भारत की नदियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

पंकज चतुर्वेदी

भारत की नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं, बल्कि कृषि, पेयजल, बिजली उत्पादन, जैव-विविधता, परिवहन और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी जैसी नदियाँ भारत के सामाजिक-आर्थिक जीवन को संचालित करती हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का पैटर्न, हिमनदों का पिघलना, सूखा, बाढ़, समुद्र-स्तर वृद्धि और भूजल की स्थिति बदल रही है। इसका सीधा असर नदियों के जल-प्रवाह, जल-गुणवत्ता और नदी-आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

1. मानसून का बदलता स्वरूप और अचानक बाढ़

भारत की अधिकांश नदियाँ दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण कुल मानसूनी वर्षा में हर जगह एक समान परिवर्तन नहीं दिखता, परंतु वर्षा की **तीव्रता और अनिश्चितता** बढ़ रही है। अर्थात, कई दिनों तक कम या बिल्कुल वर्षा नहीं होती, फिर बहुत कम समय में अत्यधिक बारिश हो जाती है। इससे नदियों में अचानक जल-स्तर बढ़ता है और बाढ़ की स्थिति बनती है।

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान तथा वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल और उनके सहयोगियों के शोध के अनुसार, मध्य भारत में 195 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में लगभग **75 प्रतिशत की वृद्धि** दर्ज की गई। ऐसी बारिश सामान्यतः 150 मिलीमीटर प्रतिदिन या उससे अधिक की घटनाओं से जुड़ी होती है। जब इतनी भारी वर्षा छोटे समय में होती है, तो नदी-तंत्र उसे संभाल नहीं पाता।

2018 की केरल बाढ़ इसका बड़ा उदाहरण है। अगस्त 2018 में असाधारण वर्षा, बांधों से जल छोड़े जाने और पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन के कारण पेरियार, पंबा और भरतपुझा जैसी नदियाँ उफान पर आ गईं। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई और लाखों लोग प्रभावित हुए। यह घटना बताती है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल नदी में पानी बढ़ने तक सीमित नहीं है; यह बांध प्रबंधन, शहरी विस्तार, वनों की कटाई और भूमि-उपयोग परिवर्तन के साथ मिलकर विनाशकारी रूप ले सकता है।

2. हिमालयी हिमनदों का पिघलना और नदी प्रवाह

गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी प्रणालियों का स्रोत हिमालय के हिमनद, हिमपात और ऊँचे पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्र हैं। तापमान बढ़ने से हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। प्रारंभिक चरण में इससे नदियों में पानी कुछ समय के लिए बढ़ सकता है, लेकिन दीर्घकाल में जब हिमनदों का आकार घटेगा, तब गर्मियों और शुष्क मौसम में नदी प्रवाह कम होने का खतरा है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2019 की *Hindu Kush Himalaya Assessment* के अनुसार, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र 1951 से 2014 के बीच लगभग **.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक** की दर से गर्म हुआ। इसी रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित न किया गया तो इस क्षेत्र के हिमनदों का बड़ा हिस्सा सदी के अंत तक समाप्त हो सकता है।

वैज्ञानिकों ब्रून और सहयोगियों के 2017 के अध्ययन में पाया गया कि हिमालयी हिमनदों की बर्फ-हानि की दर 200 के बाद पहले की तुलना में तेज हुई। इससे गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के मौसमी प्रवाह में अस्थिरता आ सकती है। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदीय झीलों के फटने, जिन्हें **ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF)** कहा जाता है, का खतरा बढ़ता है।

अक्टूबर 2023 में सिक्किम की तीस्ता नदी में आई विनाशकारी बाढ़ इसका उदाहरण है। दक्षिण ल्होनक झील से जुड़े हिमनदीय झील-विस्फोट और भारी वर्षा ने तीस्ता घाटी में तबाही मचाई। नदी किनारे की बस्तियाँ, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएँ बुरी तरह प्रभावित हुईं। यह घटना दिखाती है कि हिमालयी नदियों पर जलवायु जोखिम अब भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान वास्तविकता है।

3. सूखा, कम प्रवाह और जल-संकट

जलवायु परिवर्तन का दूसरा पहलू सूखा और कम नदी-प्रवाह है। वर्षा में लंबे अंतराल, बढ़ता तापमान और अधिक वाष्पीकरण नदियों तथा जलाशयों में उपलब्ध पानी घटा सकते हैं। प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ—जैसे कावेरी, कृष्णा, गोदावरी और ताप्ती—मानसूनी वर्षा पर अधिक निर्भर हैं। इसलिए कमजोर मानसून या देर से वर्षा होने पर इन नदियों में जल-संकट गहरा जाता है।

कावेरी नदी विवाद को केवल राज्यों के बीच जल-बँटवारे का मामला नहीं समझना चाहिए। कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों में अनियमित वर्षा, सूखा, बढ़ती सिंचाई जरूरत और भूजल दोहन नदी पर दबाव बढ़ाते हैं। जब नदी का प्राकृतिक प्रवाह घटता है, तब पेयजल, खेती और उद्योग के बीच संघर्ष तीखा हो जाता है।

भारत में भूजल भी नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शुष्क मौसम में कई नदियों को भूजल से “बेस फ्लो” मिलता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के आकलनों के अनुसार, भारत में भूजल का वार्षिक दोहन लगभग **245 अरब घन मीटर** के स्तर पर है और इसका बड़ा हिस्सा सिंचाई में उपयोग होता है। अत्यधिक भूजल दोहन से कुएँ सूखते हैं और नदियों में शुष्क मौसम का प्रवाह भी घट सकता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन और भूजल संकट मिलकर नदी तंत्र को कमजोर करते हैं।

4. जल-गुणवत्ता और पारिस्थितिकी पर प्रभाव

नदियों में पानी कम होने पर प्रदूषकों का घनत्व बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, किसी नदी में औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज या कृषि रसायन पहुँचते हैं तो पर्याप्त जल-प्रवाह उन्हें पतला करने में मदद करता है। लेकिन सूखे या कम प्रवाह की स्थिति में वही प्रदूषण अधिक गंभीर हो जाता है। इससे घुलित ऑक्सीजन घटती है, मछलियों और अन्य जलीय जीवों को नुकसान होता है तथा मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है।

गंगा और यमुना के कई शहरी हिस्सों में यह समस्या स्पष्ट दिखती है। गर्मियों में कम प्रवाह और सीवेज का दबाव जल-गुणवत्ता को खराब करता है। बढ़ते जल तापमान से शैवाल की अत्यधिक वृद्धि, ऑक्सीजन की कमी और जलीय जैव-विविधता में परिवर्तन हो सकता है। गंगा डॉल्फिन, महसीर मछली और आर्द्रभूमि-आधारित पक्षियों के आवास भी प्रभावित होते हैं।

समुद्र-स्तर वृद्धि का असर डेल्टा क्षेत्रों की नदियों पर पड़ रहा है। सुंदरबन क्षेत्र में समुद्री जल का खारापन बढ़ने से नदी और भूजल दोनों प्रभावित होते हैं। इससे खेती, मीठे पानी की मछलियाँ और स्थानीय पेयजल व्यवस्था संकट में पड़ती है।

5. क्या किया जाना चाहिए?

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से नदियों को बचाने के लिए केवल बड़े बांध बनाना पर्याप्त नहीं है। एक समग्र नदी-घाटी दृष्टिकोण आवश्यक है। पहला, बाढ़-पूर्व चेतावनी प्रणाली और मौसम पूर्वानुमान को मजबूत करना होगा। दूसरा, हिमालयी झीलों और भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की निरंतर निगरानी जरूरी है। तीसरा, नदियों के बाढ़-मैदानों पर अनियंत्रित निर्माण रोकना चाहिए, क्योंकि ये क्षेत्र प्राकृतिक रूप से अतिरिक्त पानी को फैलाने और अवशोषित करने का काम करते हैं।

चौथा, वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, आर्द्रभूमियों की रक्षा और भूजल पुनर्भरण को प्राथमिकता देनी होगी। पाँचवाँ, नदी में न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह—अर्थात जलीय जीवन और नदी की प्राकृतिक कार्यप्रणाली के लिए आवश्यक पानी—सुनिश्चित करना चाहिए। अंततः ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना भी जरूरी है, क्योंकि तापमान वृद्धि को नियंत्रित किए बिना हिमनद पिघलने, चरम वर्षा और सूखे के जोखिम को सीमित नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

भारत की नदियाँ जलवायु परिवर्तन के दोहरे दबाव में हैं—कहीं अचानक और विनाशकारी बाढ़, तो कहीं लंबे समय तक सूखा और कम प्रवाह। हिमालयी नदियों के लिए हिमनद पिघलना तथा प्रायद्वीपीय नदियों के लिए अनिश्चित मानसून प्रमुख चुनौती है। वैज्ञानिक शोध स्पष्ट संकेत देते हैं कि चरम वर्षा, तापमान वृद्धि और हिमनद क्षरण की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसलिए नदी संरक्षण को जलवायु नीति, कृषि नीति, शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन के केंद्र में रखना होगा। भारत की जल-सुरक्षा और भविष्य की अर्थव्यवस्था काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि हम अपनी नदियों को बदलती जलवायु के अनुरूप कितना सुरक्षित और जीवंत बना पाते हैं।

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