हिमालयी ऑल-वेदर रोड

विकास और आपदा के बीच 5–7 मीटर का संतुलन

अजय सहाय

हिमालय में 5 से 7 मीटर चौड़ी ऑल-वेदर सड़क निर्माण का प्रश्न केवल विकास की दृष्टि से नहीं बल्कि वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि हिमालय विश्व का सबसे युवा पर्वत है जिसकी चट्टानें अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुई हैं, fault lines सक्रिय हैं और निरंतर uplift हो रहा है ।

इसी कारण इसे “अस्थिर पर्वत” (Unstable Mountain) कहा जाता है, जहाँ भूकंप, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड और ग्लेशियर पिघलने की घटनाएँ बार-बार सामने आती हैं, और यदि सड़क चौड़ाई को 10–12 मीटर तक बढ़ा दिया जाए तो slope cutting, जंगल की कटाई, मिट्टी का क्षरण और नदी तंत्र का विनाश और अधिक बढ़ेगा जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी (Ecology) और मानव जीवन दोनों को भारी खतरा होगा, इसलिए 5–7 मीटर चौड़ी सड़कें ही यहाँ के लिए उपयुक्त, सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प साबित होती हैं।

भूवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो Geological Survey of India और Wadia Institute of Himalayan Geology के अनुसार हिमालय की ढलानों का लगभग 60% हिस्सा भूस्खलन प्रवण क्षेत्र (Landslide-prone zone) है, और जब सड़क चौड़ी की जाती है तो slope instability ratio गिर जाता है, चट्टानों में दरारें (cracks) फैल जाती हैं और बड़े पैमाने पर landslides होते हैं।

उदाहरण के लिए चारधाम ऑल-वेदर रोड प्रोजेक्ट (उत्तराखंड) में सड़क चौड़ाई 10 मीटर करने से 2018–2023 के बीच लगभग 1000 से अधिक landslides दर्ज किए गए जबकि पहले यहाँ औसतन 200–250 घटनाएँ प्रति वर्ष होती थीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि चौड़ी सड़क सीधे आपदा की संभावना बढ़ाती है।

पर्यावरणीय दृष्टि से जब सड़क चौड़ी की जाती है तो हजारों पेड़ काटने पड़ते हैं, केवल चारधाम प्रोजेक्ट में ही 47,043 पेड़ काटे गए, जबकि एक पेड़ औसतन 21.77 किलोग्राम CO₂ प्रतिवर्ष सोखता है और लगभग 118–200 लीटर पानी संचित करता है, इस तरह कुल मिलाकर लगभग 10 लाख टन CO₂ अवशोषण क्षमता समाप्त हो गई, जिससे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा और बढ़ा।

इसके अतिरिक्त slope cutting से मिट्टी बहकर नदियों में जाती है जिससे अलकनंदा, मंदाकिनी, गंगा और यमुना जैसी नदियों में siltation बढ़ता है, नदी तल भर जाता है और बाढ़ की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो IPCC की AR6 रिपोर्ट और ISRO के रिमोट सेंसिंग आंकड़े बताते हैं कि 2000–2019 के बीच हिमालयी glaciers औसतन 0.25 मीटर प्रति वर्ष पीछे हटे (retreat) और सड़क निर्माण के दौरान heavy machinery से carbon emission बढ़ता है, black carbon glaciers पर जमता है और albedo effect घटने से पिघलने की दर दोगुनी हो जाती है, जिससे downstream क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता अस्थिर हो जाती है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में Supreme Court ने 2022 में यह स्पष्ट किया कि रणनीतिक (strategic) सड़कों को छोड़कर पर्यटन या तीर्थयात्रा की सड़कों की चौड़ाई अधिकतम 5.5 मीटर ही होनी चाहिए और Border Roads Organisation (BRO) ने intermediate lane category (5.5–7 मीटर) को सबसे उपयुक्त माना है, क्योंकि lay-bys (हर 500 मीटर पर वाहन पास करने की जगह) बनाकर दोतरफा यातायात आसानी से संभाला जा सकता है।

Ministry of Road Transport and Highways (MoRTH) के अनुसार भारत में कुल 1.5 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जिनमें हिमालयी राज्यों में लगभग 12,000 किलोमीटर संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं, जहाँ यदि चौड़ी सड़कें बनाई गईं तो यह सीधे landslide और flood hazards को बढ़ाएँगी। डेटा भी यही दर्शाता है कि 2010–2015 में 5–7 मीटर चौड़ी सड़क पर भूस्खलन की वार्षिक औसत घटनाएँ 200–250 थीं जबकि 2018–2023 में 10 मीटर चौड़ी सड़क बनने के बाद यह 1000 से अधिक हो गईं, इसी प्रकार CO₂ अवशोषण क्षमता में लगभग 10 लाख टन की वार्षिक हानि हुई।

वैश्विक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्विट्ज़रलैंड में Alps में सड़क चौड़ाई 6 मीटर तक सीमित रखी जाती है और लंबी दूरी के लिए Gotthard Tunnel (57 km) जैसी सुरंगों और ropeways का उपयोग किया जाता है, जिससे slope cutting न्यूनतम होता है और landslide hazard बहुत कम रहता है। जापान के Honshu Alps क्षेत्र में जहाँ उच्च भूकंप और भूस्खलन की संभावना रहती है, वहाँ सड़क चौड़ाई 5–7 मीटर रखी जाती है और Geo-grid walls, rock bolting तथा bio-engineering तकनीकों से slope stabilisation किया जाता है, जिससे 2016 के Kumamoto earthquake जैसी घटनाओं के बाद भी highways operational रहे।

नेपाल के Kathmandu–Pokhara highway पर World Bank की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया कि जब सड़क चौड़ाई 6.5 मीटर से अधिक करने की कोशिश हुई तो 2017–2019 के बीच कई बार highway 20–25 दिनों तक block रहा, इसलिए सरकार ने सड़क चौड़ाई सीमा 6.5 मीटर तय की। भूटान ने अपने Gross National Happiness (GNH) मॉडल के अंतर्गत सड़क चौड़ाई 5–6 मीटर तक सीमित रखी और heavy vehicles पर रोक लगाई, जिससे पर्यटन भी सुरक्षित रहा और पर्यावरणीय संतुलन भी कायम रहा।

इन केस स्टडीज़ से यह स्पष्ट होता है कि narrow but smart roads ही sustainable option हैं। भविष्य की राह (Vision 2047) की ओर बढ़ते हुए भारत को भी इन वैश्विक मॉडलों से सीखकर सतत हिमालयी अवसंरचना अपनानी होगी—जैसे ढलानों पर bio-engineering techniques (bamboo और napier grass रोपण), tunnel और elevated roads ताकि slope cutting कम हो, green road concept (solar lighting, rainwater harvesting, plantation) अपनाना, और early warning system (ISRO Sentinel-1 SAR, ICESat-2 monitoring) लागू करना।

इसी के साथ lay-bys हर 500 मीटर पर बनाकर यातायात नियंत्रण करना चाहिए। यदि ऐसा किया गया तो हिमालयी क्षेत्र में landslide, flood और glacier melt का खतरा कम होगा, CO₂ balance सुरक्षित रहेगा, biodiversity संरक्षित होगी और भारत Vision 2047 तक sustainable development की दिशा में आगे बढ़ेगा।

निष्कर्ष यही है कि सभी वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक और पर्यावरणीय प्रमाण बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में सड़क चौड़ाई 5–7 मीटर ही उपयुक्त है और wider roads न केवल आपदा की संभावना बढ़ाती हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षति को भी तेज़ करती हैं, जबकि Switzerland, Japan, Nepal और Bhutan जैसे वैश्विक मॉडल यह साबित करते हैं कि सीमित चौड़ाई वाली स्मार्ट सड़कें ही सुरक्षित, टिकाऊ और प्रकृति-संवेदनशील विकास का आधार हैं।