगा एक्शन प्लान चरण-II (GAP-II) शुरू किया गया जिसमें गंगा की सहायक नदियों को भी सफाई अभियान में शामिल किया गया, 1997 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने पहली बार हरिद्वार, कानपुर, वाराणसी, पटना और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों के गंगा जल का BOD और DO डेटा जारी किया जिसमें यह पाया गया कि अधिकांश स्थानों पर BOD का स्तर 3–8 mg/L तक पहुँच गया है जबकि पीने योग्य जल के लिए यह 2 mg/L से कम होना चाहिए, DO का स्तर कई जगह 4 mg/L से नीचे गिरा जिससे जलीय जीवों पर संकट मंडरा गया ।
2000 से 2005 तक सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्टों में गंगा प्रदूषण पर कई जनहित याचिकाएँ दाखिल हुईं जिनमें प्रशासन को फटकार लगाई गई, फिर 5 नवम्बर 2008 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने National Ganga River Basin Authority (NGRBA) का गठन किया ।
गंगा की लगातार बिगड़ती स्थिति (BOD/DO स्तर गिरना, औद्योगिक प्रदूषण, अवैध खनन, गंदे नालों का मिलना) को देखते हुए इसे राष्ट्रीय महत्व की नदी मानकर इसके संरक्षण के लिए अलग दर्ज़ा देना ज़रूरी था, और इसी क्रम में गंगा को “राष्ट्रीय नदी” घोषित किया गया, जिसने गंगा संरक्षण को नीति-निर्माण के उच्चतम स्तर पर स्थापित किया; इसके बाद 2009 में गंगा को “National River” का दर्ज़ा मिला, जिससे यह राष्ट्रीय प्रतीक बन गई।
इस बीच ICMR की रिपोर्टें चेतावनी दे रही थीं कि गंगा किनारे बसे लाखों लोग दूषित जल पीने से हैजा, डायरिया और कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, CPCB की 2009 की रिपोर्ट ने दिखाया कि कानपुर और वाराणसी में गंगा का पानी स्नान योग्य भी नहीं रहा; 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंगा और यमुना के प्रदूषण पर केंद्र व राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि जब तक औद्योगिक इकाइयों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी तब तक गंगा-यमुना को बचाना असंभव है ।
2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया जब अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने हजारों लोगों की जान ले ली और इस आपदा के पीछे अवैज्ञानिक निर्माण, वनों की कटाई और नदी किनारे अतिक्रमण को जिम्मेदार ठहराया गया ।
2014 में नरेंद्र मोदी सरकार ने “Namami Gange Mission” की शुरुआत की जिसे दुनिया का सबसे बड़ा नदी शुद्धिकरण मिशन कहा गया, इसके अंतर्गत गंगा किनारे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, घाट विकास, वनीकरण और जनजागरूकता कार्यक्रमों पर काम शुरू हुआ, लेकिन 2015 में नीति आयोग (NITI Aayog) ने रिपोर्ट जारी की कि गंगा बेसिन के 40% हिस्से में पानी की गुणवत्ता Class “C” यानी केवल स्नान योग्य स्तर से भी खराब हो चुकी है ।
वहीं 2016 में CPCB की मॉनिटरिंग रिपोर्ट में यह पाया गया कि कई हिस्सों में BOD 3 mg/L से ऊपर और DO 4 mg/L से नीचे जा चुका है जिससे गंगा का पानी न पीने योग्य रह गया; इन सबके बीच गंगा संरक्षण के लिए सामाजिक आंदोलनों ने भी गति पकड़ी, स्वामी निगमानंद ने गंगा बचाने के लिए अनशन किया और शहीद हो गए, वहीं प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) ने भी गंगा संरक्षण के लिए अनशन किया और सरकार पर दबाव बनाया।
इस लंबी पृष्ठभूमि के बाद 20 मार्च 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने Mohd. Salim v. State of Uttarakhand & Others मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि गंगा और यमुना को जीवित इकाई घोषित किया जाए, अदालत ने अपने आदेश में अंतरराष्ट्रीय उदाहरण का भी उल्लेख किया विशेषकर न्यूज़ीलैंड की “Whanganui River” जिसे 2017 में Te Awa Tupua Act के अंतर्गत Living Entity का दर्ज़ा दिया गया था, अदालत ने कहा कि भारत जैसे देश में जहाँ गंगा और यमुना करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं, वहाँ इन्हें जीवित इकाई का दर्ज़ा देना और भी आवश्यक है ।
इस फैसले का महत्व यह था कि अब यदि कोई व्यक्ति या उद्योग गंगा-यमुना को प्रदूषित करेगा तो यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा और कानूनी कार्रवाई सीधे नदियों की ओर से हो सकेगी, यानी इन नदियों को भी इंसान की तरह अधिकार प्राप्त होंगे; हालाँकि जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी और कहा कि इससे प्रशासनिक जटिलताएँ पैदा होंगी, उदाहरण के लिए यदि बाढ़ से नुकसान हो तो क्या नदी के खिलाफ मुकदमा दायर किया जाएगा या सरकार के खिलाफ, लेकिन इसके बावजूद यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ क्योंकि इसने पहली बार नदियों को जीवित अस्तित्व मानकर उनके अधिकारों को स्वीकारा ।
इस पूरी 25 साल की यात्रा में गंगा संरक्षण के प्रयासों का चरणबद्ध स्वरूप दिखता है—1993 में GAP-II, 1997 में CPCB डेटा, 2008 में NGRBA का गठन और गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्ज़ा, 2009 में National River की औपचारिक घोषणा, 2010 में इलाहाबाद HC की फटकार, 2013 में केदारनाथ आपदा, 2014 में Namami Gange की शुरुआत, 2015 में NITI Aayog की चेतावनी, 2016 में CPCB की रिपोर्ट और अंततः 2017 में उत्तराखंड हाईकोर्ट का Living Entity फैसला ।
इन सब घटनाओं ने यह साबित किया कि केवल योजनाएँ और मिशन पर्याप्त नहीं बल्कि कानूनी और न्यायिक संरक्षण भी आवश्यक है; इस निर्णय ने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) को नया आयाम दिया ।
गंगा और यमुना को “Living Entity” घोषित करने का अर्थ केवल कानूनी अधिकार देना नहीं बल्कि यह स्वीकार करना है कि ये नदियाँ जीवित हैं, हमारे समाज और संस्कृति की आत्मा हैं, और यदि इनकी रक्षा नहीं की गई तो न केवल पारिस्थितिकी तंत्र बल्कि करोड़ों लोगों का भविष्य भी संकट में पड़ जाएगा।