दिल्ली-एनसीआर में कुछ शर्तों के साथ ग्रीन पटाखें जलाने की अनुमति दे दी
रोहित कौशिक
सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखों को जलाने की अनुमति देने के बावजूद इस साल भी दीपावली और उसके बाद दिल्ली-एनसीआर और देश के अनेक हिस्सों में वायु प्रदूषण की स्थिति बेहद खराब है । दीपावली पर दिल्ली-एनसीआर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाई गईं । इस प्रकाश पर्व पर और उसके बाद राजधानी दिल्ली गैस चैम्बर बन गई।
लोगों को आंखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने मे परेशानी हुई। कई जगहों पर एयर क्वालिटी इंडेक्स 400 से लेकर 500 से ज्यादा दर्ज किया गया। ग्रीन पटाखों की आड़ में खतरनाक पटाखे भी जलाए गए ।
शासन और प्रशासन इस माहौल पर प्रतिबन्ध लगाने में पूरी तरह असफल रहा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में कुछ शर्तों के साथ ग्रीन पटाखें जलाने की अनुमति दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उडाते हुए न ही तो समय का ध्यान रखा गया और न ही यह ध्यान रखा गया कि केवल ग्रीन पटाखे ही जलें। सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने समाज की भावना का ध्यान रखा था तो सुप्रीम कोर्ट की भावना का ध्यान क्यों नहीं रखा गया?
अक्सर यह कहा जाता है कि हिन्दुओं के त्योहार दीपावली में ही पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाने की बात क्यों होती है ? दूसरे धर्मों के त्योहार में पटाखों पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाया जाता है? सवाल यह है कि क्या दूसरे धर्म के किसी त्योहार में इस कदर पटाखे चलाए जाते हैं जिस कदर दीपावली में चलाए जाते हैं ? निश्चित रूप से किसी भी उत्सव में इतनी मात्रा में पटाखे नहीं चलाए जाते हैं।
सवाल यह है कि क्या हिन्दुओं के किसी ग्रंथ में इस आतिशबाजी का जिक्र है ? पुराने जमाने में दीपावली पर इतनी मात्रा में पटाखे नहीं चलाए जाते थे लेकिन ज्यों-ज्यों समाज में दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ती गई, त्यों-त्यों पटाखों की मात्रा भी बढ़ती चली गई? जब भी दीपावली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध की बात आती है तो अनेक लोग इस प्रतिबन्ध का विरोध करते हैं।
क्या हिन्दू संस्कृति और सनातन धर्म इन पटाखों से ही सुरक्षित रह पाएगा ? हमें यह समझना होगा कि जिस तरह से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है उससे कोई भी संस्कृति सुरक्षित नहीं रह पाएगी। दीपावली पर इस कदर पटाखे चलाकर हम कोई धार्मिक कार्य नहीं कर रहे हैं बल्कि अधार्मिक कार्य ही कर रहे हैं। यह अधर्म अन्ततः पूरी मानव जाति के लिए खतरनाक साबित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में कुछ शर्तों के साथ ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पटाखों पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जाती है तो प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों की तस्करी की आशंका पैदा होती है, जो ग्रीन पटाखों के मुकाबले काफी नुकसानदेह साबित होगा। पटाखों का इस्तेमाल दीपावली से एक दिन पहले और दीपावली वाले दिन सुबह छह बजे से सात बजे तक और रात आठ बजे से दस बजे तक किया जा सकेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमें संतुलित रुख दिखाने की जरूरत है।
हमने पर्यावरणीय चिंताओं, त्योहारों की भावनाओं और पटाखा निर्माताओं के आजीविका के अधिकार को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया है। सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने समाज की भावना का ध्यान रखा तो समाज ने सुप्रीम कोर्ट की भावना का ध्यान क्यों नहीं रखा ? दीपावली पर क्यों सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ाई गईं।
दरअसल धार्मिक पर्वों से सम्बन्धित आस्था हमारे अन्दर एक नए आत्मविश्वास का संचार कर जिंदगी के सफर को बिना अवरोध के आगे बढ़ाने में सहायक होती है। लेकिन जब हमारी आस्था जिंदगी के सफर में अवरोध पैदा करे तो उसकी प्रासंगिकता एवं अस्तित्व पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी आस्था जहां एक ओर किसी तर्क को स्वीकार नहीं करती वहीं दूसरी ओर परम्परा के बंधनों से भी मुक्त नहीं होना चाहती।
यही कारण है कि कभी-कभी इसी अंध आस्था की वजह से हमारे अस्तित्व के ऊपर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। यह समाज यह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि प्रकृति की रक्षा न करके हम स्वयं अपनी आस्था पर हमला कर रहे हैं। प्रकृति की रक्षा की बात हमारे शास्त्रों में भी कही गई है। ईश्वर प्रकृति के कण-कण में विराजमान है। यदि हम जीवनदान देने वाली प्रकृति की रक्षा करेंगे तो इससे जहां एक ओर प्रकृति को सुरक्षा कवच प्राप्त होगा वहीं दूसरी ओर ईश्वर के प्रति हम अपनी आस्था को और भी अधिक मजबूत करेंगे।
दीपावली दीपों का त्योहार है। दीपावली पर हमें कोशिश करनी चाहिए कि यह पर्व हमारे जीवन में सच्चे अर्थों में प्रकाश लेकर आए। दरअसल जब तक हम दीपों के साथ-साथ अपनी इच्छा शक्ति के प्रकाश से प्रदूषण रूपी अंधकार को मिटाने के लिए कृतसंकल्प नहीं होंगे तब तक हमें सच्ची खुशी नहीं मिल सकती।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि हम दीपावली के पावन पर्व पर पटाखों के धूम-धडाकों के बीच उस प्रदूषण रूपी अंधकार की आहट नहीं सुन पाते जो तेजी से हमारे जीवन को अपने शिकंजे में कसने के लिए चला आ रहा है। क्या इस मुद्दे पर समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? अब समय आ गया है कि हम धर्म को पटाखों और जहरीले धुंए से न जोड़ें । दीपावली और उसके बाद हुआ वायु प्रदूषण यह बता रहा है कि हम एक अंतहीन अंधकार के चक्रव्यूह में फंसने जा रहे हैं ।
हमें इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने की जरूरत है। अपने दिमाग की खिड़कियां खोलकर ही हम इस चक्रव्यूह से बाहर निकल सकते हैं। हमें इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि एक-दो दिल पटाखे जलाने से क्या होगा।