अरावली को कटने मरने से बचाना है।
अरावली को कटने मरने से बचाना है।

अरावली को कटने मरने से बचाना है।

कोप 30 से हमारी सरकार एवं उच्चतम न्यायालय को सीख लेना चाहिए।

जलपुरुष राजेन्द्र सिंह

खनन करके अरावली को नंगा करना, जंगल काटना और गैप बनाना बिल्कुल उचित नहीं है। अरावली की परिभाषा को इसी समग्रता से बनाना जरूरी है। 100 मीटर ऊंची ही अरावली है, यह ठीक नहीं है। पर्वतमाला एक ही होती है। मां के गर्भ से निकले पर्वत को गर्भ से लेकर चोटी तक उसके पूरे चरित्र सहित बचाना जरूरी है, उसके पेड़-पौधे, जीव-जंतु और उसकी खेती, वनोषाधियों आदिवासी ,जंगलवासी समुदाय।

सबसे पुराने आदिवासी समुदाय अरावली की चोटियों पर ही मिलते हैं। इनको बचाने के लिए कोप 30 से हमारी सरकार एवं उच्चतम न्यायालय को सीख लेना चाहिए। कोप के निर्णय सभी मानते है। हम भी एसडीजी, कोप जो की संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पहाड़, पर्यावरण और लोगों को संरक्षण प्रदान करने वाली प्रक्रिया है।

हम और हमारी भारत सरकार तथा अरावली से जुड़े चारों राज्य दिल्ली, हरियाणी, राजस्थान, गुजरात भी इस प्रक्रिया अपने लिए जरूरी मानकर चलायें। ऐसा नहीं किया तो आडा पर्वत अरावली तो मरेगा। हम सब की संस्कृति और प्रकृति भी मर जाएगी। आज 11 दिसंबर विश्व पर्वत दिवस पर आडा पर्वत अरावली को बचाने हेतु हम संकल्पित हो रहे है। 

तरुण भारत संघ ने अरावली को बचाने की आवाज सबसे पहले 1980 में जयपुर में बैठक करके झालना डूंगरी के खनन को रूकवाने हेतु उठाई थी। वर्ष 1988 में “नील कंठेश्वर” सरिस्का के जंगल में बैठकर उच्चतम न्यायालय में जाकर खनन रूकवाने हेतु याचिका दायर करने की तैयारी हुई थी। वर्ष1991 में अरावली में हो रहे खनन के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका निर्णय से खनन रूकना शुरू हुआ था। उस जमाने में उच्चतम न्यायालय में इस केस की सुनवाई पूर्व न्यायमूर्ति श्री वेंकट चलैया, पूर्व मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय भारत, ने बहुत ही गंभीरता से ली थी। उन्होंने सरिस्का की 478 खदानों को बंद करने का आदेश दिया था।

पूरी अरावली पर्वतमाला, जो भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला और दुनिया की दूसरी सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में मानी जाती है, जैसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए भारत सरकार ने भी अरावली की आवाज सुनी

और उसके आंसू पोंछने की शुरुआत 7 मई 1992 को हरियाणा-गुडगांव व राजस्थान-अलवर में खनन जैसी सभी गतिविधियों पर रोक से हुई थी।

धीरे-धीरे यह मांग अरावली के चारों राज्यों, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैल गई। 2 अक्टूबर 1993 को हिम्मतनगर, गुजरात से अरावली का सिंहनाद करते हुए यह यात्रा 22 नवम्बर को दिल्ली संसद पहुंची थी। उस समय के संसद अध्यक्ष श्री शिवराज पाटिल को अरावली को बचाने के लिए ज्ञापन दिया गया था।

उन्हें बताया गया कि भारत सरकार ने अरावली के लिए नोटिफिकेशन तो किया है, लेकिन अभी भी अवैध खदानें चल रही हैं। इन अवैध खदानों को बंद कराया जाना जरूरी है। पाटिल साहब ने कहा कि सरकार कोशिश कर रही है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सरकारें होने से कुछ सरकारें खान मालिकों को संरक्षण दे रही हैं, जिससे मुश्किलें खड़ी हो रही हैं।

फिर भी, खदानों को बंद कराकर दुनिया की प्राचीनतम पर्वतमाला अरावली को बचाने का प्रयास अवश्य किया जाएगा। उस समय अरावली ने अपने सिंहनाद से अपने को बचाने की एक प्रक्रिया शुरू करवाई थी। संसद सड़क दोनों स्थानों पर यह काम माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के प्रकाश में किया गया था।

इस सफल उदाहरण की कहानिया मैंने दुनिया के पहाड प्रेमियों को जापान, साउथ अफ्रीका, कोलम्बिया, ब्राजील, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अमेरिका जाकर सुनाई थी। अरावली का गौरव कार्य सब ही जानने के इच्छुक रहते है। क्योंकि यह वैश्विक महत्व की पर्वतमाला है। इसके बदलाव बहुतों की रूचि की विषय है। दुनिया की नजरे भी अरावली  लगी है। 

20 नवंबर 2025 को सम्माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की संपूर्ण पीठ ने जो निर्णय दिया है, उससे अरावली के आंसू दोबारा पोछनें का काम सम्मानीय उच्चतम न्यायालय ने भारत सरकार को ही सौंप दिया है। ये खनन व्यवसाय हितो को ही विस्तार देने में रूचि रखती है। अब अरावली में खनन रोकने का काम भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को करना है। हम उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार का जलवायु परिवर्तन, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अरावली की पुकार सुनेगा और उसके आंसू पोंछेगा। इनके एफिडेबिट और अधिकारियों की टिप्पणी से हमारी शंकाएं बढ़ गई है। अब हमें सरकार पर ज्यादा विश्वास नही हैं।

अरावली एक ही पर्वतमाला है। उसको ऊंच-नीच में बांटकर नष्ट करने की स्पष्ट योजना दिखायी दे रही है। इसके पीछे शक्तिशाली खनन उद्योग पति ही है।

अरावली विखंडित नहीं है। अरावली धरती मां के गर्भ से निकली एक समग्र पर्वतमाला है। मां के गर्भ से निकला एक ही शरीर का आडा पहाड़ अरावली ही है। उसे बड़ा-छोटा कहकर अलग-अलग परिभाषित नहीं किया जा सकता। एक शरीर होता है, जिसके सभी अंगों का समान रूप से पोषण एवं व्यवहार होता है।

सरकार खनन उद्योग में लगे उद्योगपति अरावली की पीड़ा को अपने शरीर की पीड़ा समझकर दुनिया की प्राचीनतम् अरावली पर्वतमाला को बचाये सभी मिलकर बचायेंगे तो ही हम सभी बचेंगे। परंतु अब सरकार एवं खनन उद्यमियों पर भरोसा नहीं है। वे अपना भविष्य आडा अरावली में साझा नहीं देखते है।

इनके मन में तो अरावली पर अतिक्रमण से खनन द्वारा प्रदूषण और अरावली के सम्पूर्ण संसाधन मानव और प्रकृति का शोषण ही चल रहा है। इसलिए अरावली के बेटों और बेटियों को संगठित होकर इसे रोकने का प्रयास तत्काल प्रभाव से शुरू करना ही होगा। तभी अरावली एवं दुनिया के पहाड़ बचेंगे। आज 11 दिसंबर को हम सब अरावली बचाने हेतु संकल्पित होते है।

आडा पहाड़ अरावली विरासत जन अभियान चलाएंगे। 

आडा पहाड़ को कटने मरने से बचाएंगे। 

नोट- अरावली को संरक्षित करने के लिए हुए आंदोलन की पुस्तकों की लिंक दी जा रही है। जिसे क्लिक करके फ्री पढ़ सकते है-

1.अरावली का सिंहनाद- 

https://commons.wikimedia.org/wiki/File:%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A6.pdf

1.अरावली के आंसू-  

https://commons.wikimedia.org/wiki/File:%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%81%E0%A4%B8%E0%A5%82.pdf