अरावली पहाड़ की पीड़ा विश्व के पहाड़ों की पीड़ा हैं
अरावली पहाड़ की पीड़ा विश्व के पहाड़ों की पीड़ा हैं

अरावली पहाड़ की पीड़ा विश्व के पहाड़ों की पीड़ा हैं

अरावली संपूर्ण रूप में गुजरात से दिल्ली तक एक पर्वत माला है।

जलपुरुष राजेन्द्र सिंह

संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व पहाड़ दिवस हर वर्ष 11 दिसंबर को मनाता है। जिन राष्ट्रों की न्यायपालिका और लोकतांत्रित सरकारें पहाड़ों की पीड़ा की अनदेखी करके नष्ट कर रही है। उनके लिए भी कोप में कुछ विश्व घोषणायें करता है। इस वर्ष 20 नवम्बर 2025 को कोप 30, बेलेम ब्राजील में बहुत अच्छे निर्णय लिए है। खासकर पहाड़ और जंगलों को बचाने वाले देश सम्मानित होंगे। पहाड़ों व वनों की अनदेखी करने वाले देशों को दण्डित किया जायेगा।

इसी दिन भारत के उच्चतम न्यायालय ने अरावली को नष्ट कराने का निर्णय सुनाया है। भारत सरकार एवं उच्चतम न्यायालय को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार जरूरी हो गया है। भारत को अब तक के कोप में प्रस्तुत पर्यावरण की प्रतिबद्धता एवं अपने संकल्पों को भी मुड़कर देखना होगा। हम अपने प्रकृति संस्कृति के साथ संकल्प पुरे करके ही विश्वगुरु बने थे।  

उच्चतम न्यायालय ने भारत सरकार को निर्देश दिया है। अरावली संपूर्ण रूप में गुजरात से दिल्ली तक एक पर्वत माला है। इसे राज्यों की सीमाओं में बाँट कर नहीं देखे। इसे समग्रता में देखना है। लेकिन 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में खनन की छूट देकर स्वयं ने ही अरावली को बांटकर टुकडों-टुकड़ों में बांट दिया है। भारत और दुनिया की पर्वतमालाओं को नष्ट करने वाला भारत और दुनिया के पर्वतों के लिए घातक निर्णय है।

हम आज 11 दिसबंर विश्व पर्वत दिवस पर अपनी सरकार और उच्चतम न्यायालय से याचना-प्रार्थना करते है कि, इस निर्णय पर पुर्नविचार करे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया भर के पहाड़ों को बचाना असंभव होगा। भारत की बदनामी हो सकती है। प्रकृति-संस्कृति को बचाने वाले देश ने ही अपने पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति को नष्ट करने की पहल की है। 20 नवंबर का उच्चतम न्यायालय का निर्णय माना जा  सकता है। यही हमारे देश की बदनामी का कारन बन सकता है। 

पूरी दुनिया का मानना है कि पर्वतमालाएं धरती के गर्भ से निकलती हैं। सम्पूर्ण एक पर्वतमाला की पारिस्थितिकी एकसमान रूप में बचानी होती है। संपूर्ण भूभाग, चाहे धरती के भीतर हो या बाहर, एक जैसा संरक्षण मांगता है। इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने अरावली के 100 मीटर उंचे हर हिस्से को उसकी सीमाओं में खनन नहीं करने के लिए व्यवस्था बनाने का 6 माह का समय दिया है। इस पर इस समय सीमा से पूर्व ही विचार करके अरावली को खनन-मुक्त रखना ही भारत की विरासत बचाना जरुरी और ज्यादा महत्वपूर्ण है। 

अरावली में कई अच्छे और महत्वपूर्ण खनिज हैं; जिन खनिजों की देश को राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु आवश्यकता है। एटमिक राष्ट्रीय सुरक्षा महत्व हेतु खनन की उनको उच्चतम न्यायालय ने छूट दी है अरावली के लोगो की मान्यता है की सामान्य खनिजों के लिए अरावली को काटना, जंगल नष्ट करना और पर्वतमाला में नए घाव बनाना किसी भी रूप में उचित नहीं है। अरावली के खनन की छूट एक ही उद्द्यमी को ध्यान में रखकर दी गयी है।

कोप 30 बेलेम, ब्राजील ने भी वर्षा वन के संरक्षण एवं वनवासियों के निर्णय में भागीदार बनाने की व्यवस्था आज के ही दिन बनायी है। यह पहाड़ों के वन और उनकी प्रकृति व संस्कृति बचने की बहुत ही अच्छी पहल की है। आज विश्व पर्वत दिवस पर हम सब कोप 30 के निर्णय का स्वागत करते है। 

20 नवंबर 2025 को ब्राजील कोप 30 में दुनिया के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भविष्य की चिंता में एकत्र हुए। इस बार ब्राजील के राष्ट्रपति ने स्वयं कहा कि उनके देश के अमेजोन वर्षा वन और पहाडों का बड़ा नुकसान खनन से हुआ है। इस नुकसान के प्रमाण दुनिया को दिखाने के लिए कोप को अमेजन फॉरेस्ट के केंद्र बेलम में आयोजित किया गया है। इस बार का कोप जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भावी संकट का एक बहुत बड़ा प्रमाणं  है।

कोप 30 ने निर्णय लिया कि आदिवासी हित के हिस्से का सारा पैसा सीधे आदिवासी संगठनों को दिया जाएगा, कोई सरकार बीच में नहीं रहेगी। आदिवासी स्वयं अपने पहाड़ जंगल और अपने आवास बचाने के निर्णय करेंगे। जर्मनी ने ब्राजील के नए वैश्विक वर्षावन कोष में दस वर्षों में एक अरब यूरो देने का वादा किया है। यह कोष उपग्रह निगरानी के आधार पर वनों-पहाड़ों को बचाने वालों को पुरस्कार और अधिक कटाई करने वालों पर दंड का प्रावधान करता है। जर्मनी के मंत्रियों ने जंगल व पहाड़ों को धरती के “फेफड़ों” उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की रक्षा का सवाल बताया है। अरावली के आदिवासियों का अब क्या होगा ?

ब्राजील का अनुमान है कि यह कोष आगे चलकर 125 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। वर्षावन, जिन्हें धरती के “हरे फेफड़े” कहा जाता है, खेती और खनन के दबाव से संकट में हैं। नॉर्वे तीन अरब डॉलर और ब्राजील व इंडोनेशिया एक-एक अरब डॉलर देने का वादा कर चुके हैं। इस पहल में कई वर्षावन देश शामिल हैं और इसकी देखरेख एक संयुक्त समिति करेगी।

लगभग 70 देशों को इससे लाभ मिल सकता है, बशर्ते कम से कम 20 प्रतिशत धन आदिवासी और पारंपरिक समुदायों तक पहुंचे। अब तक 53 देश इसका समर्थन कर चुके हैं, और ब्राजील को उम्मीद है कि समृद्ध देश 25 अरब डॉलर की शुरुआती सहायता देंगे। ये सभी प्रयास पर्वत और उनके वनों को बचाने की दिशा में 20 नम्बवर 2025 को लिए गए निर्णय है। इनके विपरीत भारत के उच्चतम् न्यायालय का निर्णय दुनिया के पर्वत की प्रकृति संस्कृति बचाने वालों की चिंता बढ़ा रहा है। 

पर्यावरण और भविष्य की चिंता करने वाले मित्रों ने उच्चतम न्यायालय और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों में अरावली को बचाने की आवाजें उठाईं। इन याचिकाओं के परिणामस्वरूप चारों राज्यों की अरावली का एक समग्र दर्शन सामने आया, जिससे हम बहुत आनंदित थे। उच्चतम न्यायालय ने पहले  कहा कि अब आगे कोई नई खनन लीज नहीं दी जाएगी। यह बेहद सम्माननीय फैसला है। जिनसे अरावली के कुछ आंसू पोंछने की कोशिश शुरू हो सकती थी। 

अब नई परिभाषा से अरावली के आंसू के पोछनें की बजाये और अधिक गहरे और तेज कर दिए है शुरुआत करेगी। अरावली के आंसू अब कभी रुकेंगे?। हमे शंकायें है; क्योंकि जिस प्रकार से यह निर्णय आया है, इसके पीछे खनन उद्यमियों का भारत सरकार के ऊपर बढ़ा गहरा प्रभाव दिखता है। भारत सरकार ने हमारे उच्चतम न्यायालय में जो ऐफिडेविट दिए है, वे इस बात के स्पष्ट प्रमाण है। पूरी अरावली चंद खनन उद्यमियों के हाथों में देने की योजना बन गई है। 

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि, सौ मीटर ऊंची अरावली में खनन नहीं होगा और सौ मीटर से नीचे की अरावली पर भारत सरकार विचार कर सकती हैं। यह फैसला 1990 की याद दिलाता है, जब अरावली में वैध और अवैध 28 हजार से अधिक खदानें चलती थीं। इन खदानों को बंद कराने के लिए तरुण भारत संघ की पहल और उसके आधार पर जारी नोटिफिकेशन को लागू करवाने के लिए मैने 2 अक्टूबर 1993 को हिम्मतनगर गुजरात से दिल्ली तक पदयात्रा की थी।

भारत सरकार ने इस आवाज को गंभीरता से सुना, खदानें बंद हुईं और अरावली पुनर्जीवित होने लगी थी। 2025 वर्ष आते-आते बहुत सी जगहों पर अवैध खदानें फिर चालू हो गईं। जहां खदानें चलीं, वहां अरावली नष्ट होने लगी, जल संकट और जलवायु संकट गहराने लगे, भूजल भंडार खाली होते गए। फरीदाबाद, नूह, गुरुग्राम इसके उदाहरण हैं। अलग-अलग समय पर वैध-अवैध सभी तरह की खदानें धीरे-धीरे फिर चलने लगीं और संकट खड़ा करती रहीं।

राजस्थान में कई साथियों ने याचिका दायर करके रूकवाने की लड़ाई जारी कर दी। हरियाणा-दिल्ली, राजस्थान गुजरात में अब पुनः नए सिरे से लड़ाई खड़ी हो रही है। यह अब तेज होगी। कई साथियों ने समय-समय पर पदयात्राएं करके खनन रूकवाने की पहल करी है। 7 दिसंबर 2025 जयपुर सम्मेलन के निर्णय से “अरावली विरासत जल अभियान” पुनः अपने पहाड़ों को बचाने हेतु शुरू हो गया है।