अरावली विरासत बचाओ अभियान की विश्व पर्वत दिवस पर शुरुआत
अरावली विरासत बचाओ अभियान की विश्व पर्वत दिवस पर शुरुआत

अरावली विरासत बचाओ अभियान की विश्व पर्वत दिवस पर शुरुआत

सृष्टि को चलाने वाले भगवान ही प्रकृति हैं और मानवीय व्यवहार ही संस्कृति है।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह

दुनिया की प्राचीनतम आड़ी पर्वतमाला, 692 किलोमीटर लंबी भारत की रीढ़, को बचाने का प्रयास करें तो पूरी दुनिया उसे बचाने में हमारे साथ आ सकती है। इसे हरा-भरा बनाने में जापान ने भारत सरकार को बहुत मदद की थी। दुनिया के बहुत से देशों ने अपनी विरासत खोई है; भारत अपनी विरासत के प्रति जागरूक देश है। यही संस्कृति-प्रकृति का बहुत गहरा योग था। इसकी गहराई में केवल मानव और इसे बनाने वाले पंचमहाभूत—भ+ग+व+अ+न, भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर—के योग के सिद्धांत की पालन-प्रणाली थी।

सृष्टि को चलाने वाले भगवान ही प्रकृति हैं और मानवीय व्यवहार ही संस्कृति है। भगवान—प्रकृति और मानव व्यवहार—संस्कृति ही हैं। इसी मान्यता ने हमारी पर्वतमाला अरावली को अभी तक कुछ सीमा तक बचाए रखा है। यही भारतीय आस्था, भारत की प्रकृति-संस्कृति के योग से, पर्यावरण संरक्षण बनाए रखती आई है; जबकि दुनिया में ऐसी बहुत सी घटनाएँ हुई हैं जहाँ विकास के नाम पर भारत से अधिक विनाश हुआ है। अब भारत में लालची विकास की गति तेज हो गई है।

विकास के नाम पर ऐसे विनाश मैंने देखे हैं, जैसे अमेरिका, कैलिफ़ोर्निया की ओंस वैली की पहाड़ियाँ, अफ्रीका और मध्य एशिया। भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान में इस प्रकार के दुष्प्रभावों के शिकार बने बहुत से पहाड़ हमारे सामने हैं। अब अरावली भी ऐसा ही नया क्षेत्र बनेगा। अरावली का दर्द बड़ा है; इसे पहचानें।

अरावली का दर्द हम अपना दर्द मानते हैं। अरावली का दर्द हमारे लिए रह गया दर्द है। लालची उद्यमियों द्वारा दिया गया अरावली का दर्द हमारे जीवन की साँसों का संकट बनेगा। पर्यावरण-प्रदूषण और खनन द्वारा हमारे स्वास्थ्य-सुरक्षा को नष्ट कर देगा। भूजल-भंडार बिगड़ेंगे तो हमारी नदियाँ मरेंगी, सूखेंगी।

अरावली सीधी दरारों वाली पर्वतमाला है। यह वर्षा-जल से भूजल-भंडार का पुनर्भरण करती है। इसी अरावली के गुण-स्वरूप, मैंने पिछले 50 वर्षों में 23 नदियों को शुद्ध, सदानीरा और पुनः जीवित कर पाया हूँ। खनन बंद होने पर मुझे यह सफलता मिली है कि अरवरी, भगाणी, सरसा, शेरनी, जहाजवाली, महेश्वरा जैसी नदियाँ पुनः पुनर्जीवित बन सकी हैं।

अब पूरी अरावली में खनन होगा तो इसकी सभी नदियाँ सूखेंगी। नदियाँ सूखना अर्थात सभ्यता का मरना। अरावली की सभ्यता को जिंदा रखने का दर्द अरावली को होगा। अरावली के लोगों को पेयजल संकट का सामना करना होगा। अरावली के चारे, ईंधन, अन्न का संकट बढ़ेगा।

खनन के मलबे से खेती पर बहुत बुरा असर होगा। इस क्षेत्र को अनेक संकटों का सामना करना पड़ेगा। खनन जंगली जीवों के आवास, उनके सहवास-स्थल तथा गलियारे (कॉरिडोर) को नष्ट कर देता है। जैव-विविधता का संकट बढ़ेगा। एक तरफ जिन जंगलों और जंगली जीवों को बढ़ाने पर हमारा करोड़ों खर्च हो रहा है, वहीं हम खनन द्वारा उन्हें नष्ट करने की तैयारी कर रहे हैं। अरावली की जड़ी-बूटियाँ खनन से समाप्त होंगी।

अरावली का आरोग्य-रक्षण संकट में पड़ेगा। अरावली का नंगा होना तापमान बढ़ा देगा; जलवायु-परिवर्तन की आपदा आएगी। बेमौसम वर्षा से हमारा सब कुछ प्रभावित होगा। ये सभी संकट अरावली में खनन के कारण देखे जा सकते हैं।

खनन रुकने से 35 वर्ष में जलवायु-परिवर्तन अनुकूलन और उन्मूलन का यह उदाहरण केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अकेला है। हमें लालची आर्थिक क्षेत्र के विकास, विस्थापन, बिगाड़, विनाश, प्रदूषण, अतिक्रमण, शोषण के नंगे नृत्य से सीख लेने की आवश्यकता है। नंगा नृत्य भारत में कहीं भी, किसी भी रूप में अच्छा नहीं माना जाता।

20 नवंबर 2025 को जो करवाया गया है, वह सरकारों का नंगा नृत्य ही है। खुद न करके किसी दूसरे को तैयार करना बड़ा विनाशक षड्यंत्र है। यह षड्यंत्रकारी खेल देखकर अरावली के आँसू बह रहे हैं। दर्द में अरावली के आँसू निकलते हैं। यह दर्द कई प्रकार का है—हरियाली का कम होना, जीवों का मरना, अन्न-जल की कमी होना, प्रदूषण से बीमारी का बढ़ना।

अरावली का खनन अरावली की उपजाऊ भूमि को रेगिस्तान में बदलेगा। दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश तथा पंजाब में भी रेगिस्तान का विस्तार होगा। इस विषय में प्रोफेसर डाबरिया की बहुत विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार अरावली में 22 गैप हैं। हमने 1992 में उच्चतम न्यायालय को यह रिपोर्ट दी थी। तभी उच्चतम न्यायालय ने भारत सरकार को अरावली पर्वतमाला को संवेदनशील पर्वतमाला घोषित कराया था। अब पुनः इसे खोला जाने की सम्भावनाएँ बढ़ गई हैं। ऐसा हुआ तो फिर रेगिस्तान बढ़ने से पूरे भारत का दर्द बढ़ेगा।

अरावली भारत की विरासत है। भारत को पूरी दुनिया कहेगी कि भारत अपनी विरासत को बचाने में सक्षम नहीं है; उसने अपनी पहचान—अरावली—को नष्ट करवा दिया है। यही अरावली का सबसे गहरा घाव और दर्द पूरे भारत को पीड़ित करेगा। इसलिए आज हम सभी संगठित आवाज देकर अरावली विरासत को बचाएँ।