छठ पूजा के बाद जलसंपत्तियों से घटती जनभागीदारी: कारण, चुनौतियाँ और समाधान
अजय सहाय
छठ पूजा भारत के पूर्वी राज्यों विशेषकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और दिल्ली-एनसीआर में मनाया जाने वाला वह अनूठा पर्व है जो सूर्योपासना और जलपूजन का सबसे वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रूप प्रस्तुत करता है। इस पर्व के दौरान गाँवों और शहरों में करोड़ों लोग अपने-अपने क्षेत्र के तालाबों, नदियों, नहरों, झीलों और पोखरों की सफाई में जुट जाते हैं।
यह समय होता है जब समाज के सभी वर्ग—विशेषकर युवा, महिलाएँ, विद्यार्थी, स्वयंसेवी संगठन और प्रशासन—एकजुट होकर जलस्रोतों को स्वच्छ और सुशोभित करते हैं।
घाटों की मरम्मत, कचरा साफ़ करना, प्लास्टिक हटाना, दीप सजाना, तालाबों में जलभराव सुनिश्चित करना और जलकुंभी निकालना जैसे कार्य एक सामूहिक पर्व का रूप लेते हैं। यह जनसहभागिता इस बात का प्रमाण है कि जब समाज एक धार्मिक या सांस्कृतिक उद्देश्य से प्रेरित होता है, तो जलसंरक्षण और पर्यावरण-संवर्धन के लिए अद्भुत परिणाम संभव हैं।
किंतु जैसे ही छठ पूजा समाप्त होती है, वही तालाब, घाट, नहर और झीलें धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार होने लगती हैं, युवाओं की वह ऊर्जा क्षीण पड़ जाती है, और जलस्रोत पुनः गंदगी, प्लास्टिक और अपशिष्ट से भर जाते हैं।
यही विरोधाभास इस अध्ययन का केंद्र है कि जो समाज छठ पूजा के समय जल की पूजा करता है, वही कुछ दिनों बाद जलस्रोतों की अनदेखी क्यों करने लगता है। इसका उत्तर केवल धार्मिक आस्था में नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, प्रशासनिक व्यवस्था, पर्यावरणीय शिक्षा और सामुदायिक प्रेरणा की कमी में छिपा है।
छठ पूजा के दौरान घाटों पर सफाई की भावना एक सामूहिक अनुष्ठान बन जाती है क्योंकि यह प्रकृति की आराधना से जुड़ा है। सूर्य और जल की पूजा का अर्थ केवल धार्मिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन का सम्मान है। यही कारण है कि इस पर्व के पहले नगर निकाय, ग्राम पंचायतें, जल विभाग, विद्यालय और स्वयंसेवी संगठन सक्रिय हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए, पटना नगर निगम हर वर्ष लगभग 100 से अधिक प्रमुख घाटों की सफाई, 25 लाख लीटर जल निकासी और 50 ट्रैक्टर कचरा हटाने का कार्य करता है। रांची में 72 तालाबों की विशेष सफाई होती है, जबकि दिल्ली और नोएडा में यमुना के तटों पर नगरपालिका द्वारा हजारों स्वयंसेवक लगाए जाते हैं। इन सबका उद्देश्य यह होता है कि श्रद्धालु सुरक्षित, स्वच्छ और गंधहीन घाटों पर पूजा कर सकें। यह सब उत्सव एकता का परिचायक है।
लेकिन जैसे ही छठ समाप्त होता है, यह सक्रियता गायब हो जाती है क्योंकि यह सफाई दीर्घकालीन सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि अल्पकालीन धार्मिक तैयारी बनकर रह जाती है। छठ के बाद प्रशासनिक मशीनरी अन्य कार्यों में व्यस्त हो जाती है, सफाई कर्मियों को हटाया जाता है, और लोगों में भी यह धारणा बन जाती है कि अब तालाबों की जरूरत अगले वर्ष तक नहीं पड़ेगी। इस सोच के कारण घाट और जलाशय फिर से गंदगी से भरने लगते हैं।
युवाओं की भूमिका इस परिवर्तन में केंद्रीय है। छठ के समय वे उत्साहपूर्वक सामूहिक सफाई में भाग लेते हैं—स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थी झाड़ू लगाते हैं, मिट्टी और कचरा हटाते हैं, और सोशल मीडिया पर अपने कार्यों को गर्व से साझा करते हैं। लेकिन यह प्रेरणा अस्थायी रहती है क्योंकि उनके पास निरंतर कार्य करने के लिए कोई मंच नहीं होता।
शोध बताते हैं कि युवाओं की भागीदारी तभी स्थायी होती है जब उन्हें नियमित नेतृत्व, परिणाम देखने का अवसर और सामाजिक मान्यता मिलती है। भारत में अधिकांश पर्यावरणीय अभियान त्योहारों तक सीमित रहते हैं, क्योंकि बाद में निगरानी और मूल्यांकन का ढाँचा नहीं होता।
बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, छठ पूजा से पहले और बाद में तालाबों के जल में घुलित ऑक्सीजन का स्तर 6.5 mg/L से घटकर 3.8 mg/L हो जाता है जबकि कॉलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा तीन गुना बढ़ जाती है। यह बताता है कि पूजा के बाद घाटों में छोड़े गए फूल, दीप, प्लास्टिक, नारियल और अन्य सामग्री धीरे-धीरे जल को प्रदूषित कर देते हैं।
नोएडा में हिंदन नदी का विश्लेषण दर्शाता है कि छठ के एक सप्ताह बाद जल की विषाक्तता इतनी बढ़ जाती है कि जलीय जीवों की मृत्यु दर 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
छठ के समय सफाई केवल एक ‘इवेंट’ बन जाती है क्योंकि इसमें प्रशासनिक सहयोग, मीडिया प्रचार और सामूहिक उत्साह होता है। लेकिन यह व्यवस्था त्योहार के बाद ठंडी पड़ जाती है। नगर निगमों और पंचायतों के पास स्थायी “पोस्ट-फेस्टिवल वाटर क्लीनअप प्लान” नहीं होता। इसी कारण रांची के 72 तालाब, गया के रामशिला और विष्णुपद तालाब, पटना के कंकड़बाग और दीघा घाट, और मुज़फ्फरपुर के मोतीझील व मनिकामौन जैसे ऐतिहासिक जलाशय फिर से उपेक्षित हो जाते हैं। जलकुंभी और सीवेज प्रवेश के कारण उनका पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है। प्रशासनिक दृष्टि से यह ‘अवधि आधारित अभियान’ बन जाता है जबकि पर्यावरण को निरंतर प्रयास चाहिए।
सामाजिक दृष्टि से समस्या यह है कि जलसंपत्तियों को पूजा स्थल के रूप में तो देखा जाता है, पर जीवन उपयोगिता के रूप में नहीं। छठ के समय जलशुद्धता धार्मिक आवश्यकता बन जाती है, लेकिन उसके बाद वही जल “कचरा बहाने की जगह” बन जाता है। यह व्यवहारिक विरोधाभास भारतीय समाज की पर्यावरणीय चेतना की सबसे बड़ी कमजोरी है।
लोग केवल “उत्सव में स्वच्छता” अपनाते हैं, “जीवन में स्वच्छता” नहीं। यही कारण है कि युवाओं की प्रेरणा भी क्षणिक रहती है—वे देख रहे होते हैं कि उनके प्रयास का कोई स्थायी परिणाम नहीं निकल रहा, जिससे उनमें हतोत्साह बढ़ता है।
प्रेरणा की कमी के साथ-साथ आर्थिक और प्रबंधकीय कारण भी महत्वपूर्ण हैं। छठ से पहले सफाई के लिए अतिरिक्त बजट और कर्मी लगाए जाते हैं, लेकिन बाद में वही घाट या तालाब किसी विभाग के स्पष्ट जिम्मे नहीं रहते।
उदाहरण के लिए, मुजफ्फरपुर के मोतीझील तालाब की सफाई छठ के समय नगर निगम करता है, पर रखरखाव का कार्य सिंचाई विभाग के अधीन है, जिससे समन्वय की कमी बनी रहती है। इस दोहरे प्रशासनिक ढांचे से युवाओं और समाज को स्थायी दिशा नहीं मिल पाती।
युवा वर्ग की व्यावहारिक चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। आज का युवा वर्ग रोजगार, शिक्षा और डिजिटल संसार में व्यस्त है; उनके लिए जलसंपत्तियों की देखरेख तब तक प्राथमिकता नहीं बनती जब तक कोई ठोस मंच या पुरस्कार व्यवस्था न हो। त्योहार के समय वे एकजुट होते हैं क्योंकि सामूहिक भावना और सामाजिक सम्मान मिलता है, पर बाद में उनके प्रयासों को न तो मीडिया में स्थान मिलता है और न ही प्रशासनिक पहचान।
कई जिलों में युवाओं ने स्वयंसेवी समूह बनाकर “घाट प्रहरी” या “तालाब मित्र” की भूमिका निभाने की कोशिश की, लेकिन संसाधन न मिलने के कारण वे समूह कुछ महीनों में निष्क्रिय हो गए।
एक और कारण यह है कि समाज में छठ पूजा के बाद कचरा प्रबंधन की कोई समुचित प्रणाली नहीं बनती। पूजा के दौरान जो जैविक और अजैविक अवशेष जल में प्रवाहित किए जाते हैं, वे जल को प्रदूषित कर देते हैं। बिहार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, छठ के बाद के सात दिनों में गंगा के कई घाटों पर कुल सॉलिड वेस्ट का स्तर 35 प्रतिशत तक बढ़ा।
दिल्ली की यमुना में हर साल छठ के बाद 80 टन से अधिक कचरा एकत्र किया जाता है। यदि युवाओं और समाज को यह बताया जाए कि इन अवशेषों को कंपोस्टिंग या रिसाइक्लिंग द्वारा उपयोगी बनाया जा सकता है, तो यह सहभागिता लंबे समय तक चल सकती है।
जलस्रोतों की उपेक्षा के सामाजिक प्रभाव भी गहरे हैं। जब तालाब और नहरें उपेक्षित होती हैं, तो उनका जलभराव घटता है, भूजल रिचार्ज रुकता है और बाढ़ या जलजमाव की समस्या बढ़ती है। उदाहरण के लिए, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में 2023 में औसतन भूजल स्तर 8 मीटर से घटकर 11 मीटर हो गया, क्योंकि तालाबों की सिल्टिंग बढ़ गई और सफाई की निरंतरता नहीं रही। यदि छठ पूजा के बाद उसी उत्साह से तालाबों और नहरों की रखरखाव योजना चले, तो यह जल संकट को कम कर सकता है।
इस स्थिति के समाधान के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं। सबसे पहले, हर पंचायत और नगर निगम को “पोस्ट-छठ वाटर एसेट प्लान” बनाना चाहिए, जिसमें त्योहार के बाद भी तीन महीने तक सफाई, निगरानी और रिपोर्टिंग अनिवार्य हो। युवाओं के लिए “जल प्रहरी क्लब” बनाए जाएँ जो मासिक रूप से तालाबों की सफाई करें और उनके नाम पर डिजिटल डैशबोर्ड बने, जिससे उनके योगदान का रिकॉर्ड रहे।
विद्यालयों में “एक विद्यालय – एक तालाब” योजना चलाई जाए ताकि विद्यार्थी हर माह अपने क्षेत्र की जलसंपत्ति के रखरखाव में भाग लें। नगर निगम और जल विभाग युवाओं को “साप्ताहिक जल प्रहरी पुरस्कार” दें ताकि उनमें निरंतर प्रेरणा बनी रहे। छठ पूजा के दौरान उपयोग की जाने वाली पूजा सामग्री को पूरी तरह जैव-अपघट्य (biodegradable) बनाने की नीति लागू हो, जिससे जल प्रदूषण कम हो।
मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर छठ को केवल धार्मिक नहीं बल्कि “हरित पर्व” के रूप में प्रचारित किया जाए—जैसे #GreenChhath, #CleanGhat, #YouthForWater जैसे अभियान।
सरकारी स्तर पर हर जिले में “घाट प्रबंधन समिति” बनाई जानी चाहिए जिसमें युवा, पंचायत प्रतिनिधि, एनजीओ और जल विभाग के अधिकारी शामिल हों। यह समिति हर महीने जलस्तर, प्रदूषण स्तर और कचरा प्रबंधन की रिपोर्ट प्रकाशित करे। राज्य प्रदूषण बोर्ड को हर छठ के बाद “वाटर क्वालिटी बुलेटिन” जारी करना चाहिए जिसमें बताया जाए कि किन घाटों की स्थिति सुधरी और किनकी बिगड़ी। इसके साथ ही “घाट मित्र ऐप” या “वेटलैंड मॉनिटर” जैसे डिजिटल साधन युवाओं को दिए जाएँ ताकि वे हर सफाई अभियान की फोटो और डेटा अपलोड कर सकें। इससे उन्हें यह एहसास होगा कि उनका काम डेटा और नीति दोनों में मूल्यवान है।
समाज के भीतर भी छठ पूजा को केवल धार्मिक पर्व न मानकर जल चेतना के आंदोलन के रूप में देखने की आवश्यकता है। जब लोग समझेंगे कि जिस जल में वे सूर्य को अर्घ्य दे रहे हैं, वही जल उनके खेत, पेयजल और भूजल का स्रोत है, तो वे उसकी रक्षा को अपना दायित्व मानेंगे।
युवाओं को इस भावनात्मक जुड़ाव के साथ वैज्ञानिक समझ भी दी जानी चाहिए कि एक स्वच्छ तालाब 40 लाख लीटर वर्षाजल संग्रह कर सकता है, एक नहर 2.5 किलोमीटर क्षेत्र के भूजल को रिचार्ज करती है और एक झील प्रति हेक्टेयर 6.1 टन कार्बन अवशोषित कर सकती है। ऐसे डेटा जब युवाओं के सामने आते हैं, तो उनकी भागीदारी भावनात्मक नहीं बल्कि वैज्ञानिक आधार पर स्थायी बनती है।
इस प्रकार छठ पूजा भारतीय संस्कृति में जल और सूर्य की संयुक्त आराधना का प्रतीक होते हुए भी हमें यह सिखाती है कि यदि जनभागीदारी केवल चार दिनों तक सीमित रहे तो प्रकृति की सुरक्षा अधूरी रह जाएगी। हमें छठ को “हरित आंदोलन” के रूप में पुनर्परिभाषित करना होगा जहाँ युवाओं की भूमिका पूजा की तैयारी तक नहीं बल्कि जलस्रोतों के सतत संरक्षण तक बनी रहे।
यदि पंचायत, विद्यालय, प्रशासन और समाज मिलकर इसे एक सतत कार्यक्रम में बदल दें, तो वह दिन दूर नहीं जब हर तालाब, हर नदी और हर झील सालभर स्वच्छ रहेगी, और छठ का अर्थ केवल पूजा नहीं बल्कि पर्यावरणीय पुनर्जागरण का पर्व बन जाएगा।
यही वास्तविक “जल आत्मनिर्भर भारत 2047” की दिशा में जनभागीदारी का सबसे बड़ा उदाहरण होगा जहाँ हर युवा जल प्रहरी बनकर अपने गाँव, नगर और राज्य को जल संकट से मुक्त करने की दिशा में कार्य करेगा, और छठ का दीपक केवल सूर्य को नहीं, बल्कि जल और जीवन दोनों को प्रकाशित करेगा।