मौसम से बचे तो सड़क पर कसैला होता कश्मीर का सेब
मौसम से बचे तो सड़क पर कसैला होता कश्मीर का सेब

मौसम से बचे तो सड़क पर कसैला होता  कश्मीर का  सेब

इस साल कश्मीर का सेब दिल्ली तक रेल से लाने का प्रयोग

पंकज चतुर्वेदी

बीते कुछ सालों से जलवायु परिवर्तन की मार से बेहाल धरती के स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर पर संकट मंडरा रहा है कि कहीं यहाँ का किसान सेब फल की बागवानी से तौबा न कर ले । पहले  देर तक गर्मी पड़ी, फिर कम बर्फ़बारी और वह भी अल्प दिनों के लिए , इस सब विपदाओं से जूझते हुए जब शरद ऋतु  के पतझड़ में उम्मीद के सेब फल आये तो रास्तों में लगे लम्बे जाम ने पुरे साल की मेहनत को  सड़क पर फैंकने को मजबूर कर दिया । हालांकि इस साल कश्मीर का सेब दिल्ली तक रेल से लाने का प्रयोग हुआ है लेकिन  इस सेवा का लाभ बहुत कम लोगों तक ही पहुँच पा रहा है ।

भादो विदा हुआ तो पुलवामा, सौपोर , शोपियां जैसे जिलों में बर्फ गिरने से पहले पेड़ों पर लाल-गुलाबी और सुनहरे  सेब फल झुमने लगे । इस समय सारा परिवार  एकजुट हो कर पहले सेब तोड़ता है, फिर उसे छंटता है और लकड़ी  की पेटियों में  सुरक्षित पैक करता है । फिर इन्हें  ट्रकों  में चढा दिया जाता है ।

इस साल अगस्त के आखिरी हफ्ते में जमकर बरसात हुई और  कश्मीर को जम्मू से जोड़ने वाले एकमात्र 270 किलोमीटर आल वेदर रोड पर नासिरी, उधमपुर  सहित दर्जनों जगह  इतना भूस्खलन हुआ कि कोई तीन हफ्ते रास्ता बंद रहा । इस बीच कोई दस हज़ार ट्रक  सड़कों पर फंसे रहे । जिन गाड़ियों से बदबू आने लगती , सेब को आसपास की घाटी में लुढ़का कर निराश लोग वापिस आने की सोचते । उधर पुराना मुग़ल रोड  इसके लायक नहीं रहता कि बरसात में उससे भारी वाहन ले जाए जा सकें ।

सौपोर को सेबफल की सबसे बड़ी मंडी कहा जाता है । कभी यहाँ इस समय कंधे छीलने वाली भीड़ और लोगों का  शोर होता था । इस समय यहाँ  सन्नाटा है – जो लोग हैं भी तो उनके चेहरे पर ख़ुशी नहीं हैं । बम्पर फसल ले कर आये किसान की  चिंता है कि दाम सही नहीं मिलेगा – कारण, रास्ते बंद हैं और ऐसे में  सड़क पर माल फैंकने से बेहतर है बड़े डीलर को औने -पौने दाम पर बेच दिया जाये ।  डिलेशियस  एप्पल के दाम 1200 रुपया पेटी से घट कर  600  हो गये ।  जबकि जल्दी सड़ने वाले गल्ला और किसेट के तो खरीदार नहीं हैं ।  मजदूर के पास काम नहीं है तो ढुलाई करने वाले ट्रक चालक इंतज़ार का रहे हैं कि रास्ते खुलने की खबर आये ।

अभी  17 सितम्बर से रास्ता खुला तो हफ्ते भर तो जाम में फंसे ट्रकों को निकलने में ही लगेगा । संकट केवल इतना ही नहीं हैं , माल ढुलाई के दाम तिगुने से अधिक हो गए – साढ़े तीन सौ रुपये पेटी, जो ट्रक टूटे फूटे मुग़ल रोड से जाने को राजी है तो उनका भाडा ज्यादा है । शोपियां से श्रीनगर  के 48 किलोमीटर वाले  हाईवे   पर अब सड़क नहीं  दिख रही । चारों तरफ सेब की पेटियां और उससे निकलती बदबू का साम्राज्य हैं  जिनके बीच कौए  उछलते-कूदते दिख रहे हैं

जान लें यह दृश्य पिछले साल भी इसी समय ऐसा ही था ।  

कश्मीर में कोई 35 लाख लोग  सेबफल के उत्पादन  से जुड़े हैं  जिसका सालाना व्यापार 11 हज़ार करोड़  का है । बदलते मौसम का मिज़ाज  किस तरह आम लोगों के जीवन को प्रभावित करता है, इसकी कडवी  सच्चाई  कश्मीर के बागानों में दिख जाती है । हालाँकि इस साल  कश्मीर में ट्रेन पहुँचने से उम्मीद की एक किरन तो जागी है लेकिन उसकी अपनी व्यावहारिक दिक्कते हैं । 17 सितम्बर को बड़गाम से आठ बोगियों में सेब लेकर कार्गो पार्सल ट्रेन  कोई 23 घंटे में सुबह लगभग सवा छह बजे दिल्ली के आदर्श नगर रेलवे पहुंची लेकिन वहां से बमुश्किल आधा किलोमीटर  आजादपुर मंडी तक माल पहुँचने में  पांच घंटे लगे ।  

लालफीता शाही के चलते कंटेनर की चाबी आने, माल ढुलाई के लिए वाहनों की अनुमति आदि में इतना समय लग गया । दिल्ली-एनसीआर की सबसे बड़ी आजादपुर फल-सब्जी मंडी में प्रतिदिन तीन से लेकर साढ़े तीन हजार टन सेब की प्रतिदिन की मांग है । जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से सामान्यत: हर रोज लगभग तीन सौ ट्रक सेब लेकर आजादपुर मंडी पहुंचते हैं। एक ट्रक में औसतन 10 से लेकर 14 टन सेब लाने की क्षमता है । पार्सल ट्रेन में पहले दिन सात बोगी में 161 टन व दूसरे दिन आठ बोगी में 184 टन सेब बड़गाम से दिल्ली पहुंच पाया है। 

फिर उधर कश्मीर में भी बडगाम से शोपियां की दूरी कोई  57 किलोमीटर है  और उसके लिए ढुलाई और मजदूरी देना पड़ता हैं । इससे  लागत पर असर पड़ रहा हैं ।  यदि सेब को दिल्ली के अलावा अन्य किसी शहर को भेजा जाना है तो  एक बार फिर नए सिरे से ढुलाई  होगी ।  

कश्मीर के कुछ लोग सुझाव देते हैं कि राज्य में कोल्ड स्टोरेज क्षमता बढाई जाए, इस समय शोपियां, अनंतनाग, श्रीनगर और पुलवामा में कोई 85 कोल्ड स्टोरेज हैं जिनकी क्षमता  चार लाख मेट्रिक टन है । अब यहाँ 20 किलो की एक पेटी को चार महीने के लिए रखने का किराया 180 रूपये होता हैं । अधिकांश कोल्ड स्टोरेज को बड़े डीलर पूरा बुक कर लेते हैं और आम किसान को अवसर मिलता नहीं, वैसे भी किराया उर और बार-बार मॉल ढुलाई के व्यय से बढे दाम बाज़ार में मिलते नहीं ।

जान लें सितम्बर में यदि माल रखा तो उसे  दिसम्बर में उठाना  होगा और उस समय भारी बर्फ़बारी के कारण  फिर से सड़क-रास्ते  विपदा में होते हैं  और फलों की खपत भी कम हो जाती है । फिर कश्मीर के पारम्परिक सेब के मुकाबले में बाज़ार में वाशिंगटन  एप्पल है जो लम्बे समय तक खराब नहीं होता और उसकी उपरी चमक ज्यादा होती हैं ।

बागान से बाज़ार के बीच निराशाओं में घुट रहे सेबफल के किसानों को राहत तभी मिल सकती हैं जब सेब का रस, सिरका और ऐसे ही उत्पादों के लघु उद्योग ग्रामीण स्तर पर शुरू किये जाएँ । इसके साथ ही कश्मीरी सेब के विदेशों में निर्यात की संभावना, श्रीनगर से सीधे उन्हें बाहर  भेजने के लिए हवाई कार्गो  आदि पर काम किया जाये, साथ ही आधुनिक जेनेटिक तकनीक से अधिक समय तक न सड़ने वाली नस्लों के शोध और प्रचार पर भी काम करने की जरूरत हैं ।