धीरज चतुर्वेदी
भारत में सर्दी अब पहले जैसी स्थिर ऋतु नहीं रह गई है। एक ही मौसम में कहीं घना कोहरा, शीतलहर और पाला पड़ सकता है, तो कुछ ही दिन बाद तापमान असामान्य रूप से बढ़ सकता है। आने वाली सर्दी—दिसंबर 2026 से फरवरी 2027—के बारे में अभी निश्चित, शहर-वार भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मौसमी पूर्वानुमान सर्दी के निकट आने पर अधिक विश्वसनीय होंगे। फिर भी, उपलब्ध जलवायु शोध बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में सर्दियों का औसत तापमान बढ़ने की प्रवृत्ति है, जबकि अचानक पड़ने वाली शीतलहरों और घने कोहरे जैसी चरम घटनाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं होंगी।
सर्दी का मौसम किन बातों पर निर्भर करता है?
भारत में सर्दी का स्वरूप केवल तापमान से तय नहीं होता। उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये भूमध्यसागरीय क्षेत्र से उत्पन्न होकर पश्चिम एशिया के रास्ते भारत आते हैं। इनके प्रभाव से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बर्फबारी होती है तथा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में वर्षा, बादल और ठंडी हवाएँ पहुँचती हैं।
जब पश्चिमी विक्षोभ के बाद उत्तर-पश्चिम से सूखी तथा ठंडी हवाएँ मैदानी क्षेत्रों में आती हैं, तब शीतलहर की स्थिति बन सकती है। साफ आसमान और हवा की गति कम होने पर रात में धरती तेजी से ठंडी होती है; इससे न्यूनतम तापमान गिरता है और पाला पड़ने की संभावना बढ़ती है। दूसरी ओर, बादल होने पर रात की गर्मी वायुमंडल में फँस जाती है, जिससे न्यूनतम तापमान बढ़ सकता है।
पूर्वी भारत में गंगा के मैदानी भूगोल, नमी और वायु प्रदूषण के कारण कोहरा अधिक गंभीर रूप ले सकता है। दक्षिण भारत में सर्दी अपेक्षाकृत हल्की रहती है, लेकिन वहाँ भी रात के तापमान, वर्षा और चक्रवाती गतिविधियों में बदलाव महसूस किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन से भारत की सर्दी कैसे बदल रही है?
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की 202 की रिपोर्ट, *Assessment of Climate Change over the Indian Region*, के अनुसार भारत का औसत सतही तापमान 1901 से 2018 के बीच लगभग **.7 डिग्री सेल्सियस** बढ़ा है। यह वृद्धि केवल गर्मियों में नहीं हुई है; न्यूनतम तापमान, रातों की गर्मी और सर्दियों के औसत तापमान में भी बदलाव देखा गया है।
जलवायु परिवर्तन का सामान्य प्रभाव यह है कि कड़ाके की ठंड वाले दिनों की दीर्घकालिक संख्या घट सकती है और सर्दी की अवधि छोटी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तर भारत में ठंड खत्म हो जाएगी। विज्ञान की भाषा में औसत तापमान बढ़ना और चरम ठंड की घटनाएँ होना एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं। उदाहरण के लिए, पूरे मौसम का औसत तापमान सामान्य से अधिक हो सकता है, लेकिन जनवरी में तीन-चार दिन की बहुत तेज शीतलहर भी आ सकती है।
इसी कारण आने वाले वर्षों में भारत को “कम ठंड” से अधिक “अनिश्चित ठंड” का सामना करना पड़ सकता है—अर्थात दिन गर्म, रात ठंडी; कुछ सप्ताह शुष्क, फिर अचानक बारिश; या लंबे कोहरे के बाद अचानक तापमान वृद्धि।
शहरों में यह बदलाव और अधिक जटिल है। दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, कानपुर और पटना जैसे शहरों में कंक्रीट निर्माण, वाहनों, उद्योगों और घटते हरित क्षेत्र के कारण **शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव** बनता है। इससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में, खासकर रात में, अधिक रह सकता है। इसलिए शहरों में सर्दियों का औसत तापमान बढ़ सकता है, भले ही शीतलहर के दौरान कुछ दिन बहुत ठंडे रहें।
सुपर एल नीनो क्या होता है?
एल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के असामान्य गर्म होने की घटना है। यह एक बड़ी समुद्री-वायुमंडलीय प्रणाली का हिस्सा है, जिसे एल नीनो-दक्षिणी दोलन या ENSO कहा जाता है। एल नीनो का असर दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा, तापमान, तूफान और सूखे के पैटर्न पर पड़ता है।
जब प्रशांत महासागर के नीनो-3.4 क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान औसत से लगभग **2 डिग्री सेल्सियस या अधिक** बढ़ जाता है, तो उसे अनौपचारिक रूप से “सुपर एल नीनो” कहा जाता है। वर्ष 1982–83, 1997–98 और 2015–16 के एल नीनो बहुत शक्तिशाली माने जाते हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 2023–24 के एल नीनो को भी शक्तिशाली घटनाओं में गिना था।
हालाँकि, “सुपर एल नीनो” कोई औपचारिक, हर जगह समान रूप से प्रयोग होने वाला वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं है। यह भी जरूरी है कि किसी वर्ष एल नीनो होने का अर्थ यह नहीं कि भारत में सर्दी निश्चित रूप से गर्म ही होगी या मानसून निश्चित रूप से कमजोर होगा। मौसम पर हिंद महासागर, पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी बर्फ, स्थानीय हवाएँ और अन्य जलवायु कारक भी असर डालते हैं।
इस साल की ठंड पर एल नीनो का संभावित प्रभाव
यदि आगामी महीनों में शक्तिशाली एल नीनो की स्थिति सक्रिय रहती है या विकसित होती है, तो वैश्विक औसत तापमान पर गर्माहट का दबाव बढ़ सकता है। एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर से वायुमंडल में अतिरिक्त ऊष्मा पहुँचती है। जलवायु परिवर्तन से पहले से गर्म हो रहे वातावरण में यह अतिरिक्त प्रभाव अधिक स्पष्ट हो सकता है।
भारत में इसका संभावित असर निम्न प्रकार से देखा जा सकता है:
1. औसत तापमान अधिक रहना:** मध्य भारत, पश्चिमी भारत और कई शहरी क्षेत्रों में सर्दियों का औसत अधिक गर्म हो सकता है। रातों का तापमान भी सामान्य से ऊपर रह सकता है।
2. छोटे लेकिन तीव्र शीतलहर दौर:** औसत गर्म सर्दी के बावजूद उत्तर-पश्चिम भारत और हिमालयी क्षेत्रों से आने वाली ठंडी हवाएँ कुछ दिनों के लिए तेज ठंड ला सकती हैं। इसलिए शीतलहर की तैयारी आवश्यक रहेगी।
3. कोहरा और प्रदूषण:** दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बिहार में कोहरा केवल ठंड से नहीं बनता। नमी, हवा की गति, तापमान प्रतिलोमन और प्रदूषण इसकी तीव्रता तय करते हैं। अपेक्षाकृत गर्म सर्दी में भी हवा धीमी हो तो घना कोहरा और प्रदूषण बना रह सकता है।
4. रबी फसलों पर असर:** गेहूँ, चना, सरसों, आलू और मटर जैसी फसलों के लिए सर्दी महत्वपूर्ण है। यदि फरवरी और मार्च में तापमान जल्दी बढ़ता है, तो गेहूँ में दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वर्ष 2022 में मार्च की असामान्य गर्मी ने भारत के कई गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों में चिंता पैदा की थी।
आंकड़े और हाल के संकेत
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, भारत में तापमान संबंधी चरम घटनाएँ बढ़ती चिंता का विषय हैं। 2024 में देश ने लंबी तथा तीव्र हीटवेव का अनुभव किया, विशेषकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में। गर्मियों की यह बढ़ती तीव्रता इस व्यापक संकेत का हिस्सा है कि भारत की जलवायु तेजी से गर्म हो रही है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में 195 से 2015 के बीच गर्म दिनों और गर्म रातों की आवृत्ति बढ़ी है, जबकि कई क्षेत्रों में ठंडे दिनों और ठंडी रातों की प्रवृत्ति घटी है। इसका सीधा अर्थ है कि सर्दियों में तापमान का आधार स्तर पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रहा है।
वैश्विक स्तर पर भी WMO और यूरोपीय जलवायु सेवा कॉपरनिकस के आकलनों ने 2023 और 2024 को रिकॉर्ड गर्म वर्षों में शामिल किया। समुद्रों का लगातार गर्म होना भविष्य के एल नीनो, मानसून और मौसमी तापमान के प्रभावों को अधिक जटिल बना सकता है।
पश्चिमी विक्षोभ क्यों महत्वपूर्ण रहेंगे?
भारत की सर्दी के बारे में किसी भी अनुमान में पश्चिमी विक्षोभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि दिसंबर और जनवरी में पश्चिमी विक्षोभ बार-बार सक्रिय होते हैं, तो हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी तथा उत्तर-पश्चिम भारत में वर्षा हो सकती है। बादल और वर्षा कुछ समय के लिए रात का तापमान बढ़ा सकते हैं, लेकिन इनके गुजरने के बाद आने वाली ठंडी हवाएँ शीतलहर पैदा कर सकती हैं।
हिमालय में बर्फबारी का असर जल संसाधनों और कृषि पर भी पड़ता है। बर्फ पिघलने से नदियों को पानी मिलता है, पर जलवायु परिवर्तन हिमनदों और बर्फ के पैटर्न को बदल रहा है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2023 की रिपोर्ट ने हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान और हिमनदों के तेजी से पिघलने पर गंभीर चेतावनी दी है।
स्वास्थ्य, खेती और दैनिक जीवन पर प्रभाव
बदलती सर्दी का सबसे बड़ा असर कमजोर वर्गों पर पड़ता है। शीतलहर से बुजुर्ग, बच्चे, बेघर लोग, दिहाड़ी मजदूर और हृदय या श्वसन रोगों से पीड़ित लोग अधिक जोखिम में होते हैं। दूसरी ओर, गर्म दिन और ठंडी रात के बीच तेज उतार-चढ़ाव से सर्दी-जुकाम, श्वसन संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
किसानों के लिए मौसम पूर्वानुमान का उपयोग बहुत जरूरी होगा। पाला पड़ने की चेतावनी मिलने पर किसान सिंचाई, धुआँ करने या फसल ढकने जैसे उपाय अपना सकते हैं। गेहूँ और सब्जियों के लिए फरवरी-मार्च की गर्मी पर विशेष निगरानी चाहिए। पशुपालकों को भी ठंड और कोहरे से पशुओं को बचाने के लिए सूखा बिछावन, साफ पानी तथा हवा से बचाव की व्यवस्था करनी होगी।
निष्कर्ष
भारत में आगामी सर्दी के बारे में अभी यह कहना अधिक उचित होगा कि औसत तापमान पर गर्माहट का दबाव बना रहेगा, क्योंकि जलवायु परिवर्तन लगातार तापमान बढ़ा रहा है। यदि शक्तिशाली एल नीनो सक्रिय होता है, तो गर्म सर्दी की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन उत्तर भारत में शीतलहर, पाला, घना कोहरा और प्रदूषण के दौर फिर भी संभव हैं।
इसलिए आने वाली सर्दी का सबसे संभावित स्वरूप “कम ठंड” नहीं, बल्कि **असमान और उतार-चढ़ाव वाली ठंड** हो सकता है। सटीक स्थिति के लिए भारतीय मौसम विभाग के अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर 2026 के मौसमी पूर्वानुमानों पर ध्यान देना चाहिए।