कभी दुनिया के सबसे अधिक ऋक्ष वाले राज्य मेघालय में कम बरसात होना चिंता की बात है । इस विषय पर एक लेख प्रस्तुत है

मेघालय में कम बारिश: बादलों के घर पर मँडराता जल संकट और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती

‘मेघालय’ का शाब्दिक और पौराणिक अर्थ है—‘मेघों का आलय’ यानी बादलों का घर। यह भारतीय उपमहाद्वीप का वह मनोरम और भौगोलिक दृष्टि से अति विशिष्ट राज्य है, जिसे प्रकृति ने अपनी संपूर्ण अनमोल धरोहरों और अतुलनीय सुंदरता से नवाजा है। यहाँ की उबड़-खाबड़ चोटियाँ, घने सदाबहार जंगल, चूना पत्थर की रहस्यमयी गुफाएँ, तीव्र वेग से बहती नदियाँ और कलकल बहते विशाल झरने सदियों से दुनिया भर के पर्यटकों और वैज्ञानिकों को आकर्षित करते रहे हैं। विशेषकर, राज्य के पूर्वी खासी हिल्स जिले में स्थित मासिनराम और चेरापूंजी ऐसे दो स्थान हैं, जिनका नाम विश्व स्तर पर सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा दर्ज करने के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज है। इन क्षेत्रों में होने वाली मूसलाधार बारिश केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि यहाँ की अनूठी संस्कृति, समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र, विविध जीवनशैली और कृषि पद्धतियों का मूल आधार रही है। हालांकि, आज वही मेघालय मौसम के अभूतपूर्व बदलावों, असामान्य मानसूनी गतिविधियों और वर्षा में लगातार आ रही भारी गिरावट की एक भयावह त्रासदी से जूझ रहा है। जो राज्य कभी पूरी दुनिया को जल से सराबोर करने के लिए जाना जाता था, आज वह खुद मानसून के मौसम में गंभीर सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी हालिया और अधिकृत आंकड़ों ने राज्य प्रशासन, पर्यावरणविदों और आम नागरिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। चालू मानसून सत्र के दौरान, यानी 1 जून से 5 जुलाई के बीच, मेघालय में जहां सामान्यतः औसतन 873.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जानी चाहिए थी, वहां वास्तव में केवल 453.3 मिलीमीटर बारिश ही दर्ज की गई है। इसका सीधा और चौंकाने वाला अर्थ यह है कि इस अवधि के दौरान राज्य में सामान्य की तुलना में कुल 48 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल 5 जुलाई को दर्ज किए गए दैनिक आंकड़ों में ही सामान्य 30.7 मिमी की तुलना में मात्र 20.1 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो उस दिन के सामान्य औसत से 34 प्रतिशत की अचानक गिरावट को दर्शाती है। यदि जिलावार विश्लेषण करें तो स्थिति और भी चिंताजनक नज़र आती है। राज्य के पश्चिमी गारो हिल्स जिले में वर्षा में सबसे भयावह 79 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। वहीं, दुनिया में सबसे अधिक वर्षा के लिए वैश्विक मानचित्र पर अपनी पहचान बनाने वाले मासिनराम और चेरापूंजी वाले पूर्वी खासी हिल्स जिले में भी 40 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। जब पूरे देश में मानसून की चाल अनियमित बनी हुई है, तब पूर्वोत्तर भारत के इस सबसे हरे-भरे राज्य में बारिश की इतनी बड़ी गिरावट पर्यावरण तंत्र के संतुलन पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

बारिश की इस भारी और असामयिक कमी का सबसे पहला और विनाशकारी प्रहार राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था तथा ग्रामीण किसानों की आजीविका पर पड़ा है। मेघालय की अधिकांश ग्रामीण आबादी मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर आधारित पारंपरिक कृषि पर निर्भर है। यहाँ की मुख्य खरीफ फसलों, विशेष रूप से चावल और मक्के की बुआई और पैदावार पूरी तरह से मानसूनी फुहारों के सही समय पर आने पर टिकी होती है। बारिश के मौसम में हो रही अत्यधिक देरी और वर्षा के अप्रत्याशित व बिखरे हुए पैटर्न के कारण फसलों की रोपाई में भारी बाधा उत्पन्न हुई है। एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात खुलकर सामने आई है कि राज्य की लगभग 85 प्रतिशत से अधिक किसान आबादी इस अनियमित मौसम चक्र के कारण फसलों की पैदावार में दर्ज की गई गिरावट से सीधे प्रभावित हुई है। नार्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी (NEHU) के एंडी टी.जी. लिंगदोह व सुब्रत पुरकायस्थ तथा मार्टिन लूथर क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के क्रेसफुलिन वाहलांग एवं मार्विन लूथर क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा री-भोई जिले के उच्चभूमि और निम्नभूमि क्षेत्रों में किए गए विस्तृत अध्ययन से संकेत मिलते हैं कि वर्षा के समय और मात्रा में आ रहे उतार-चढ़ाव ने खेती-किसानी के पारंपरिक गणित को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। इसके चलते कई क्षेत्रों में बुआई के बाद फसलें सूख रही हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में अस्वाभाविक और अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश से जलजमाव होकर तैयार फसलों के बर्बाद होने का खतरा उत्पन्न हो गया है।

कृषि क्षेत्र पर पड़े इस सीधे आघात के साथ-साथ यह संकट राज्य की पेयजल आपूर्ति और भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। मेघालय की भूगर्भीय संरचना अत्यंत जटिल और अनोखी है। यहाँ का बड़ा भूभाग चूना पत्थर (Limestone) की विशेष पहाड़ियों और भूमिगत गुफा प्रणालियों से मिलकर बना है। ये प्राकृतिक गुफाएँ और चट्टानी संरचनाएँ जल के प्राकृतिक संचयन और वर्षा जल द्वारा भूजल के पुनर्भरण (Groundwater Recharge) पर ही पूरी तरह से निर्भर करती हैं। जब मानसून के दौरान पर्याप्त मात्रा में बारिश ही नहीं होती, तो भूजल का स्तर तेजी से नीचे गिरने लगता है। इसके परिणामस्वरूप, राज्य के दूर-दराज के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में कुएँ, प्राकृतिक झरने और नदियाँ असमय सूखने लगी हैं, जिससे ग्रामीणों को पीने के साफ पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। पेयजल संकट के अलावा, इस स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू राज्य की पनबिजली (Hydroelectric Power) परियोजनाओं पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव है। मेघालय में विद्युत उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा जल विद्युत संयंत्रों से आता है जो नदियों और जलाशयों के जल स्तर पर निर्भर हैं। जलाशयों में जल स्तर घटने से बिजली उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे निकट भविष्य में पूरे राज्य को गंभीर बिजली संकट का भी सामना करना पड़ सकता है।

मेघालय का समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र और इसकी दुर्लभ जैव विविधता भी इस जल संकट की आँच से अछूती नहीं है। यह राज्य भारत के जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ सैकड़ों प्रकार की दुर्लभ वनस्पतियाँ, औषधीय पौधे, आर्किड की अनूठी प्रजातियाँ, वन्यजीव और पक्षी पाए जाते हैं। यहाँ के प्रसिद्ध ‘लिविंग रूट ब्रिज’ (जिंतेंग जिरिएंग)—जो कि पेड़ों की जीवित जड़ों से बने प्राकृतिक पुल हैं—अपनी मजबूती और अस्तित्व के लिए निरंतर नमी और भरपूर पानी पर निर्भर रहते हैं। बारिश की कमी और बढ़ते तापमान के कारण इन जड़ों के सूखने और क्षतिग्रस्त होने की आशंका बढ़ गई है। इसके अलावा, वनों में आर्द्रता की कमी के कारण जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे न केवल दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है, बल्कि पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी श्रृंखला टूट जाती है। भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील चूना पत्थर की गुफाओं में जल प्रवाह रुकने से वहाँ पाए जाने वाले अनूठे भूमिगत जीवों और जलीय प्रजातियों के अस्तित्व पर भी विलुप्ति का संकट मंडराने लगा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों, मौसम वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है कि मेघालय में बारिश का यह घटता ग्राफ कोई अचानक घटी घटना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और स्थानीय स्तर पर हो रहे अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेपों का एक साझा एवं चिंताजनक परिणाम है। शोधकर्ताओं द्वारा किए गए सर्वेक्षणों में शामिल लगभग 70 प्रतिशत से अधिक किसानों और स्थानीय निवासियों ने यह स्वीकार किया है कि पिछले एक से दो दशकों के भीतर उनके क्षेत्रों के औसत तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। लगभग 80 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं ने मानसून के व्यवहार में आई अभूतपूर्व अनियमितता और मौसम के अप्रत्याशित मिज़ाज को स्पष्ट रूप से महसूस किया है। वैश्विक तापमान में वृद्धि (Global Warming) के कारण मानसूनी हवाओं की दिशा, दबाव और नमी ले जाने की क्षमता प्रभावित हुई है। इसके साथ ही, राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास, कोयला व चूना पत्थर के खनन, और अनियंत्रित शहरीकरण के नाम पर बड़े पैमाने पर हो रही पेड़ों की कटाई ने स्थानीय सूक्ष्म-जलवायु (Micro-climate) को बहुत गहराई से नुकसान पहुँचाया है। वनों के आवरण में आई कमी के कारण बादलों को आकर्षित करने और नमी को रोके रखने की प्राकृतिक क्षमता घट गई है।

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