अमेरिका के जॉर्जिया राज्य की न्यूटन काउंटी और उत्तर प्रदेश में ग्रेटर नोएडा के पास स्थित तुसियाना नाम का गांव इन दोनों के बीच भाषा, संस्कृति और भूगोल के लिहाज से कुछ भी साझा नहीं है। फिर भी एक धागा इन दोनों जगहों को आपस में जोड़ता है, और वह है भविष्य के एक संकट का स्वाद जो वे पहले ही चख चुके हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के डेटा सेंटरों का पानी पर क्या असर पड़ सकता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव इन दोनों गांवों ने पहले ही ले लिया है। न्यूटन काउंटी में मेटा कंपनी द्वारा पचहत्तर करोड़ डॉलर का डेटा सेंटर बनाए जाने के बाद वहां की डेढ़ लाख की आबादी वाले इलाके में नल सूख गए, कुओं का पानी उतर गया और बचे हुए भूजल में भी गाद जमा होने लगी। तुसियाना में योगी आदित्यनाथ के हाथों उद्घाटित योट्टा डेटा सेंटर पार्क के पास रहने वाले दो हजार गांववालों को अब पानी के लिए अस्सी से सौ फुट तक खोदना पड़ता है, जो दो दशक पहले महज बीस से तीस फुट पर ही मिल जाता था।
ये दोनों घटनाएं केवल स्थानीय समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक बड़े, वैश्विक संकट की दस्तक हैं। और इस संकट की जड़ें अब भारत में भी गहराई से धंसने लगी हैं।
भारत इस समय डेटा सेंटरों के रूप में एक नई औद्योगिक क्रांति की दहलीज पर खड़ा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश की डेटा सेंटर क्षमता 2020 में 0.4 गिगावॉट से बढ़कर 2025 के अंत तक 1.5 गिगावॉट तक पहुंच गई है यानी मात्र पांच वर्षों में लगभग चार गुना वृद्धि। सलाहकार संस्था डेलॉइट के अनुमान के मुताबिक 2030 तक आठ से दस गिगावॉट क्षमता और जुड़ जाएगी। बाजार शोध संस्था अरिज्टन की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार देश में फिलहाल 132 डेटा सेंटर काम कर रहे हैं और 2029 तक सत्रह शहरों में 84 नए प्रोजेक्ट और बनने वाले हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एआई इम्पैक्ट समिट के उद्घाटन समारोह में कहा था कि डेटा सेंटर युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेंगे और दुनिया को भारत में अपना डेटा रखने का न्योता है। अडानी समूह ने 2035 तक नवीकरणीय ऊर्जा आधारित हाइपरस्केल डेटा सेंटर बनाने के लिए सौ अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, जबकि माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और गूगल जैसी तकनीकी कंपनियों ने भी हर एक दस-दस अरब डॉलर लगाने की तैयारी दिखाई है।यह तस्वीर ऊपर से देखने पर आकर्षक लगती है। लेकिन इस तरक्की के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है इन डेटा सेंटरों को जिस पानी की जरूरत होगी, वह आएगा कहां से?
डेटा सेंटर क्या होता है, यह समझना मुश्किल नहीं। इंटरनेट पर वीडियो देखना, तस्वीरें साझा करना या एआई से कोई सवाल पूछना यह सब असल में कहीं न कहीं बड़ी इमारतों में लगे अनगिनत कंप्यूटरों पर हो रहा होता है। यही डेटा सेंटर हैं। ये कंप्यूटर लगातार काम करते रहने की वजह से भारी मात्रा में गर्मी छोड़ते हैं, और उसे काबू में रखने के लिए बड़ी मात्रा में ठंडक की जरूरत पड़ती है। इसके लिए चाहिए मीठा और साफ पानी। भारत के ज्यादातर डेटा सेंटर वाष्पीकरण आधारित कूलिंग प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यहां का तापमान तुलनात्मक रूप से ज्यादा रहता है। इस प्रक्रिया में इस्तेमाल हुए पानी का लगभग अस्सी फीसदी हिस्सा वाष्पीकरण में उड़ जाता है, यानी वह पानी कभी वापस नहीं मिलता।
कर्नाटक के सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री प्रियांक खरगे ने मार्च 2026 में विधानसभा में बताया था कि हर मेगावॉट डेटा सेंटर क्षमता के लिए साल भर में करीब 2.5 करोड़ लीटर पानी चाहिए। भारत की मौजूदा 1.5 गिगावॉट क्षमता के हिसाब से यह आंकड़ा साल भर में करीब 37.5 अरब लीटर तक पहुंचता है, और यह तो सिर्फ शुरुआत है, क्योंकि प्रस्तावित विस्तार मौजूदा क्षमता का छह गुना है। एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर रोजाना लगभग 11.35 लाख लीटर पानी खर्च करता है। वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टैनली की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में एआई डेटा सेंटरों की पानी की मांग 2028 तक ग्यारह गुना बढ़कर साल भर में 1,068 अरब लीटर तक पहुंच जाएगी।
इन आंकड़ों की भयावहता समझने के लिए एक बात ध्यान में रखनी होगी — भारत के कई बड़े शहरों में गर्मियों में नल पहले से ही सूख जाते हैं। मुंबई को पानी देने वाली सात प्रमुख झीलों में फिलहाल सिर्फ 9.33 फीसदी पानी बचा है, यानी शहर के पास बस एक महीने का ही पानी है। कृष्णा नदी बेसिन का जलस्तर घटकर महज 19.31 फीसदी रह गया है, जबकि गोदावरी बेसिन में यह 36.52 फीसदी पर है। और ठीक इन्हीं महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे बार-बार सूखे का सामना करने वाले राज्यों में हाइपरस्केल डेटा सेंटरों का बड़ा जाल बिछता जा रहा है। दक्षिण भारत के शहरों पर इस संकट का सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है, क्योंकि वहां का भूजल भंडार देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले पहले से ही कम है। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सैंड्रप) के समन्वयक हिमांशु ठक्कर के मुताबिक भारत का अधिकांश हिस्सा पहले से ही जल संकट में है; बेंगलुरु को तो सौ किलोमीटर दूर से कावेरी का पानी ऊंचाई पर चढ़ाकर लाना पड़ता है, और डेटा सेंटर उद्योग को पानी की जिम्मेदारी के मामले में पहल करनी चाहिए, यह उनका मानना है।
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा — यानी वैश्विक भूजल दोहन का लगभग पच्चीस फीसदी हिस्सा — भूजल निकालने वाला देश है। कई इलाकों में प्राकृतिक पुनर्भरण की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेजी से भूजल खींचा जा रहा है। यह समस्या सूखे की तरह मौसम-केंद्रित और अस्थायी नहीं है; यह एक लंबे समय से चली आ रही, ढांचागत समस्या है। ऐसी पहले से ही नाजुक स्थिति में एआई डेटा सेंटरों का तेज विस्तार आग में घी डालने जैसा साबित हो सकता है। पानी की कमी आगे चलकर एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष की चिंगारी बन सकती है, और एआई की बढ़ोतरी के साथ ये तनाव डरावनी रफ्तार से तेज हो रहे हैं। साठ साल बाद भी कावेरी जल विवाद का हल नहीं निकला है; अगर बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में डेटा सेंटरों का फैलाव इसी रफ्तार से जारी रहा, तो अंतरराज्यीय जल विवाद और भड़कने का खतरा है। उधर अमेरिका की नोआ संस्था ने कहा है कि जून से अगस्त के बीच अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना बासठ फीसदी है। अल नीनो वाले सालों में भारत में तापमान बढ़ता है, गर्मी की लहरें तीखी होती हैं और मानसून कमजोर रहता है। तापमान ज्यादा होने पर सर्वर ठंडे रखने के लिए और भी ज्यादा पानी चाहिए होता है — यानी जलवायु परिवर्तन की वजह से पानी घटेगा, पानी घटने से तनाव बढ़ेगा, और उसी दौर में डेटा सेंटरों की मांग भी बढ़ती जाएगी, ऐसा एक अजीब दुष्चक्र बनता जा रहा है।
इस समस्या का कोई हल है क्या, इस पर आईआईटी कानपुर के एआई विशेषज्ञ प्रोफेसर अर्णब भट्टाचार्य ने दोहरी पाइपलाइन प्रणाली का सुझाव दिया है — एक पाइप से ताजा पानी और दूसरे से पुनर्चक्रित पानी की सप्लाई। अपने संस्थान में यह प्रणाली पहले से चल रही है, ऐसा वे बताते हैं, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए भारी खर्च और सख्त नियामक ढांचे की जरूरत होगी, ऐसा भी उनका मानना है। बंद-लूप कूलिंग प्रणाली से मीठे पानी का इस्तेमाल सत्तर फीसदी तक घटाया जा सकता है। इसके अलावा शोधित गंदे पानी का उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा से चलने वाली कूलिंग व्यवस्था, और कम जल-तनाव वाले इलाकों में डेटा सेंटर बनाना — ये विकल्प भी मौजूद हैं। मगर इन सब उपायों के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, सख्त नियमन और पारदर्शिता चाहिए, और इन तीनों चीजों की फिलहाल कमी दिखती है। विशेषज्ञ, शोधकर्ता और कार्यकर्ता एक स्वर में कहते हैं कि एआई उद्योग की पानी-इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता की कमी ही सबसे बड़ी रुकावट है। कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि वे बंद-लूप प्रणाली अपना रही हैं और पानी की खपत घटा रही हैं, लेकिन इन आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से जांचने की कोई ठोस व्यवस्था अभी मौजूद नहीं है।
सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें, तो भी यह तस्वीर और साफ हो जाती है। विदर्भ और मराठवाड़ा के कई जिलों में हर गर्मी में टैंकरों से पानी पहुंचाने की नौबत आती है, जबकि उसी राज्य के मुंबई-पुणे पट्टे में हाइपरस्केल डेटा सेंटरों के लिए बड़ी मात्रा में जमीन और बिजली-पानी के कनेक्शन मंजूर किए जा रहे हैं। यह विरोधाभास सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है; यह नीति-निर्माण में प्राथमिकताओं का सवाल है। ग्रामीण इलाकों के किसानों और शहरी झुग्गियों में रहने वालों के पानी के हक की मांग और औद्योगिक निवेश की जल्दबाजी, इन दोनों के बीच संतुलन बनाने वाली कोई ठोस व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है। यदि स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं को डेटा सेंटर प्रोजेक्ट की मंजूरी से पहले भूजल स्तर, वर्षा के आंकड़े और वैकल्पिक जलस्रोतों का गहन अध्ययन पेश करना अनिवार्य कर दिया जाए, तो ही इन परियोजनाओं से स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाला दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा सेंटर उद्योग अपने पानी के इस्तेमाल का हिसाब सार्वजनिक रूप से और नियमित अंतराल पर जाहिर करे, यह पहला और सबसे जरूरी कदम है। फिलहाल भारत में इस तरह के अनिवार्य खुलासे के लिए कोई ठोस कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों में कुछ जगहों पर डेटा सेंटरों के लिए अपने पानी और ऊर्जा इस्तेमाल की सालाना रिपोर्ट देना अनिवार्य कर दिया गया है; भारत में भी ऐसा नियमन होने पर नागरिकों और स्थानीय प्रशासन दोनों को असली हालात समझने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा जिन इलाकों में भूजल स्तर पहले से ही गंभीर हालत में है, वहां डेटा सेंटर बनाने पर रोक लगाना या विशेष नियमों के दायरे में लाना, यह भी एक अहम विकल्प के तौर पर विशेषज्ञों की ओर से सुझाया जाता है।
ग्रामीण इलाकों की महिलाओं का अनुभव इस पूरी बहस में अक्सर नजरअंदाज हो जाता है। पानी लाने की जिम्मेदारी अब भी ज्यादातर महिलाओं पर ही होती है, और भूजल स्तर गिरने पर उन्हें ज्यादा दूर चलना पड़ता है, ज्यादा वक्त खर्च करना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, सेहत और कमाई के मौकों पर पड़ता है। इसलिए डेटा सेंटरों से होने वाली पानी की कमी सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है; यह लिंग-आधारित असमानता को भी और गहरा करने वाला मसला है। यह पहलू नीति-निर्माताओं की बहस में शायद ही कभी आता है, मगर जमीनी हकीकत समझने के लिए यह बेहद जरूरी है।
तकनीक कभी पूरी तरह तटस्थ नहीं होती; वह सृजनशील या विनाशकारी, मुक्तिदायक या बाधक बनती है — यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका इस्तेमाल करने वालों के हित और सोच क्या हैं। भारत एक तरफ दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी तकनीक-अपनाने वाले देशों में शामिल है, तो दूसरी तरफ गहरे पर्यावरणीय तनाव, जातिगत बोझ और संसाधनों के असमान बंटवारे से जूझता एक बेहद असमान समाज भी है। और हकीकत में अमेजन ने पिछले साल अपने डेटा सेंटरों के लिए ढाई अरब गैलन पानी इस्तेमाल किए जाने की बात खुद स्वीकार की है, और आलोचक एआई उद्योग की पानी की भूख की मिसाल के तौर पर यही आंकड़ा बार-बार पेश करते हैं। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने भी इसी पैमाने के बड़े आंकड़े सामने रखे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक दुनिया भर के एआई डेटा सेंटर लगभग एक अरब तीस करोड़ लोगों के बराबर पानी इस्तेमाल कर रहे होंगे — यह आंकड़ा भारत की पूरी आबादी के बराबर है।
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई अब देश का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब बनती जा रही है, और देश में बनने वाली कुल नियोजित डेटा सेंटर बिजली-क्षमता में लगभग पैंतालीस फीसदी हिस्सा सिर्फ महाराष्ट्र को मिलने वाला है। बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे और नोएडा जैसे शहर भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक, ये दोनों राज्य पहले से ही बार-बार पड़ने वाले सूखे और घटते भूजल स्तर से परेशान हैं, और ठीक वहीं सबसे ज्यादा पानी खर्च करने वाले हाइपरस्केल डेटा सेंटरों का बड़ा निवेश हो रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या पानी की उपलब्धता की नहीं बल्कि उसके कुशल प्रबंधन और बंटवारे की है; भारत का प्रति व्यक्ति पानी इस्तेमाल अमेरिका के मुकाबले काफी कम है और दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश भी हमारे यहां होती है — अगर भंडारण और वितरण को सुनियोजित किया जाए तो एआई के विकास को पानी की कमी नहीं सताएगी, यह तर्क है। यह नजरिया सिद्धांत रूप में सही हो सकता है, लेकिन भंडारण और वितरण को बेहतर बनाने का काम पिछले सात दशकों से लंबित है, और डेटा सेंटरों की बढ़ती जरूरत उस सुधार के पूरा होने का इंतजार नहीं करेगी, इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भारत के एआई ढांचे में चल रहे फिलहाल के निवेश की दिशा एक दुर्लभ साझा संसाधन — यानी पानी — के बेहद राजनीतिक ढंग से बंटवारे की दिशा है, जो समाज के सबसे असुरक्षित तबकों को व्यवस्थित ढंग से वंचित करता जा रहा है। दिन भर मेहनत करने के बावजूद जिनके हाथ में मुश्किल से ही पैसे आते हैं, हर एक घड़ा पानी के लिए जिन्हें किलोमीटर भर पैदल चलना पड़ता है, ऐसे आदिवासी किसान, ग्रामीण महिलाएं और शहरी झुग्गी-बस्तियों के निवासी ही असल में इन डेटा सेंटरों की तृप्ति की कीमत चुकाने वाले हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के 2023 के एक अध्ययन के मुताबिक चैटजीपीटी से पूछे जाने वाले हर बीस से तीस सवालों के पीछे लगभग पांच सौ मिलिलीटर पानी खर्च होता है। हम रोजमर्रा की बातचीत की तरह सहजता से एआई से संवाद करते हैं, लेकिन हर उस संवाद के पीछे कहीं न कहीं कोई कुआं थोड़ा और सूख रहा होता है, इसका अहसास बहुत कम लोगों को है।
दुनिया की एआई राजधानी मानी जाने वाली कैलिफोर्निया में ही सालाना जंगल की आग की वजह से एक हफ्ते में एक करोड़ गैलन से ज्यादा पानी बर्बाद हो जाता है। गर्मी की समस्या से बचने के लिए एलन मस्क चांद पर डेटा सेंटर बनाने की संभावना पर विचार कर रहे हैं, ऐसी चर्चा भी है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी और मेलबर्न शहरों में नए निवेश की वजह से वहां भी पानी को लेकर चिंता बढ़ रही है। लेकिन यह संकट ग्लोबल साउथ के देशों पर — जिनमें भारत भी शामिल है — सबसे भारी पड़ने वाला है, क्योंकि यहां जलवायु परिवर्तन की वजह से पानी की समस्या पहले से ही गंभीर है, और इस कीमत को चुकाने की आर्थिक क्षमता भी सीमित है।
इस सबका निचोड़ क्या निकलता है? यह संकट आज का नहीं, कल का है — मगर आज सही फैसले नहीं लिए गए, तो कल पश्चाताप करने के लिए भी वक्त नहीं बचेगा। एआई ने विकास के नए दरवाजे खोले हैं, इसे नकारने की कोई वजह नहीं। लेकिन यह विकास किसके दम पर हो रहा है, किसकी तृष्णा की कीमत पर हो रहा है, यह सवाल पूछने की जिम्मेदारी हम सभी की है। डेटा सेंटरों को कर-राहत देने से पहले पानी की जवाबदेही के नियम लागू करना, और स्थानीय समुदायों के साथ पारदर्शी सलाह-मशविरा करना — इन बातों को प्राथमिकता देनी होगी। नहीं तो एआई की सपनों जैसी तरक्की एक दिन सूखे नल के रूप में पूरी दुनिया के सामने खड़ी हो जाएगी।
विकास परसराम मेश्राम