रात से दिन तक बढ़ती घटनाएँ और जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक सच
अजय सहाय
हिमालयी क्षेत्रों में क्लाउडबर्स्ट (मेघफटन) को प्राचीन काल से एक सामान्य लेकिन विनाशकारी मौसमीय घटना के रूप में देखा जाता रहा है, परंतु पिछले दो दशकों में इसकी प्रकृति, समय और आवृत्ति में भारी परिवर्तन दर्ज किया गया है, जिसका वैज्ञानिक कारण जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से जुड़ा है। परंपरागत रूप से, क्लाउडबर्स्ट की घटनाएँ सामान्यतः रात 8 बजे से सुबह 5 बजे के बीच दर्ज की जाती थीं, जब वायुमंडलीय आर्द्रता (Atmospheric Moisture) तेजी से बढ़ती है और तापमान में अचानक 7 डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट आ जाती है।
इस समय ठंडी हवाएँ जब ग्लेशियर और पर्वतीय दर्रों के पास पहुँचती हैं तो वायुमंडलीय अस्थिरता (Atmospheric Instability) बढ़ जाती है और नमी से लदे बादल ऊर्ध्वगामी वायु प्रवाह (Orographic Lift) के कारण फट पड़ते हैं। यही कारण था कि 20वीं सदी तक अधिकांश क्लाउडबर्स्ट घटनाएँ रात में दर्ज की जाती थीं।
परंतु अब, IPCC की AR6 रिपोर्ट (2021), भारतीय मौसम विभाग (IMD), और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, देहरादून की रिपोर्टें बताती हैं कि 2000 के बाद से हिमालयी राज्यों—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर—में दिन के समय भी क्लाउडबर्स्ट की घटनाएँ असामान्य रूप से बढ़ रही हैं। इसका वैज्ञानिक कारण है ग्लोबल वार्मिंग और बदलता हुआ जलवायु चक्र।
NASA और IMD के संयुक्त उपग्रह डेटा के अनुसार पिछले 40 वर्षों में हिमालयी क्षेत्र का औसत तापमान 1.5–2.0°C तक बढ़ चुका है, जिससे दिन के समय भी सतही वायुमंडल अधिक नमी धारण करने लगा है। एक वैज्ञानिक तथ्य यह है कि वातावरण का हर 1°C बढ़ा तापमान अतिरिक्त 7% अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है (Clausius-Clapeyron relation), और यही अतिरिक्त नमी दिन के समय क्लाउडबर्स्ट की घटनाओं को जन्म देती है।
सालवार घटनाओं के दृष्टिकोण से देखें तो 2010 में लद्दाख के लेह में 6 अगस्त की रात क्लाउडबर्स्ट से 200 से अधिक लोगों की मौत और शहर का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया। 2012 में उत्तरकाशी जिले में 3–4 अगस्त को ~120 मिमी वर्षा 1–2 घंटे में हुई, जिससे 35 लोगों की मौत और गाँव बह गए।
2013 में केदारनाथ त्रासदी का बड़ा कारण भी क्लाउडबर्स्ट रहा जब 16–17 जून को दोपहर-शाम में भारी वर्षा ने मंदाकिनी घाटी में तबाही मचाई और हजारों लोग मारे गए। 2014 में जम्मू-कश्मीर में 4–6 सितम्बर को 72 घंटे की अभूतपूर्व वर्षा हुई, जिससे 287 लोगों की मौत और श्रीनगर का बड़ा हिस्सा डूब गया। 2016 में पिथौरागढ़ और चमोली जिलों में 1–2 जुलाई को बहु-स्थानीय क्लाउडबर्स्ट हुए, जिनमें 30 से अधिक मौतें हुईं।
2017 में डोडा (J&K) के थाथरी कस्बे में क्लाउडबर्स्ट से फ़्लैश फ्लड आई और 6 मौतें हुईं। 2019 में उत्तराखंड के तेहरी में 8 अगस्त को शाम 8 बजे के आसपास 130 मिमी/घंटा वर्षा दर्ज की गई और पुल बह गए। 2021 में हिमाचल और उत्तराखंड के किन्नौर, चमोली, कुल्लू और उत्तरकाशी जिलों में दिन के समय कई क्लाउडबर्स्ट हुए, जिनमें 40 से अधिक मौतें हुईं। 2023 में हिमाचल के सोलन जिले (जडौन गाँव) में सुबह क्लाउडबर्स्ट से 7 लोगों की मौत हुई।
2024 में हिमाचल (किन्नौर-कुल्लू-मंडी) और उत्तराखंड के कई हिस्सों में मॉनसून ट्रफ और वेस्टर्न डिस्टर्बन्स की संयुक्त क्रिया से दिन में भी क्लाउडबर्स्ट दर्ज किए गए। 2025 में उत्तराखंड (धराली), हिमाचल (किन्नौर) और जम्मू-कश्मीर (किश्तवाड़-डोडा) जिलों में अगस्त महीने में दिन और रात दोनों समय घटनाएँ हुईं, जिनमें पुल, सड़कें और गाँव बह गए।
राज्यवार आँकड़ों की बात करें तो हिमाचल प्रदेश सरकार और NDMA के अनुसार 2018 से 2025 के बीच कुल 148 क्लाउडबर्स्ट, 294 फ्लैश फ्लड और 5,000 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए, जिनसे 2023 में अकेले ~₹10,000 करोड़ का नुकसान हुआ। उत्तराखंड में 2016–2021 के बीच उपग्रह आधारित अलर्ट सत्यापन में 42 क्लाउडबर्स्ट एपिसोड दर्ज हुए। अलग मीडिया और राज्य रिपोर्टों के अनुसार पिछले 9 वर्षों में ~67 क्लाउडबर्स्ट घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें पौड़ी, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जिले सबसे अधिक प्रभावित रहे। 2020–2023 मॉनसून महीनों में राज्य की 183 आपदाओं में ~14% क्लाउडबर्स्ट श्रेणी की थीं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 2010 का लेह क्लाउडबर्स्ट ऐतिहासिक था, जबकि 2017–2025 के बीच डोडा, किश्तवाड़ और कठुआ जिले बार-बार प्रभावित हुए।
वैज्ञानिक दृष्टि से दिन के समय क्लाउडबर्स्ट बढ़ने के कारण भी स्पष्ट हैं—(1) वायुमंडल की नमी-धारण क्षमता हर 1°C पर 7% बढ़ना, (2) दोपहर-बाद और रात्रि-आरंभ का दोहरा शिखर (Diurnal Cycle) जिसमें दिन की एनेबेटिक हवाएँ CAPE बढ़ाती हैं, (3) मेज़ोस्केल ट्रिगर—मॉनसून ट्रफ और वेस्टर्न डिस्टर्बन्स की संयुक्त क्रिया, (4) अवलोकन में सुधार—IMD Doppler Weather Radars और ISRO-NASA उपग्रहों से दिन की घटनाएँ भी बेहतर रिकॉर्ड हो रही हैं।
पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव स्पष्ट हैं—क्लाउडबर्स्ट से नदियों में अचानक जलप्रवाह 2000–3000 क्यूमैक्स तक पहुँचता है, जिससे गाँव, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएँ नष्ट होती हैं। 2003–2023 के बीच उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में क्लाउडबर्स्ट व फ्लैश फ्लड से 5000 से अधिक मौतें और ~₹40,000 करोड़ की हानि हुई। दिन में घटनाएँ होने पर जनहानि अधिक होती है क्योंकि लोग कृषि, पशुपालन और पर्यटन गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। उदाहरण के लिए 2023 में कुल्लू में दोपहर 2 बजे 45 मिनट में 115 मिमी वर्षा हुई और ब्यास नदी का प्रवाह 3000 क्यूमैक्स पहुँच गया, जिससे गाँव बह गए।
भविष्य की दृष्टि से NDMA और NITI Aayog की रिपोर्ट (2020) चेतावनी देती है कि यदि CO₂ उत्सर्जन दर यही रही तो 2050 तक हिमालयी राज्यों में क्लाउडबर्स्ट की घटनाओं में 20–25% वृद्धि हो सकती है। समाधान के लिए ISRO के Sentinel-1/2, INSAT-3DR, Megha-Tropiques, और GPM मिशन से उच्च-रिज़ॉल्यूशन पूर्वानुमान बनाए जा रहे हैं। Doppler Radars और Automatic Weather Stations से वास्तविक-समय अलर्ट संभव हुआ है। NDMA और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण सामुदायिक प्रशिक्षण कर रहे हैं ताकि लोग समझें कि अब क्लाउडबर्स्ट केवल रात का नहीं बल्कि दिन का भी खतरा है।
इस प्रकार, वैज्ञानिक आँकड़े, वर्ष-वार घटनाएँ, राज्यीय डेटा और जलवायु विज्ञान के सिद्धांत स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि क्लाउडबर्स्ट का दिन के समय होना अब सामान्य होता जा रहा है और यह पूरी तरह से ग्लोबल वार्मिंग तथा बदलते जलवायु चक्र का परिणाम है। यदि समय रहते प्रदूषण नियंत्रण, हिमालयी वनों की सुरक्षा, अतिक्रमण रोकथाम और वैज्ञानिक पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं अपनाई गई तो आने वाले वर्षों में क्लाउडबर्स्ट हिमालयी पारिस्थितिकी और भारत की जल सुरक्षा के लिए सबसे बड़े संकटों में से एक होंगे।