भारत में आर्सेनिक संकट: हिमालयी भू–रसायन, गंगा मैदानी तलछट और मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा
भारत में आर्सेनिक संकट: हिमालयी भू–रसायन, गंगा मैदानी तलछट और मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

भारत में आर्सेनिक संकट: हिमालयी भू–रसायन, गंगा मैदानी तलछट और मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

WHO, भारत सरकार और वैज्ञानिक रिकॉर्ड के आधार पर 2047 का विज़नरी विश्लेषण

अजय सहाय

विश्व स्तर पर वैज्ञानिकों और भारत सरकार के जल विशेषज्ञों की राय को जोड़कर देखें तो यह बात स्पष्ट होती है कि भारत के भूजल में आर्सेनिक (Arsenic) की अधिकता मुख्यतः प्राकृतिक (geogenic) कारणों से है, न कि इस अर्थ में कि बरसात के पानी के साथ बहुत-सा आर्सेनिक सीधे आसमान से गिर रहा है; बल्कि हिमालयी क्षेत्र की चट्टानों और गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना (GBM) नदी प्रणाली द्वारा लाए गए तलछटों में मौजूद आर्सेनिक समय के साथ भूजल में घुलकर बाहर आ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की फैक्ट शीट के अनुसार आर्सेनिक पृथ्वी की पर्पटी का स्वाभाविक घटक है, जो हवा, पानी और मिट्टी में सूक्ष्म मात्रा में हर जगह फैला होता है, लेकिन इसका अकार्बनिक रूप (inorganic arsenic) अत्यंत विषैला माना जाता है और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है।

WHO ने पेयजल में आर्सेनिक की मार्गदर्शक सीमा 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर (0.01 mg/L) तय की है और साफ कहा है कि व्यवहारिक कठिनाइयों के बावजूद इसे यथासंभव इस स्तर से नीचे रखा जाना चाहिए।

भारत में भी BIS मानक IS 10500:2012 के तहत पहले 0.05 mg/L को सीमा माना जाता था, लेकिन 2012 में “वांछनीय सीमा” को 0.01 mg/L कर दिया गया और 2015 की संशोधित अधिसूचना में अधिकतम अनुमेय सीमा भी 0.01 mg/L कर दी गई, यानी आज भारत की सरकारी भाषा में भी सुरक्षित पेयजल के लिए आर्सेनिक की अधिकतम सीमा WHO के बराबर 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर ही मानी जा रही है।

भारत के केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय और CGWB (Central Ground Water Board) के आंकड़े बताते हैं कि आर्सेनिक प्रदूषण कोई छोटा स्थानीय संकट नहीं बल्कि एक व्यापक भूजल-संकट है।

CGWB की हाल की राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार 2024 की मॉनिटरिंग में लिए गए नमूनों में से लगभग 3.55% नमूनों में आर्सेनिक सुरक्षित सीमा से ऊपर पाया गया और आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट व अन्य भारी धातुओं के साथ मिलकर कई राज्यों में भूजल की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए उत्तरों और MoHFW (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय) की “Guidelines on Arsenicosis” के अनुसार भारत में आर्सेनिक की समस्या सबसे पहले 1980 के दशक में पश्चिम बंगाल में सामने आई, और बाद में बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, झारखंड, पंजाब, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, मणिपुर सहित कई राज्यों के भूजल में 0.01 mg/L से अधिक आर्सेनिक दर्ज किया गया।

विशेष रूप से गंगा मेघना ब्रह्मपुत्र मैदान (GMB plains) – जिसमें गंगा का मध्य मैदान (Middle Ganga Plain) भी शामिल है – को वैज्ञानिक “आर्सेनिक हॉट-स्पॉट” मानते हैं; नयी शोध-समीक्षाएँ दिखाती हैं कि GBM मैदान की युवा (Holocene) जलोढ़ मिट्टियाँ हिमालय से लाए गए लौह-समृद्ध तलछटों से बनी हैं, जिनमें आर्सेनिक-युक्त खनिज (जैसे आर्सेनोपायराइट, बायोटाइट आदि) सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहते हैं, और बाद में कार्बनिक पदार्थ-समृद्ध, ऑक्सीजन-हीन (reducing) परिस्थितियों में ये खनिज घुलकर भूजल में आर्सेनिक छोड़ते हैं।

यही कारण है कि गंगा किनारे का एक “विशेष बेल्ट” – विशेषकर पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का हिस्सा – दुनिया के सबसे अधिक आर्सेनिक-प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता है; उदाहरण के लिए बिहार के मध्य गंगा मैदान पर किए गए अध्ययनों में यह पाया गया कि कई गाँवों के 50–60% से अधिक नलकूपों में आर्सेनिक 50 µg/L से भी ऊपर था, और कुछ जगहों पर यह 300 µg/L से अधिक तक पहुँचा जो सीधे त्वचा के घाव और कैंसर जैसे रोगों से जुड़ा स्तर है।

इस वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के आधार पर आपके सवाल—“क्या यह सब प्रकृति से ही बरसात के पानी के साथ आ रहा है, या हिमालय में कोई खास पत्थर है जो बारिश के साथ आर्सेनिक छोड़ता है”—का उत्तर यह है कि आर्सेनिक का मूल स्रोत प्रकृति ही है, पर उसका रास्ता “बारिश का पानी → मिट्टी → भूजल” है, न कि सीधे “बारिश का पानी → नल का पानी”।

बादल से गिरने वाले वर्षा-जल में सामान्यतः आर्सेनिक की मात्रा बहुत ही सूक्ष्म होती है, जो हवा की पृष्ठभूमि-एकाग्रता पर निर्भर करती है; यह स्तर WHO या BIS की 10 µg/L सीमा के बहुत नीचे होता है, इसलिए सामान्य वर्षा-जल को हम व्यावहारिक रूप से “आर्सेनिक-मुक्त” ही मान सकते हैं।

असली समस्या तब शुरू होती है जब यह वर्षा-जल हिमालय से आई आर्सेनिक-युक्त जलोढ़ परतों, गंगा-ब्रह्मपुत्र की तलछट, या कुछ स्थानों पर सल्फाइड-खनिजों वाली चट्टानों से लंबे समय तक संपर्क में रहता है; उच्च भूजल-निकासी, कार्बनिक पदार्थ की अधिकता और ऑक्सीजन की कमी मिलकर लौह-ऑक्साइड से बंधे आर्सेनिक को घुलनशील अकार्बनिक रूप (As(III), As(V)) में भूजल में छोड़ देते हैं, जो फिर हैंडपंपों और ट्यूबवेलों के माध्यम से पीने के पानी तक पहुँचता है।

इस अर्थ में आप यह कह सकते हैं कि “हिमालय की चट्टानें और गंगा की जलोढ़ मिट्टियाँ ही असली ‘स्टोर’ हैं, लेकिन बरसात केवल एक ट्रिगर है; कोई एक जादुई ‘पत्थर’ नहीं, बल्कि पूरे तलछटी तंत्र में फैला हुआ भू-रसायन इसका कारण है।”

जहाँ तक यह सवाल है कि “क्या दिन-प्रतिदिन पानी में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ रही है?” – इसका उत्तर एक ही लाइन में “हाँ” या “ना” कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि यह स्थान-विशेष, भूजल-दोहन, जलस्तर, और प्रबंधन-नीतियों पर निर्भर करता है।

कुछ अध्ययन दिखाते हैं कि जहाँ-जहाँ गंगा मैदान में गहरे बोरवेलों से बड़े पैमाने पर पम्पिंग हुई, वहाँ जलस्तर नीचे जाने के साथ-साथ ऑक्सीजन-हीन परिस्थितियाँ बढ़ीं, जिससे समय के साथ आर्सेनिक के घुलने की दर भी बढ़ सकती है; कई गाँवों में 10–20 साल के अंतराल पर किए गए सर्वे में कुछ नलकूपों में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ती और कुछ में घटती भी पायी गई, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि स्थानीय भूजल-प्रवाह और रसायनिकी लगातार बदलते रहते हैं।

दूसरी तरफ, सरकारी डेटा से यह भी दिखता है कि मॉनिटरिंग बेहतर होने के कारण और BIS सीमा 0.05 से घटकर 0.01 mg/L होने के कारण आज हमें पहले से कहीं अधिक “आर्सेनिक-प्रभावित बस्तियाँ” दिख रही हैं; इसका मतलब यह नहीं कि प्रकृति ने अचानक आर्सेनिक दुगुना कर दिया, बल्कि यह कि हमारा “माप-दंड” अधिक संवेदनशील हो गया है।

जल जीवन मिशन (JJM) की रिपोर्टों के अनुसार 2019 के आसपास देश में 14,000 से अधिक ग्रामीण बस्तियाँ आर्सेनिक-प्रभावित दर्ज थीं, जबकि 2025 तक पाइप्ड जल योजनाओं और वैकल्पिक सुरक्षित स्रोतों के कारण इन्हें घटाकर लगभग 314 बस्तियों तक लाने में सफलता मिली है – यानी प्रबंधन के सही कदम उठाने पर जोखिम घटाया जा सकता है, भले ही भूगर्भीय स्रोत वही रहें।

बिहार का हालिया आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 भी यह चेतावनी देता है कि राज्य के 20 जिलों की हजारों ग्राम-वार्डों में भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, यूरेनियम और नाइट्रेट अनुमेय सीमा से ऊपर हैं, और यह स्थिति अत्यधिक भूजल दोहन, रासायनिक उर्वरकों-कीटनाशकों के उपयोग, औद्योगिक अपशिष्ट और जलवायु परिवर्तन जैसी मानवीय गतिविधियों से और गंभीर हो रही है।

इसलिए व्यापक तस्वीर यह है कि – मूल स्रोत प्राकृतिक (geogenic) हैं, लेकिन मानवीय दबाव और जल प्रबंधन की गलतियाँ इस प्राकृतिक जोखिम को “क्रॉनिक पब्लिक-हेल्थ डिज़ास्टर” में बदल रही हैं।

अब आपके सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर आयें – “क्या पानी में कुछ मात्रा में आर्सेनिक होना ‘ज़रूरी’ या ‘फायदेमंद’ है? क्या आर्सेनिक मानव शरीर के लिए कोई अनिवार्य (essential) तत्व है?” – तो WHO और भारत सरकार दोनों के सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण में आर्सेनिक को “टॉक्सिक तत्व” के रूप में माना गया है, और पेयजल में किसी प्रकार की “लाभकारी” सीमा निर्धारित नहीं की गयी; केवल अधिकतम सह्य सीमा (10 µg/L) तय की गई है जिसे पार नहीं करना चाहिए।

लंबे समय तक 50–100 µg/L या उससे अधिक आर्सेनिक वाले पानी का सेवन करने से आर्सेनिकोसिस नामक रोग होता है, जिसमें त्वचा का काला-सफेद धब्बेदार होना (pigmentation), हथेलियों और तलवों पर मोटी चर्म-परत, शुष्कता, नाखून की विकृति, तंत्रिका-तंत्र की समस्या, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह, फेफड़े-मूत्राशय-किडनी-लिवर के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ शामिल हैं।

कुछ पुराने जैव-रसायन शास्त्रीय अध्ययनों में जानवरों (चूहे, बकरी, मुर्गी आदि) पर यह संकेत मिले थे कि अत्यंत सूक्ष्म मात्रा (टॉक्सिक स्तर से बहुत कम) पर आर्सेनिक संभवतः किसी “ट्रेस एलीमेंट” की तरह जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभा सकता है; इन प्रयोगों में जब डाइट से आर्सेनिक को पूरी तरह हटा दिया गया तो प्रजनन-समस्या और विकास-विकलांगता जैसी दिक्कतें दिखीं, और थोड़ी सी मात्रा वापस देने पर ये लक्षण सुधर गए।

लेकिन मनुष्यों के लिए अभी तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि हमें जानबूझकर आर्सेनिक पीना चाहिए या इसकी “कमी” से कोई रोग होता है; उल्टा, नवीनतम विषविज्ञान-समीक्षाएँ यह बताती हैं कि भोजन और पानी के माध्यम से जो आर्सेनिक शरीर में प्रवेश कर रहा है, वही कई देशों में पहले से निर्धारित सुरक्षित सीमा के आस-पास या ऊपर है, और कैंसर जैसी बीमारियों का जोखिम शून्य से शुरू होकर जैसे-जैसे मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे लगातार बढ़ता दिख रहा है।  

यानी कोई स्पष्ट सुरक्षित “थ्रेशहोल्ड” नहीं दिखता। इसलिए WHO, BIS और भारत सरकार की स्वास्थ्य-नीति की भाषा में यह बिल्कुल साफ संदेश है कि – पेयजल में आर्सेनिक “essential nutrient” नहीं, बल्कि “hazardous contaminant” माना जाना चाहिए और इसकी मात्रा को यथासंभव शून्य के निकट तथा 10 µg/L से नीचे रखना चाहिए।

दूसरे शब्दों में बोलें तो – “कुदरत ने अगर मिट्टी और चट्टान में थोड़ी मात्रा आर्सेनिक रख दी है, इसका मतलब यह नहीं कि हमें उसे गिलास भर-भर कर पीना भी है।” प्रकृति के स्तर पर मिट्टी-पानी-खाद्य-श्रृंखला में ट्रेस आर्सेनिक मौजूद रहेगा, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति-निर्माण का उद्देश्य यह है कि पीने के पानी में इसकी मात्रा को इतना कम रखा जाए कि कोई कैंसर या क्रॉनिक रोग का जोखिम न बढ़े।

इसी सोच के तहत भारत सरकार ने जल जीवन मिशन, राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप-मिशन (Arsenic & Fluoride), और राज्यों की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से – लंबी दूरी से सुरक्षित सतही जल लाने वाले पाइप्ड स्कीम, सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (CWPP).  

घर-आधारित RO/Adsorption यूनिट, आर्सेनिक-मुक्त गहरे एक्विफर से वैकल्पिक बोरवेल, और हिमालयी व गैर-हिमालयी क्षेत्रों में Source Sustainability व Recharge Works (जैसे चेकडैम, रिचार्ज वेल, परकोलेशन टैंक) – को प्राथमिकता दी है, ताकि भूजल के दूषित हिस्सों पर निर्भरता कम हो और धीरे-धीरे अधिक से अधिक घरों तक BIS-मानक वाला सुरक्षित पेयजल पहुँच सके।

एक “visionary” दृष्टिकोण से, अगर हम 2047 के “जल-आत्मनिर्भर भारत” के सपने के साथ आर्सेनिक-संकट को देखें, तो तीन स्पष्ट दिशा-रेखाएँ बनती हैं –

(1) वैज्ञानिक समझ – स्कूल स्तर से ही बच्चों को यह सिखाना कि आर्सेनिक कोई “जादुई ज़हर” नहीं, बल्कि हिमालयी चट्टानों और गंगा-ब्रह्मपुत्र की तलछट में छिपा प्राकृतिक तत्व है जो गलत तरीके से भूजल दोहन, अंधाधुंध बोरवेल-संस्कृति और खराब शहरी-औद्योगिक प्रबंधन से हमारे गिलास तक पहुँचता है;

(2) प्रबंधन और नीति – गाँव स्तर पर जल-बजट, “एक गाँव – एक सुरक्षित स्रोत” जैसी संकल्पना, आर्सेनिक-फील्ड-किट से नियमित जाँच, हर पाँच-दस साल पर नलकूपों की पुनः-परीक्षा, जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में आर्सेनिक-प्रभावित क्षेत्रों को सबसे ऊपर प्राथमिकता, और बहुत-गहरे एक्विफर या दूरस्थ सतही जल स्रोतों से बड़े पाइप्ड नेटवर्क; तथा (3) जन-भागीदारी – आर्सेनिक-पीड़ित गाँवों के लोगों को रोग-लक्षण, सुरक्षित जल विकल्प, फिल्टर के सही उपयोग तथा किचन-गार्डन, स्थानीय भोजन में वैरायटी बढ़ाने जैसे पोषणात्मक उपायों के बारे में जागरूक करना, ताकि शरीर की संपूर्ण स्वास्थ्य-स्थिति बेहतर रहे और विषाक्तता के प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकें।

WHO, MoHFW और CGWB की रिपोर्टें हमें यह चेतावनी भी देती हैं कि जलवायु परिवर्तन, बाढ़-सूखा चक्र में वृद्धि, और अत्यधिक भूजल-निकासी यदि ऐसे ही जारी रहे, तो आर्सेनिक, फ्लोराइड, यूरेनियम जैसी समस्याएँ और नए क्षेत्रों में फैल सकती हैं; इसीलिए आने वाले दशकों में “केवल नल तक पानी पहुँचाना नहीं, बल्कि नल तक सुरक्षित, आर्सेनिक-मुक्त पानी पहुँचाना” ही असली कसौटी होगी।

संक्षेप में – भारत में पानी में आर्सेनिक की अधिकता का मूल कारण प्रकृति (हिमालयी-गंगा जलोढ़ भू-रसायन) है, लेकिन इसे “प्राकृतिक नियति” मानकर छोड़ देना वैज्ञानिक या नैतिक रूप से सही नहीं; WHO और भारतीय मानकों के अनुसार आर्सेनिक किसी भी रूप में “आवश्यक पोषक तत्व” नहीं, बल्कि एक लंबे समय तक चुपचाप मारने वाला विष है, और हमारी नीतियों, अभियानों और जन-जागरूकता का लक्ष्य यही होना चाहिए कि 10 µg/L की सीमा भी अंतिम लक्ष्य न होकर, उससे भी नीचे की दिशा में लगातार आगे बढ़ें।