संकट में ‘शांग्री-ला‘: अनियंत्रित पर्यटन और लद्दाख का सुलगता पर्यावरण
पंकज चतुर्वेदी
लेह प्रशासन बड़े गर्व से बताया रहा है कि पिछले साल की तुलना में इस बार लेह-लद्दाख में 44 फीसदी अधिक पर्यटक आए । पिछले साल जनवरी से मई के बीच जहां 81,827 पर्यटक आए ही, इस साल यह संख्या 1,17,546 हो गई । हिमालय की गोद में बसा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख पिछले कुछ सालों में एक बड़े वैश्विक पर्यटन स्थल के रूप में उभरा है। हर साल गर्मी का मौसम आते ही यहाँ सैलानियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। देश और दुनिया के कोने-कोने से आने वाले पर्यटकों की बढ़ती संख्या और उनके यहाँ रुकने की लंबी अवधि ने निस्संदेह स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है और प्रदेश की आमदनी में उल्लेखनीय इजाफा किया है। लेकिन इस आर्थिक समृद्धि के पीछे एक ऐसा स्याह सच भी छिपा है, जो लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए किसी गंभीर खतरे से कम नहीं है। विडंबना यह है कि जिसे कभी ‘शांग्री-ला’ यानी पृथ्वी का स्वर्ग कहा जाता था, वह आज अनियंत्रित पर्यटन के कारण उपजे कचरे, पानी की किल्लत, बिजली के संकट और वाहनों के धुएं से हांफ रहा है। इस बढ़ते पर्यावरणीय भार का सबसे बड़ा हिस्सा लद्दाख के मुख्य शहर लेह को उठाना पड़ रहा है, जहां पर्यटन का यह दबाव स्थानीय बुनियादी ढांचे और प्राकृतिक संसाधनों को सोख रहा है।
लेह- लद्दाख में लगभग 670 होटल बन गए हैं और इनमें से 60 फीसदी लेह शहर में है । चूंकि अधिकांश पर्यटक सबसे पहले लेह ही आते है और उन्हें कम से कम दो दिन वहीं रुकने की सलाह दी जाती है ताकि उनका शरीर वहाँ के परिवेश के अनुरूप खुद को ढाल सके , सो लेह पर वहाँ की मूल आबादी से तीन गुना बाहर से आए लोगों का बोझ सदा बना रहता है, जिनमें 50 हजार तो प्रवासी मजदूर ही हैं । जान लें इस इलाके में कहीं हरियाली दिखती नहीं। यह बर्फ़ीला रेगिस्तान है। समुद्र तल से कोई 11 हजार फुट ऊपर बसे लेह में यहाँ सालाना बारिश मात्र 10 सेंटीमीटर है । लेह शहर में सिंधु नदी से पानी की आपूर्ति होती है लेकिन इतने सारे होटल बोर वेल पर निर्भर हैं। लद्दाख इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। शीत मरुस्थल होने के कारण लद्दाख हमेशा से पानी के लिए ग्लेशियरों के पिघलने और सीमित बर्फबारी पर निर्भर रहा है। पारंपरिक रूप से लद्दाख के लोग शुष्क शौचालयों का उपयोग करते थे, जिसमें पानी की आवश्यकता नहीं होती थी। लेकिन पर्यटकों की आधुनिक सुविधाओं और होटलों की मांग के कारण पारंपरिक व्यवस्था की जगह ‘फ्लश टॉयलेट’ ने ले ली है। एक स्थानीय लद्दाखी जहां गर्मियों में औसतन 21 लीटर पानी का उपयोग करता है, वहीं एक पर्यटक प्रतिदिन करीब 75 लीटर पानी सोख लेता है। लेह में होटलों और गेस्ट हाउसों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिन्होंने पानी की भारी मांग को पूरा करने के लिए अंधाधुंध कमर्शियल बोरवेल खोद डाले हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लेह का भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा रहा है और प्रशासन को पानी की राशनिंग करने के साथ-साथ टैंकरों के जरिए जलापूर्ति करनी पड़ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण कम होती बर्फबारी और पर्यटन के अत्यधिक दबाव ने पानी की इस कमी को जीवन-मरण का प्रश्न बना दिया है।
सभी होटल्स ने बाथरूम में सोलर ऊर्जा से चलने वाले हीटर लगा रखे हैं और सुबह गरम पानी की आस में कम से कम दस बाल्टी ठंडा पानी नाली में बहाना आम बात है । इस पानी की बर्बादी से लेह का पाताल जल संकट गहराता जा रहा है । यही नहीं इसका विपरीत असल हिम-पहाड़ों से आने वाले सरिताओं पर भी पड रहा हैं ।
यह किसी से छुपा नहीं है कि पर्यटन बढ़ने से हिमालय के पहाड़ों पर कचरे का संकट बढ़त है । हालांकि अभी लेह प्रशासन ने समूचे इलाके में सिंगल यूज प्लास्टिक पर पाबंदी के आदेश जारी किये है लेकिन अभी उसका कोई जमीनी असर दिख नहीं रहा ।
लेह म्युनिसिपल कमिटी के आंकड़े बताते हैं कि पर्यटन सीजन के दौरान लेह के 13 वार्डों से प्रतिदिन करीब 12 से 13 टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमें 9 से 10 टन सूखा कचरा और दो से तीन टन गीला कचरा होता है। इसके उलट सर्दियों के दिनों में, जब सैलानियों की संख्या न के बराबर होती है, सूखे कचरे की मात्रा घटकर केवल तीन से चार टन रह जाती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में प्रस्तुत आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं कि साल 2022 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच जहां लेह में 244.53 टन कचरा निकला, वहीं पर्यटन के पीक सीजन यानी दूसरी तिमाही में यह आंकड़ा आसमान छूते हुए 1033. 47 तक पहुंच गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिना पर्यटन के लेह और कारगिल के कचरे में कोई खास अंतर नहीं होता, लेकिन टूरिस्ट सीजन में लेह पर करीब 247 टन कचरे का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाता है। म्युनिसिपल कमिटी के अनुसार सर्दियों में कचरे की मात्रा गर्मियों की तुलना में सिर्फ 25 प्रतिशत ही रह जाती है। कचरे की मात्रा में आने वाला यह भारी उतार-चढ़ाव ही इसके प्रभावी निपटान में सबसे बड़ी बाधा है।
यह समस्या तब और विकराल हो जाती है जब लद्दाख की भौगोलिक ऊंचाई और कड़ाके की ठंड इसमें अड़चनें पैदा करती हैं। यद्यपि साल 2020 में स्कम्पारी में सौर ऊर्जा से संचालित 30 टन क्षमता का वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट लगाया गया है, लेकिन शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान में गीला कचरा पूरी तरह जम जाता है। अत्यधिक ठंड और ऊंचाई के कारण मजदूरों की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है, जिससे कचरे की प्रोसेसिंग में देरी होने लगती है। सबसे खराब स्थिति सर्दियों में भारी बर्फबारी के दौरान होती है, जब कचरा इकट्ठा करने वाले ट्रकों की आवाजाही ठप हो जाती है और लोग मजबूरी में कचरे को खुले में या अपने स्तर पर जलाने लगते हैं, जिससे लेह-मनाली हाईवे जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जलते हुए प्लास्टिक का धुंआ पर्यावरण को जहरीला बना रहा है। इस संकट को गहरा करने में नीतिगत कमियां भी जिम्मेदार हैं। देश के अन्य राज्यों के विपरीत लद्दाख के पास अब तक कोई अपनी स्वतंत्र ठोस कचरा प्रबंधन नीति नहीं है और प्रशासन अभी भी केवल इसके ड्राफ्ट पर ही काम कर रहा है।
एक तरफ बढ़ते पर्यटक है और फिर उनके लिए सुविधाओं के लिए बिजली की मांग बढ़ती है वहीं लद्दाख के पास अपनी सीमित पनबिजली और सौर ऊर्जा प्रणालियां हैं, जो इस अचानक बढ़ी मांग को पूरा करने में हांफने लगती हैं। गर्मियों में जब होटलों, रेस्टोरेंट्स और होमस्टे में पर्यटकों की भीड़ होती है, तब बिजली की मांग अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है। पीक सीजन में इस कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर डीजल जेनरेटरों का सहारा लिया जाता है। ये जेनरेटर न केवल भारी मात्रा में ईंधन की खपत करते हैं, बल्कि लद्दाख की शांत और स्वच्छ हवा में लगातार कार्बन और कानफोडू शोर घोलते रहते हैं। बिजली के इस अस्थायी और प्रदूषणकारी विकल्प ने शांत वादियों के पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है।
इस पूरे संकट में वाहनों से निकलने वाला धुंआ आग में घी का काम कर रहा है। पैंगोंग त्सो, नुब्रा वैली और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों की यात्रा के लिए हर दिन सैकड़ों डीजल चालित एसयूवी, टैक्सियां और कमर्शियल गाड़ियां लेह की सड़कों से गुजरती हैं। इन जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों के अनियंत्रित काफिलों के कारण लेह में न केवल ट्रैफिक जाम की समस्या पैदा हो रही है, बल्कि इनसे निकलने वाला काला कार्बन (सूट) और धुंआ हवा को प्रदूषित कर रहा है। यह काला कार्बन हवा में तैरकर आसपास के ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है। ग्लेशियरों की सतह काली होने के कारण वे सूरज की रोशनी को परावर्तित करने के बजाय अधिक गर्मी सोख रहे हैं, जिससे उनके समय से पहले और तेजी से पिघलने का खतरा पैदा हो गया है। यह चक्र अंततः लद्दाख के पूरे जल विज्ञान और जीवन चक्र को नष्ट कर सकता है।
वर्तमान परिदृश्य में लद्दाख के पर्यावरण को बचाने की पूरी जिम्मेदारी केवल म्युनिसिपल कमिटी के कंधों पर नजर आती है। पर्यावरण शुल्क जैसी नीतियां भी खामियों से भरी हैं, क्योंकि यह केवल लेह से बाहर जाने वालों के परमिट पर लागू होती हैं, जबकि सिर्फ लेह आकर प्रदूषण फैलाने वाले पर्यटकों से कुछ नहीं वसूला जाता। स्थानीय सामाजिक संस्थाओं का भी यही मानना है कि नीतियां अक्सर व्यावहारिक जमीनी हकीकत को समझे बिना ऊपर से थोप दी जाती हैं। पर्यटन से होने वाली आमदनी का स्वागत है, लेकिन यह स्थानीय लोगों के जीवन की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यदि हमें लद्दाख को बचाना है, तो पर्यटन विभाग को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और लद्दाख की वहन क्षमता के आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या को सीमित करने जैसे कड़े कदम उठाने होंगे। जब तक पर्यटक जिम्मेदार नहीं होंगे और प्रशासन कचरे, पानी, बिजली और वाहनों के धुएं के लिए एक एकीकृत मास्टर प्लान नहीं बनाएगा, तब तक इस नाजुक हिमालयी क्षेत्र को तबाही की तरफ बढ़ने से रोकना नामुमकिन होगा।