हिमालय पार करता मानसून

भारतीय आपदाएँ, वैश्विक जलवायु और जल आत्मनिर्भरता की दिशा

अजय सहाय

हिमालय और मानसून का संबंध केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं है बल्कि यह सम्पूर्ण एशिया और वैश्विक जलवायु प्रणाली के लिए निर्णायक भूमिका निभाता है, वैज्ञानिक दृष्टि से इसे “Asian Climate Engine” कहा जाता है क्योंकि यह जल–ऊर्जा चक्र (Water–Energy Cycle) का केंद्र है, और जब मानसून की नमी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठकर हिमालय से टकराती है ।

 उसका लगभग 70–80% हिस्सा 1500–4000 मीटर ऊँचाई पर वर्षा के रूप में गिर जाता है, जबकि शेष 15% भाग तिब्बत के पठार तक पहुँच जाता है (IMD और IITM पुणे मॉडल डेटा के अनुसार), यही वह प्रक्रिया है जिसे Orographic Precipitation और Cross–Himalaya Moisture Transport कहा जाता है ।

यही मानसूनी नमी तिब्बत की उन नदियों को जीवन देती है जो सामान्यतः सूखी रहती थीं जैसे Tsangpo–Brahmaputra, Indus की ऊपरी सहायक नदियाँ और Mekong का ऊपरी हिस्सा, ICIMOD (2023) और Chinese Academy of Sciences की रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि 20वीं सदी के उत्तरार्ध तक तिब्बती पठार की कई नदियों में वर्षा आधारित प्रवाह अत्यंत कम था लेकिन 2000 के बाद मानसून के तीव्र होने और हिमालय पार करने वाली नमी की मात्रा बढ़ने से इन नदियों में जलप्रवाह बढ़ गया।  यहाँ तक कि पहले जो मौसमी (Seasonal) नदियाँ थीं वे अब अर्ध–स्थायी प्रवाह वाली हो चुकी हैं ।

यह सीधे–सीधे Climate Change और Monsoon–Tibet Feedback Loop का परिणाम है। लेकिन यही प्रक्रिया हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं (Natural Disasters) का सबसे बड़ा कारण भी है क्योंकि जब इतनी विशाल मात्रा में नमी रुकती और संकेंद्रित होती है तो यह Cloudburst (मेघफटन), Flash Floods (अचानक बाढ़), Landslides (भूस्खलन), और Glacial Lake Outburst Floods (GLOF) जैसी आपदाओं को जन्म देती है। Wadia Institute of Himalayan Geology और ISRO–NRSC के संयुक्त अध्ययन (2000–2022) में पाया गया ।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में Cloudburst की घटनाएँ पिछले दो दशकों में 67% बढ़ी हैं, IMD के 1901–2020 के आंकड़े बताते हैं कि अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ (Extreme Rainfall Events) हिमालयी राज्यों में 55% बढ़ी हैं, और यह वृद्धि सीधे बढ़ती वायुमंडलीय नमी और स्थानीय वायुगतिकीय अस्थिरता से जुड़ी है, वैज्ञानिक दृष्टि से Clausius–Clapeyron relation कहता है कि हर 1°C तापमान वृद्धि पर हवा में नमी धारण क्षमता 7% बढ़ जाती है और इसी कारण Global Warming ने हिमालयी मानसून को अधिक तीव्र और अनिश्चित बना दिया है।

पर्यावरणीय दृष्टि से हिमालय “Third Pole” कहलाता है क्योंकि यहाँ 5000 से अधिक ग्लेशियर और 10,000 से अधिक ग्लेशियल झीलें हैं, NASA ICESat–2 और ESA Sentinel–1/2 के सैटेलाइट डेटा (2010–2020) से पता चला कि हिमालयी ग्लेशियरों का औसत बर्फ ह्रास 13 गीगाटन प्रति वर्ष है, और यह ह्रास उन्हीं क्षेत्रों में सर्वाधिक दर्ज हुआ है जहाँ मानसूनी नमी अधिक रुकती है, परिणामस्वरूप झीलों का जलस्तर बढ़कर GLOF का खतरा कई गुना बढ़ गया है ।

ICIMOD (2023) की रिपोर्ट बताती है कि केवल नेपाल और भारत के हिमालयी हिस्सों में 200 से अधिक झीलें उच्च जोखिम पर हैं जिनमें से 26 को “अत्यंत संवेदनशील” श्रेणी में रखा गया है, यह स्थिति मानसून–हिमालय–तिब्बत की परस्पर क्रिया का प्रत्यक्ष परिणाम है। भारतीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो देश में हर वर्ष औसतन 4000 BCM वर्षा जल होता है, जिसमें से लगभग 1869 BCM नदियों के माध्यम से बह जाता है, 432 BCM भूजल पुनर्भरण में समा जाता है और शेष Wetlands, Forests और Lakes में संग्रहित होता है ।

किंतु जब मानसून अत्यधिक तीव्र होकर Cloudburst और Landslide के रूप में प्रकट होता है तो यह जल संसाधन न होकर आपदा बन जाता है, Central Water Commission (CWC) के अनुसार केवल 2010–2020 के बीच हिमालयी बाढ़ों से भारत को ₹1.2 लाख करोड़ का नुकसान और 14,000 से अधिक मौतें दर्ज हुईं, यह आँकड़े इस प्रक्रिया की गंभीरता को दर्शाते हैं।

वैश्विक दृष्टि से IPCC AR6 (2021) ने यह स्पष्ट किया है कि Himalayan Monsoon–Tibet Feedback विश्व के Jet Streams और Westerlies को प्रभावित करता है, जिससे न केवल एशिया बल्कि यूरोप और अफ्रीका तक में Heatwaves और Droughts बढ़ जाते हैं, उदाहरण के लिए 2022 की यूरोपीय Heatwave का एक बड़ा कारण यही था, इसी तरह 2020 में तिब्बत और चीन के यांग्त्ज़ी बेसिन में आई बाढ़ से 70 मिलियन लोग प्रभावित हुए थे, इसका सीधा कारण हिमालय पार करके पहुँची मानसूनी नमी थी।

तिब्बत की जो नदियाँ पहले सूखी रहती थीं उनमें अब मानसून की नमी से पानी आने लगा है, जैसे Tsangpo (जो आगे जाकर ब्रह्मपुत्र कहलाती है), Indus की सहायक नदियाँ और Upper Mekong में प्रवाह बढ़ा है, Chinese Meteorological Administration ने 2001–2020 के डेटा में पाया कि Plateau की औसत वर्षा में 12% वृद्धि दर्ज हुई है, और इसका मुख्य कारण Himalaya को पार करने वाला Monsoon Moisture है, इससे Tibet की जल–अर्थव्यवस्था बदली है परंतु Himalayan Region में आपदाओं का जोखिम कई गुना बढ़ा है।

समाधान की दृष्टि से देखा जाए तो ISRO का Integrated Himalayan Disaster Monitoring Mission (2023–2030) रियल–टाइम मॉनिटरिंग हेतु Sentinel–1 SAR, ICESat–2 और UAV–Photogrammetry का उपयोग कर रहा है, NITI Aayog ने अपने “Himalayan Vision 2047” में हर राज्य के लिए “Red–Zone Atlas” बनाने का प्रस्ताव दिया है, ताकि भूस्खलन, बाढ़ और GLOF संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके, साथ ही Check Dams, Soak Pits और Wetlands को पुनर्जीवित कर 200–250 BCM अतिरिक्त जल संग्रहण बनाया जा सके, जिससे अतिरिक्त वर्षा जल को आपदा से अवसर में बदला जा सके।

भविष्य की रणनीति यही है कि Community Preparedness, Digital Early Warning Systems और Watershed–Wetland Restoration को मिलाकर एक Integrated Management Model विकसित किया जाए, ताकि मानसून का हिमालय पार करना केवल आपदा का कारण न रहे बल्कि “जल आत्मनिर्भर भारत 2047” की दिशा में अवसर बन सके।